अंक : 16-28 Feb 2013

अफजल को फांसीः कश्मीर घाटी में आक्रोश फूटा


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    9 फरवरी शनिवार के दिन भारत सरकार ने ‘दिलेरी’, ‘न्यायप्रियता’ व ‘कानून के शासन’ का परिचय देते हुए अफजल गुरू को फांसी दे दी। अफजल गुरू को फांसी पर क्यों लटकाया गया। यह एक ऐसा सवाल है। जो अपने साथ कई सवाल हमारे देश के शासक वर्ग और उसकी व्यवस्था पर खड़ा कर देता है। अफजल गुरू को फांसी देकर तथाकथित ‘‘राष्ट्र की ‘सामूहिक भावना’ को’’ संतुष्ट कर दिया गया।

    अफजल गुरू को फांसी दिये जाने के पहले ही कश्मीर में भारी संख्या में सुरक्षा बलों और पुलिस को तैनात कर दिया गया था। कश्मीर घाटी में र्कफ्यू लगा दिया गया और रेडियो, टीवी, इण्टरनेट आदि सभी सूचना तंत्रों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। कश्मीर की जनता का आक्रोश इस फांसी के बाद सड़कों पर फूट पड़ा और सुरक्षाबलों के हाथों एक चौदह वर्षीय किशोर सहित कई लोग मारे गये और सैकड़ों लोग घायल अथवा चोटिल हो गये। अफजल गुरू शेष भारत के लिए जो कुछ हो कश्मीर के लिए वे आजादी की लड़ाई के एक प्रतीक बन गये।

    अफजल गुरू का जीवन कश्मीर की मुक्ति, इस्लामिक कट्टरपंथियों का साथ व उनसे मोहभंग, भारतीय सेना व पुलिस द्वारा भयानक यंत्रणा व मुखबिरी का दबाव, भारतीय न्याय प्रणाली का प्रहसन और स्वयं उनकी आर्थिक मजबूरियों व गरीबी की ऐसी दास्तां बन गया जिसका अंत फांसी के फंदे पर हुआ।

    असल में अफजल गुरू के खिलाफ न्यायालयों में कोई भी ठोस सबूत संसद में हमले के संदर्भ में नहीं मिला था। ये बातें पिछले समय में एकदम स्पष्ट तौर पर सामने आ गई हैं। उसके बारे में कहा गया कि वह साजिशकर्ता था परन्तु सर्वोच्च न्यायालय ऐसे मामलों में कभी भी फांसी की सजा नहीं देता रहा है। असल में यह महज कानूनी व तकनीकी प्रश्न न होकर शासक वर्ग द्वारा एक राजनीतिक व यहां तक कि यह भी कहा जा सकता है, इस फांसी को देना, भावी चुनावी गणित को ध्यान में रखकर लिया गया फैसला है।

    अफजल गुरू को फांसी दिये जाने पर कश्मीरी जनता, राष्ट्रीयताओं के संघर्ष में जुड़े लोगों व उनके आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन करने वालों, शांति व मानवाधिकारों के लिए लड़ने वालों का क्षुब्ध व आक्रोशित होना उतना ही स्वभाविक है जितना हिन्दू फासिस्ट तत्वों खासकर संघ व उसके बजरंग दल जैसे संगठनों व शासक वर्ग के विभिन्न हिस्सों का उनकी फांसी की सजा पर जश्न मनाना। अंधराष्ट्रवादियों व हिन्दू कट्टरपंथियों द्वारा अफजल गुरू की फांसी को लेकर लम्बे समय से घृणित राजनैतिक खेल खेला जा रहा था। सच तो यही है कि अफजल हमारे युग की तमाम राजनैतिक त्रासदियों का शिकार हो गया।

    भारत के शासक वर्ग द्वारा जिस तरह से भारत का निर्माण किया गया जिसमें शोषित-उत्पीडि़त जनों के लिए कोई स्थान नहीं था वहां समय-समय पर वह सब कुछ होता रहेगा जो अफजल गुरू के जन्म व मृत्यु की घटनाओं के समय हुआ है। भारत के शासक वर्ग द्वारा कश्मीर सहित उत्पीडि़त राष्ट्रीयताओं का तीव्र दमन और जबरदस्ती भारतीय संघ में सम्मिलित करने से राष्ट्रीयता के संघर्ष कश्मीर, असम, मणिपुर, नागालैण्ड आदि-आदि स्थानों पर फूटते रहे हैं। वहां के लोग अपने साथ होने वाले अत्याचार व दमन के खिलाफ वैसे ही संघर्ष के तरीके अपनाते रहे हैं जैसे कभी भारत के लोगों ने ब्रिटिश उपनिवेशवादियों के खिलाफ अपनाये थे और आज भारत का शासक वर्ग वही सब तौर-तरीके कुछ थोड़े भिन्न ढंग से भारत के शोषित व उत्पीडि़तों के साथ अपनाता है। अतः जहां दमन होगा वहां संघर्ष भी फूटेंगे।

    आज भारत के सभी शोषित-उत्पीडि़तो की आवश्यकता इस बात की बनती है कि भारतीय समाज में वर्तमान क्रूर पूंजीवादी व्यवस्था का खात्मा हो और एक ऐसी समाजवादी व्यवस्था कायम हो जो कि सभी राष्ट्रीयताओं को आजादी, बराबरी और यहां तक कि उन्हें आत्मनिर्णय के अधिकार दे। एक सच्चा समाजवादी संघीय भारत ही इस बात की गारण्टी कर सकता है कि जहां कोई अफजल गुरू मानवीय व सामाजिक त्रासदियों का शिकार न हो। 

Labels: अन्तराष्ट्रीय


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