अंक : 01-15 Apr, 2013 (Year 16, Issue 07)

कुपोषण, भारत छोड़ो


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    ‘कुपोषण, भारत छोड़ो’ का नारा थोड़ा अजीब सा लगता है पर इस अजीब से नारे को भारत सरकार लगवा रही है। बाबा आमिर खान भारत सरकार के राजदूत बनकर लोगों को कुपोषण के बारे में शिक्षित कर रहे हैं जबकि सरकारी दूरदर्शन चैनल पर उपरोक्त नारा सरकार द्वारा लगवाया जा रहा है। 

    1960-70 का दशक वह समय था जब भारत में सरकारी विद्वान इस बात पर बहस करते थे कि भारत में मौतें भुखमरी से हो रही हैं या कुपोषण से। विद्वानों को इस तरह की विद्वतापूर्ण बहसों के लिए पैसे दिये जाते थे। आज चार-पांच दशक बाद फिर कुपोषण पर लगते नारे यह दिखाते हैं कि इन वर्षों में इस मामले में कुछ भी नहीं बदला। 

    चिकित्सा विज्ञान के अनुसार कुपोषण का मतलब है शरीर को जरूरी पोषक तत्वों का न मिल पाना भले ही पेट भरने के लिए खाना मिल जा रहा हो। इस तरह कुपोषण, भारत छोड़ो का नारा लगवाकर सरकार यह जताना चाहती है कि देश के सभी लोगों को पेट भर खाना तो मिल ही रहा है। बाबा आमिर खान तो कुपोषण की जिम्मेदारी लोगों की नाजानकारी तथा नासमझी पर डाल रहे हैं। इसीलिए वे इस मामले में लोगों को शिक्षित कर रहे हैं। 

    पर सवाल तो यह है कि यह शिक्षा देश की गरीब आबादी को ही क्यों दी जा रही है? अमीर लोगों तथा मध्यम वर्ग के ऊपरी हिस्से को यह शिक्षा क्यों नहीं दी जा रही है जो खा-खाकर अपना स्वास्थ्य चौपट कर रहा है? 

    असलियत तो सरकार के अपने कारनामों से ही उजागर हो रही है। देश के कुछ नेकनीयत लोग लम्बे समय से लगे हुए हैं कि इस देश के भूखे मरते लोगों के पेट में किसी तरह से अनाज पहुंचाया जाये। इसके लिए उन्होंने बड़ी मेहनत से एक खाद्य सुरक्षा बिल तैयार किया। इस बिल का मर्म यह था कि देश का जो भी परिवार चाहे उसे 2 रुपये किलो गेहूं तथा 3 रुपये किलो के भाव से चावल मिले। मात्रा प्रति परिवार प्रति माह 35 किलो की रखी गई। नेकनीयत लोगों का ख्याल था कि सम्पन्न लोग तो इस सस्ती दर की गुणवत्ता वाला अनाज खायेंगे नहीं, इसीलिए जरूरतमंद लोग ही इसे लेंगे और खायेंगे। 

    सरकार यदि इसे मंजूर कर लेती और यदि देश के सभी बीस करोड़ गरीब परिवार यह अनाज प्राप्त करते तो भी सरकार पर सालाना तीन-चार लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का खर्च नहीं पड़ता। ऊपरी तौर पर यह रकम बड़ी लगती है पर यह देखते हुए कि सरकार पिछले सालों में हर साल ही 4-5 लाख करोड़ रुपये करों में छूट दे रही है, यह रकम ज्यादा नहीं है। 

    पर सरकार इसके लिए राजी नहीं है। उसने जो बिल तैयार किया था उसमें भुखमरी की रेखा के नीचे वाले लोगों को ही प्रति व्यक्ति प्रति माह 5 किलो अनाज मिलेगा। किसी को लग सकता है कि यह तो ठीक ही है। भुखमरी की रेखा के ऊपर वाले लोगों को सस्ता अनाज क्यों दिया जाये? पर सरकार की मंशा तब साफ हो जाती है तब हम पाते हैं कि सरकार भुखमरी से नीचे वाले लोगों की संख्या को कम से कम रखने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। इसके लिए वह किसी भी बेहयाई पर उतर रही है। अब बहुत खींचतान के बाद सरकार का कहना है कि वह देहात के 75 प्रतिशत तथा शहर के 50 प्रतिशत लोगों को यह सस्ता अनाज देने को तैयार है। पर नेकनीयत लोग सरकारी नीयत को देखते हुए इस सरकारी बिल का विरोध कर रहे हैं। 

    जो सरकार लोगों के पेट भरने के मामले में ही इस तरह का रुख अपना रही हो, वह भला कुपोषण को लेकर क्यों चिन्तित है? वह केवल इसलिए कि भुखमरी और कुपोषण की विकराल मौजूदगी से उसके चमकते भारत की छवि को धब्बा लगता है। वह यथार्थ को तो बदल नहीं सकती। पूंजीपति वर्ग की मुनाफे की भूख उसे ऐसा करने नहीं देगी। वह केवल यही कर सकती है कि इस विकाराल समस्या के बारे में भ्रम पैदा करे। वह इसे उपदेश और नारे की समस्या बना दे। वह इसकी जिम्मेदारी भूखे मरने वाले लोगों पर ही डाल दे। 

    पूंजीपति वर्ग के लिए यह वाकई बहुत अच्छा है। पर जो शासक वर्ग ऐसा करने लगे वह कितने दिन टिक पायेगा? 

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