अंक : 16-31 Mar, 2013 (Year 16, Issue 06)

पोस्को(उड़ीसा) में महिलाओं का नग्न प्रदर्शन


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    उड़ीसा में पोस्को कम्पनी के लिए भूमि अधिग्रहण के खिलाफ वहां की जनता का जुझारू संघर्ष जारी है। इतने लम्बे संघर्ष के बावजूद सरकार लोगों की बात सुनने के बजाय दमन का एक से बढ़कर एक हथकंडा अपना पोस्को के प्रति अपनी स्वामिभक्ति प्रकट करने में जुटी है।

    अनगिनत बार लाठी चार्ज, गोली सहने के बाद, कई लोगों की कुर्बानियां देने के बाद भी जब जनता पीछे हटने को तैयार नहीं हुई तो कंपनी के गुण्ड़ों द्वारा प्रदर्शनरत लोगों पर बम फेंका गया जिसमें 4 लोग मारे गये। जब लोग पोस्को के खिलाफ मुकदमा लिखाने गये तो पुलिस ने यह कहकर मुकदमा लिखने से मना कर दिया कि मारे गये लोग ही बम चला रहे थे जो समय से पूर्व ही उनके हाथों में फट गया। जाहिर है पोस्को के पूंजीपतियों की सेवा में जुटे शासन-प्रशासन-पुलिस-सरकार से इससे इतर की उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी।    

    इस सबसे उड़ीसा की संघर्षरत जनता का तंत्र पर बचा-खुचा भरोसा भी टूटने लगा। और फिर अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की पूर्व संध्या पर महिलाओं ने वहां तैनात पुलिसवालों के सम्मुख नग्न प्रदर्शन कर एक बार फिर सरकार को चेताने की कोशिश की।

    इससे पूर्व 2004 में मणिपुर की महिलायें ‘आम्र्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट (1958)’ के हटाये जाने की मांग को लेकर असम राइफल्स के कार्यालय पर ‘भारतीय सेना हमारा बलात्कार करो’ का बैनर ले नग्न प्रदर्शन कर चुकी थी। अब उड़ीसा की महिलाओं ने मणिपुर की महिलाओं सरीखा प्रदर्शन कर अपनी आवाज पूरे देश को सुनाने की कोशिश की है।

    उड़ीसा की महिलाओं द्वारा उठाया गया कदम यह साबित करने के लिए पर्याप्त है, कि कैसे सारा सरकारी अमला आज बेगुनाह निर्दोष जनता की आवाज को कुचलकर देशी-विदेशी धनाढ्यों का चाकर बना बैठा है, कि वे खून की नदियां बहाकर उड़ीसा के गोविन्दपुर (जगदीशपुर जिला) को खाली करवा किसी भी कीमत पर पोस्को को भेंट चढ़ाने को उतारू है।

    भारत सरीखे देश में जहां सामन्ती मूल्य बहुत ज्यादा हैं और महिलाओं के शरीर को उनकी इज्जत सरीखा समझा जाता है। इस तरह के नग्न प्रदर्शन आम बात नहीं हैं बल्कि ये लम्बे समय से लड़ रही आबादी की बात न सुने जाने, लोगों के सारे तंत्र से भरोसा उठने का प्रतीक है।

    मणिपुर में असम राइफल्स के सैनिकों के द्वारा आये दिन बलात्कारों ने महिलाओं को ऐसे प्रदर्शन की ओर धकेला तो उड़ीसा में सालों के संघर्ष की एक भी बात न सुने जाने से महिलायें इस ओर बढ़ी।

    विकसित राष्ट्र की अभिलाषा लिए, महिला सशक्तिकरण की बात करते भारत के शासक वर्ग के मुंह पर इन महिलाओं ने अपने प्रदर्शन से तमाचा जड़ा है। आज की उनकी हताशा से पैदा हुई यह कार्यवाही कल को भारतीय शासक वर्ग के खिलाफ जनता के आक्रोश को बढ़ाने में मददगार बनेगी।

Labels: मजदूर हालात


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