अंक : 01-15 Sep 2012 (Year-15, Issue-17)

बी.टी.सी. प्रशिक्षित शिक्षा मित्रों व टी.ई.टी उत्तीर्ण बी.एड.प्रशिक्षितों का संघर्ष


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उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून के शिक्षा निदेशालय दफ्तर में राज्य के प्रशिक्षित (शिक्षा सम्बन्धी) बेरोजगार अपनी-अपनी मांगांे के सम्बन्ध में पिछले एक डेढ़ माह से आन्दोलन कर रहे हैं। शिक्षा निदेशालय दफ्तर में एक जगह पर बी.टी.सी. प्रशिक्षित शिक्षा मित्र, एक जगह पर टी.ई.टी. योग्यताधारक वे बी.एड. प्रशिक्षित जिनकी नौकरी के लिये काउन्सिलिंग हो चुकी है तो एक स्थान पर टी.ई.टी. योग्यताधारक वे बी.एड. जो शिक्षक बनने के लायक एन.सी.टी.सी के मुताबिक तो हो चुके हैं लेकिन अभी शिक्षक बनना इनके लिये ख्वाब ही प्रतीत हो रहा है।
गौरतलब हो कि उत्तराखण्ड के लगभग 4600 शिक्षा मित्र जो कि पिछले कई वर्षों से दुर्गम इलाकों में शिक्षण का कार्य कर रहे थे। ये अपने नियमितीकरण के लिये भी राजधानी में संघर्ष कर रहे थे। अन्ततः राज्य सरकार ने बी.टी.सी. की ट्रेनिंग के लिये इन्हें 30 नम्बर की छूट दी थी। केवल स्नातक किये हुए शिक्षा मित्र बी.टी.सी. प्रवेश परीक्षा के लिये योग्य थे। इस प्रक्रिया में लगभग 1263 शिक्षा मित्रों का बी.टी.सी. के लिये चयन हुआ जबकि शेष वर्तमान में डी.एल.एड. की ट्रेनिंग इग्नु(IGNOU) से पत्राचार माध्यम से कर रहे हैं साथ ही अपने-अपने प्राथमिक विध्यालयों में शिक्षण कार्य कर रहे हैं। इन्हें मानदेय भी दिया जा रहा है। एन.सी.टी.सी के मुताबिक विशिष्ट बी.टी.सी. अब मान्य नही होगी इसकी बजाय अब डी.एल.एड. होगा।
बी.टी.सी. प्रशिक्षित इन शिक्षा मित्रों की दिक्कत यह है कि बिना टी.ई.टी परीक्षा पास किये इन्हें शिक्षक के रूप में नौकरी नहीं मिल सकती है यानी कि टी.ई.टी. परीक्षा पास करना इनके लिये अनिवार्य बना दिया गया है। बी.टी.सी. प्रशिक्षित शिक्षा मित्रों का सीधा व सपाट तर्क यह है कि उन्हीं के साथ सीधे बी.टी.सी. प्रवेश परीक्षा करके ट्रेनिंग करने वाले वे प्रशिक्षु जो शिक्षा मित्र नहीं थे व इसीलिये उन्हें 30 नम्बर की छूट भी नहीं थी उनको सरकार ने टी.ई.टी. से मुक्त कर दिया है फिर उनके साथ यह भेदभाव क्यों? प्रदेश सचिव(शिक्षा मित्र) नारायण राणा का कहना है कि एन.सी.टी.सी. की अधिसूचना 23 अगस्त 2010 को जारी होने के ठीक एक वर्ष बाद 16 अगस्त 2011 को हमारी ही तरह के शिक्षा उपासकों को (ठीक शिक्षा मित्र की तरह) बिना टी.ई.टी. के स्थायी नियुक्ति देने का निर्णय ले सकती है तो फिर उत्तराखण्ड सरकार क्यों नहीं ऐसा कर सकती है? इन्हीं तर्कों को आधार बनाकर बी.टी.सी. प्रशिक्षित शिक्षा मित्र 19 जुलाई से यहां धरना प्रदर्शन कर रहे हैं। 23 अगस्त को शिक्षा मंत्री का घेराव किया गया। जहां उनका सत्कार-स्वागत लाठियों से किया गया इसमें 8-10 शिक्षा मित्र घायल भी हुए। इसी के साथ-साथ पिछले पांच दिनों से चार शिक्षा मित्र आमरण अनशन पर बैठे हुए हैं। मांग यही है कि सहायक अध्यापक के रूप में उनका समायोजन किया जाय।
अब बात की जाय उन टी.ई.टी. योग्यताधारक बी.एड प्रशिक्षितों की जिनकी नौकरी के लिये काउन्सिलिंग हो चुकी है। ऐसे प्रशिक्षुओं की संख्या 2253 के लगभग है। चूंकि ये सभी बी.एड. हैं, बी.टी.सी. नहीं इसीलिये इन्हें 6 माह का विशिष्ट बी.टी.सी. प्रशिक्षण करवाया जाना था। प्रशिक्षण पूरा हो जाने के बाद ही सहायक अध्यापक के बतौर नियुक्त किया जाना था। अध्यक्ष अनूप जदली के मुताबिक 1 जनवरी 2012 से विशिष्ट बी.टी.सी. प्रशिक्षण शुरु हो जाना चाहिये था काउन्सिलिंग होने के बावजूद अभी तक नियुक्ति पत्र जारी नहीं हुए। नियुक्ति पत्र अविलम्ब जारी करने की मांग को लेकर 1 अगस्त से ये धरने पर बैठे हुए हैं। अभी तक कोई अधिकारी उनके बीच नहीं आया है। किसी प्रकार का आश्वासन भी अभी तक नहीं आया है। यह पूछे जाने पर कि अभी तक नियुक्ति क्यों नहीं मिली? धरने पर बैठे नवीन का कहना था कि आरक्षण का तर्क देकर अधिकारी नयी लिस्ट बनाने के बाद ही नियुक्ति पत्र देने का बहाना बना रहे हैं जबकि इस काम में एक दिन से ज्यादा दिन नहीं लगने वाला शासन व विभाग की इस गैरजिम्मेदाराना काम-काज व टाल-मटोल के तौर तरीके से हम अधर में लटक गये हैं। हमने अपनी-अपनी प्राइवेट नौकरियां भी नौकरी लगने की उम्मीद में छोड़ दी थीं। 8 मई 2012 को इस सम्बन्ध में उच्चतम न्यायालय ने मई माह में इनकी नियुक्त किये जाने का आदेश विभाग को दिया था लेकिन इस आदेश की भी अवहेलना कर दी गयी।
यहीं पर लगभग 20-30 फुट की दूरी पर टी.ई.टी. योग्यताधारक वे बी.एड. प्रशिक्षित भी बैठे हुए हैं जो टी.ई.टी. पास करके अध्यापक बनने की योग्यता तो हासिल कर चुके हैं लेकिन अध्यापक बनने के लिये कब तक नियुक्ति पत्र देने के काबिल सरकार व विभाग उन्हें समझता है कोई पता नहीं। शिक्षा का अधिकार (RTE) के तहत ही एन.सी.टी.सी. द्वारा टी.ई.टी. की प्रक्रिया चलायी जा रही है। इस आर.टी.ई. के तहत ही कक्षा में छात्र-शिक्षक अनुपात 30ः1 का होना चाहिये जबकि उत्तराखण्ड में शिक्षा विभाग ने 40ः1 के छात्र-शिक्षक अनुपात के अनुसार पद सृजित किये हैं। अतः यह स्पष्ट है छात्र-शिक्षक अनुपात 30ः1 के लागू होते ही पद की संख्या बढ़ जायेगी और बिना पद बढ़े इन प्रदर्शनकारियों की नौकरी फिलहाल इस वर्ष लगना सम्भव नहीं।
इसीलिये ये टी.ई.टी. धारक बेरोजगार प्रशिक्षित 16 जुलाई से इस एकसूत्रीय मांग के साथ क्रमिक अनशन पर बैठे हुए हैं कि राज्य सरकार शिक्षा का अधिकार (RTE) के छात्र-शिक्षक अनुपात 30ः1 के प्रावधान को भी यहां लागू करे। हालांकि यह भी स्पष्ट है कि इस प्रावधान के लागू होने के बावजूद भी पदों की संख्या में थोड़ी ही वृद्धि होगी जबकि टी.ई.टी. योग्यताधारियों की संख्या राज्य में 13,000 के लगभग है। इसमें से लगभग 2253 को नियुक्ति पत्र अविलम्ब जारी करने की मांग के साथ अलग से धरना प्रदर्शन कर रहे हैं। कुल मिलाकर राज्य सरकार व उसका शिक्षा महकमा लेटलतीफी, काम को लटकाये रखने, गैरजवाबदेही व गैरजिम्मेदराना कार्यशैली को बरकरार रखे हुए हैं। उसकी यह कार्यशैली आम आवाम से जुड़े मुद्दों पर ही नजर आती है। इसके अलावा एक प्रवृत्ति यह भी है कि सरकारी बजट को जितने लम्बे समय तक बचाकर बिना खर्च किये रखा जा सकता है बचाकर रखना, मौका मिलते ही उसे फिर शासन-सत्ता से जुड़े लोग अपनी सहुलियत के हिसाब से इस्तेमाल कर लेते हैं। शिक्षा में तो सरकार वैसे भी पूरे बजट का बहुत ही छोटा हिस्सा खर्च करती है।
यही एक कारण भी है कि लगभग एक लाख से ऊपर (अनुमानित) बी.एड. प्रशिक्षित बेरोजगार राज्य में हैं। टी.ई.टी. नाम का एक नया पहाड़ इनके व इनके ही जैसे देश भर के बी.एड. प्रशिक्षित बेरोजगारों के सामने खड़ा करके शासकों ने इन्हें बेहद सीमित सरकारी नौकरी से कोसों मील दूर कर दिया है। देहरादून संवाददाता

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