अंक : 01-15 Feb 2013 (Year-16, Issue-03)

संघी पोगापंथ बनाम पतित पूंजीवादी आधुनिकता अथवा भारत बनाम इंडिया


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    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने यह कहकर अपने बहुत सारे समर्थकों को सकते में डाल दिया कि बलात्कार इंडिया में होते हैं भारत में नहीं। भारत से उनका आशय देश के उन हिस्सों से था जो पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित नहीं है। जिन लोगों ने इंडिया का अर्थ शहर तथा भारत का अर्थ गांव लिया था उनके फायदे के लिए संघियों ने भागवत के वक्तव्य का सही अर्थ समझाया।

    तो क्या भारतीय संस्कृति में बलात्कार नहीं होते थे? या फिर संघ की नजर में आज की पतित संस्कृति में क्या भारतीय संस्कृति की कोई भूमिका नहीं है?

    बात एकदम प्राचीन काल से करें जिससे संदेह की कोई गुंजाइश न रहे। संघियों के अनुसार उनकी वैदिक संस्कृति तब की है जब पश्चिम में लोग पेड़ों की डालियों पर ही उछल कूद कर रहे थे। इस वैदिक काल में ब्रह्मा ने अपनी पुत्री से बलात्कार किया और देवताओं के गुरू वृहस्पति ने अपनी भाभी से। इस वैदिक काल के सर्वोच्च देवता इन्द्र का बाद में व्यभिचारी आचरण जगजाहिर है तथा अहिल्या तो आज भी प्रताडि़त नारी का प्रतीक है। प्राचीन काल और मध्य काल में लैंगिक संबंधों के मामले में विस्तृत विवरण देखना हो तो हरिमोहन झा की किताब ‘खट्टर काका’ देख लें।

    लेकिन संघी वास्तव में प्राचीन भारतीय संस्कृति के हामी नहीं हैं वे जब भारतीय संस्कृति की बात करते हैं तो उससे उनका मतलब मध्ययुग की पोगापंथी सामंती संस्कृति से होता है जब छुआ-छूत, कर्मकाण्ड तथा कूपमंडूकतापूर्ण धार्मिक अनुष्ठानों का बोलबाला था। ध्यान देने की बात है कि राम और कृष्ण भी मूलतः इसी मध्य काल के देवता हैं। वैदिक काल से उनकी पूजा का संबंध नहीं है।

    इस मध्यकाल में क्या होता था? इस मध्य काल में राजा, सामंत और जमींदार बेलगाम यौन अत्याचार करते थे- ‘जेहि के बिटिया सुन्दर देखी, तेहि पर जाई घई तलवार।’ यह उनके लिए उनका जन्मसिद्ध अधिकार था कि किसानों-दस्तकारों की बेटियों को उठवा लें। यह परंपरा इस हद तक थी कि पृथ्वीराज चैहान ने अपने मौसेरे भाई की बेटी को ही उठवा लिया।

    गैर सामंती दबंग भी कम नहीं थे। सवर्ण पुरुष दलितों-शुद्रों की स्त्रियों-लड़कियों को शिकार बनाना अपना अधिकार समझते थे। तब के गांव गांधी जी के आदर्श गांव कतई नहीं थे। और न ही सामंती ऊंच-नीच और भेदभाव के जमाने में वे हो सकते थे। अंग्रेजों के आने तक इस मामले में क्या स्थिति थी इसका बहुत अच्छा उदाहरण अमृतलाल नागर द्वारा अनुवादित और संपादित किताब ‘आंखों देखा गदर’ में हैं जिसमें एक गरीब ब्राह्मण 1857 के विद्रोह का अपना निजी अनुभव प्रस्तुत करता है। इसी किताब में उसने एक नामी-गिरामी ब्राह्मण पुरोहित का बड़ी श्रृद्धा से वर्णन किया है जिसने एक दलित बच्ची को खरीद कर पाला-पोसा और जिसके साथ उसने उसके रजस्वला होने पर 11 वर्ष की उम्र में शारीरिक संबंध बनाया। बाद में अन्य पंडों तथा अभिजातों को पता चलने पर वे भी बड़ी होती बच्ची के साथ संसर्ग में शामिल हो गये। उसके नवयुवती होने तक उसके पास उसके साथ संसर्ग करने आये पवित्र आत्माओं के जनेऊओं का ढेर लग गया जो वह अपने मालिक पुरोहित के कहने से हर किसी के गले से उतरवा लेती थी।

    संघियों की इस श्रद्धेय भारतीय संस्कृति का आज पतित पूंजीवादी आधुनिकता में क्या योगदान है? भारत के तेजी से बदलते भारतीय समाज में मध्ययुगीन भारतीय संस्कृति की स्त्री को अपनी सम्पत्ति समझने की सामंती सोच बहुत आसानी से पश्चिमी साम्राज्यवादी संस्कृति की स्त्री शरीर को यौन वस्तु के रूप में देखने और इस्तेमाल करने की सोच के साथ घुलमिल जा रही है। यह स्त्री शरीर को अपनी सम्पत्ति मानने तथा यौन वस्तु के रूप में इस्तेमाल करने और फेंकने को एक साथ ही सामने ला रही है। इस संस्कृति में पुरुष यौन शुचिता से आक्रांत है, वह कई लड़कियों-औरतों से शारीरिक संबंध की इच्छा रखते हुए भी अपनी बहन, प्रेमिका या पत्नी की यौन शुचिता को लेकर भयभीत रहता है। इसमें आज भी इज्जत की खातिर स्त्रियों के साथ अकथनीय अत्याचार हो रहे हैं। पुलिस-सेना द्वारा बलात्कार, दंगों में बलात्कार, खाप पंचायतों द्वारा हत्या आदि। दूसरी ओर इसमें पुरुष अपने निषिद्ध रिश्तों के अतिरिक्त हर स्त्री शरीर को उपभोग की वस्तु समझ रहा है। जो जैसे भी हो हासिल की जाय। अन्य तरीके कारगर न होने पर यौन हिंसा या बलात्कार भी इसके लिए जायज हैं। यह इस कदर है कि निषिद्ध रिश्तों के भीतर भी लड़कियों और औरतें शिकार बनायी जा रही हैं।

    आज की इस पतित संस्कृति से संघ भारतीय संस्कृति की आड़ लेकर नहीं बच सकता क्योंकि उसकी तथाकथित आदर्श भारतीय संस्कृति आज की पतित पूंजीवादी संस्कृति का अहम हिस्सा है। जो सज-धजकर करवाचौथ मना रही मध्यम वर्गीय औरतों से गौरवान्वित महसूस करता है उसे बलात्कार पर नैतिक आक्रोश प्रकट करने का कोई अधिकार नहीं है। दोनों ही एक ही सोच की दो अभिव्यक्तियां हैं।

    संघी भारतीय संस्कृति के नाम पर इस सच्चाई को झूठलाना चाहते हैं पर वे इसमें कामयाब नहीं हो सकते।

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