अंक : 01-15 June, 2013 (Year 16, Issue 11)

‘‘पर्यावरण संरक्षण’’ के मोहक नारे की आड़ में पर्यावरण को तबाह करता पूंजीवाद


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    पिछले 5-6 महीने से केंद्र सरकार का वन एवं पर्यावरण मंत्रालय खासा सक्रिय नजर आ रहा है। पर्यावरण संरक्षण को लेकर उसकी सक्रियता का आलम यह है कि कई राज्य सरकारों से इस दौरान यह मंत्रालय ‘‘ईको सेंसिटिव जोन’’ बनाने के संबंध में जवाब तलब कर चुका है, उन्हें नोटिस भेज  चुका है या फिर गजट जारी कर चुका है। उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, गुजरात व कर्नाटक आदि आदि राज्यों को इस मामले में पर्यावरण मंत्रालय वक्त-बेवक्त निर्देशित करता रहा है। वन्य जीवों से सम्बन्धित नीतियों को तय करने वाला पर्यावरण मंत्रालय का मुख्य निकाय ‘राष्ट्रीय वन्य जीवन बोर्ड’ ( NBWL ) द्वारा इस वर्ष मार्च माह में ‘‘ईको सेंसिटिव जोन’’(ECZ) से सम्बन्धित  लगभग 74 नये प्रस्तावों पर चर्चा की गयी थी।

    इन पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्रों (ई.सें.जो.) को बनाये जाने के दौरान राज्य सरकारों व केंद्र सरकार के बीच अंतर्विरोध भी लगातार सामने आते रहे हैं। इसके अलावा खुद राज्यों के भीतर भी ऐसे संवेदनशील क्षेत्र बनाए जाने के विरोध में जहां असंतोष व आक्रोश पैदा होता है वहीं इनके बनाए जाने के समर्थन में ‘‘पर्यावरणवादियों’’ का शोरगुल भी सुनाई देने लगता है। इसलिए जहां इस विरोध व समर्थन की जमीन को समझना जरूरी है वहीं ‘‘पर्यावरण संरक्षण’’ के नारे में छुपे आर्थिक-राजनीतिक कारणों को समझना जरूरी है। यह सब कुछ ‘‘ईको सेंसिटिव जोन’’ के मसले पर ही नहीं बल्कि ‘‘वन्य जीव संरक्षण’’ के लिए संरक्षित क्षेत्र बनाने व वन संरक्षण को बनाने के दौरान भी हुआ जोकि ईको सेंसिटिव जोन के रूप में भी पिछले कुछ वर्षों से सामने आता जा रहा है।

    ‘ईको सेंसिटिव जोन’ मामले में भी ये जिस ढंग से व संरक्षित इलाके जानवरों के लिए जिस ढंग से बनाए गए हैं उसमें स्थानीय जनता की राय व अधिकारों को कोई महत्व नही है। भारतीय शासक कहते नहीं थकते कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक मुल्क है लेकिन उनका यह पूंजीवादी लोकतन्त्र एक ओर अलग-अलग प्रांतों के संदर्भ में प्रांतीय सरकारों पर अपने निर्णयों को थोपता है, राज्य की जनता द्वारा चुनी हुई सरकार को ठेंगे पर रखता है और न ही कोई हस्तक्षेप प्रांतों का केंद्र सरकार द्वारा उनके अपने प्रांतों के मामले होने वाली नीतियों के संदर्भ में होता है। इस प्रकार केंद्र की तानाशाही प्रांतों पर रहती है। इसी प्रकार कोई भी हस्तक्षेप स्थानीय आबादी का, उनकी पंचायतों का उनके संबंध में, उनकी अपनी जिंदगी को गहराई तक प्रभावित करने वाले फैसलों के संदर्भ में नहीं होता है। ईको सेंसिटिव जोन के मामले में स्थानीय आबादी विशेषकर महिलाओं के परामर्श से भी ‘आंचलिक महायोजना’ बनाने की बात की गई है लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि उनके अपनी जरूरतों व हितों के अनुरूप योजना बनेगी बल्कि यह केंद्र सरकार व पर्यावरण मंत्रालय द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुरूप ही होगा व इसकी मोनिटरिंग कमेटी का पूरा हस्तक्षेप होगा। देश के भीतर इतनी बड़ी तादाद में बन रहे सेंसिटिव जोन के संबंध में जो काफी गहराई तक लोगों की जिंदगी को प्रभावित करते हों, उन पर जनमत संग्रह तो होना ही चाहिए।

पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र(ई.सें.जो) क्या है व इसके विरोध में आवाज व संघर्ष क्यों- पर्यावरण मंत्रालय के मुताबिक देश में वन्य जीव संरक्षण के लिए बने ‘राष्ट्रीय पार्क’,  ‘अभ्यारण्य’ व ‘संरक्षित क्षेत्र’ के चारों ओर का लगभग 10 किमी. तक का दायरा ‘ईको सेंसिटिव जोन’ होगा। दरअसल केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय पर्यावरणीय(संरक्षण) नियम 1986 व पर्यावरणीय (संरक्षण) अधिनियम 1986 के नियमों व उपनियमों के तहत 1989 से पर्यावरणीय संवेदनशील क्षेत्र की पहचान करने व इन्हें सूचित करते रही है। इसी के अंतर्गत 21 जनवरी 2002 को पर्यावरण मंत्रालय के भारतीय वन्य जीव बोर्ड की बैठक में ‘वन्य जीव संरक्षण रणनीति 2002’ बनायी गई जिसके बिन्दु-9 में ‘पर्यावरण संरक्षण अधिनियम’ के सेक्शन 3(अ) व  ‘पर्यावरण संरक्षण नियम’ के नियम 5 व उपनियम (8) व (9) के तहत राष्ट्रीय पार्क व सेंचुरीज की सीमा में 10 किमी तक के क्षेत्र को ‘‘ईको सेंसिटिव जोन’’ के रूप में चिह्नित करने पर विचार किया गया। इन्हें दूसरे शब्दों में ‘‘आघात-अवशोषक/संक्रमण क्षेत्र’’ जोन भी को कहा गया।  

    ईको सेंसिटिव जोन के दायरे में आने वाले क्षेत्र में केंद्र सरकार व उसके द्वारा गठित मोनिटरिंग कमेटी का पूरा हस्तक्षेप होगा। भारत सरकार द्वारा उत्तराखंड के संबंध में जारी गजट के मुताबिक राज्य सरकार ऐसे क्षेत्रों के प्रयोजन के लिये अधिसूचना के प्रकाशन की तिथि से दो वर्ष के भीतर स्थानीय जनता, विशेषकर महिलाओं के परामर्श से एक आंचलिक महायोजना बनायेगी और उसे पर्यावरण एवं वन मंत्रालय भारत सरकार द्वारा अनुमोदित किया जाएगा। आंचलिक महायोजना पर्यावरण, वन, शहरी विकास, पर्यटन, नगरपालिका, राजस्व लोक निर्माण विभाग, पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, जल संसाधन, बागवानी पंचायती राज ग्रामीण विकास आदि जैसे राज्य के सभी संबन्धित विभागों की सम्यक भागीदारी से बनायी जाएगी व जल संभरण की अवधारणा पर बनायी जाएगी। यह सुनिश्चित किया जाएगा कि नदियों व सहायक नदियों के किनारे किसी प्रकार की संरचनाओं का निर्माण करके इनकी प्राकृतिक सीमाओं में परिवर्तन का कोई प्रयास नहीं किया जाएगा।

    इस जोन में विभिन्न भवनों, होटलों, रिसोर्ट के निर्माण को विनियमित किया गया है। इनको निर्माण में क्षेत्र की परंपरागत संकल्पनाओं और वास्तु का पूर्णतया पालन किया जाएगा। आंचलिक महायोजना के दिशा-निर्देशन में यह होगा।   

       गैर हरित उपयोगों के लिए हरित उपयोगों जैसे उद्यान क्षेत्रों, चाय बागानों, कृषि भूमि और अन्य जैसे स्थानों पर भूमि के उपयोग के परिवर्तन की अनुमति नहीं होगी। स्थानीय जनसंख्या की प्राकृतिक वृद्धि के कारण स्थानीय निवासियों की आवासीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए राज्य सरकार की सिफारिश पर केंद्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से कृषि भूमि के अत्यधिक सीमित परिवर्तन की अनुमति होगी। हरित क्षेत्र जैसे वन क्षेत्र, कृषि क्षेत्र आदि में कोई परिणामिक कटौती नहीं होगी। 5 किमी की लंबाई से अधिक के ई.सें.जो. में बिना कोलतार की सड़कों का निर्माण होगा। नए जल विद्युत संयंत्रों (बांध, नहर, जलाशयों के निर्माण) की स्थापना व विद्यमान संयंत्रों के विस्तार पर पाबंदी होगी। जबकि सूक्ष्म व लघु जल बिजली परियोजनाओं को विनियमित किया गया है।

    इसी प्रकार स्थानीय घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु खनिजों का खनन, पत्थर उत्खनन व क्रशिंग मोनिटरिंग कमेटी की अनुमति के बाद ही विशेष क्षेत्रों में सीमित रूप में किया जा सकेगा। पेड़ या पेड़ों की कटाई के संदर्भ में वन भूमि की दशा में राज्य सरकार की अनुमति के बिना और सरकारी, राजस्व या निजी भूमि की दशा में संबन्धित जिला कलक्टर राज्य सरकार की अनुमति से ही होगी। पर्वतारोहण व यातायात के वाहनों की आवाजाही को भी नियंत्रित किया जाएगा। ईको सेंसिटिव जोन वाले क्षेत्रों में पूरे ही देश भर के लिए कुछ छोटे-मोटे फेरबदल के साथ यही दिशा-निर्देशन है।

    केंद्र सरकार द्वारा जारी इस गजट से साफ है कि यह जहां उत्तराखंड में छोटे-बड़े लगभग 500-550 बांधों के निर्माण में लगे देशी-विदेशी पूंजीपति, खनन व कुछ हद तक जमीन आदि के कारोबार से जुड़े बड़े व्यवसाईयों के विरोध में जाता दिखाई दे रहा है क्योंकि इनसे जुड़े क्षेत्रों को गजट प्रतिबंधित करने की बात कहता है वहीं यह छोटे पूंजी के मालिकों के विरोध में भी दिखाई देता है जो कि होटल, रिजोर्ट व ट्रेवल एजेंसियों के मालिक व पर्यटन से जुड़े लोग हैं। हालांकि इनसे जुड़े क्षेत्रों को विनियमित करने की बात गजट में कही गई है। पर्यटन क्षेत्र को विनियमित किया गया है।

    जबकि हकीकत यह है कि ये सेंसिटिव जोन सबसे ज्यादा जिसके विरोध में हैं व जिनके अस्तित्व के लिए खतरा बनकर मंडरा रहे हैं वह है स्थानीय आबादी जो कि वन्य जीवों के संरक्षण के लिए बनाये गए राष्ट्रीय पार्क जैसे संरक्षित इलाकों के इर्द-गिर्द बसती है और अब ये इन संरक्षित इलाकों के लिए बनाए जा रहे ‘‘सेंसिटिव जोन’’ के दायरे में होंगे। यह आबादी एक ओर जंगली जानवरों का शिकार हो रही है, भय, दहशत व असुरक्षा में जी रही है। बच्चों, महिलाओं व मवेशियों को कभी भी जंगली जानवरों द्वारा अपना शिकार बना लेना आम बात हो गई है। इसके विपरीत स्थानीय आबादी द्वारा अपनी जिंदगी के खतरे में होने की स्थिति में भी आत्मसुरक्षार्थ आदमखोर जानवर को मार देना संगीन अपराध है जिसमें संगीन गैरजमानती धाराएं लगाकर जेल में ठूंस दिया जाता है।

     अक्सर ऐसे हादसे हो जाने पर यह कह कर इतिश्री कर दी जाती है कि जंगली जानवरों से उनके इलाके ‘‘मनुष्य’’ द्वारा छीन लेने या अतिक्रमित करने का ही यह नतीजा है। दूसरी ओर इस नुकसान के साथ साथ महीनों की मेहनत से तैयार फसलों को ये जानवर तबाह बरबाद कर देते हैं। साथ ही ‘‘पर्यावरण संरक्षण’’ की इस नीति ने इन लोगों को चारे व लकड़ी से भी महरूम कर दिया है। इसके अलावा यह आबादी विस्थापन का दंश भी झेल रही है। ईको जोन बनने के बाद अब एक ओर जंगली जानवरों का खतरा कई गुना बढ़ जाएगा साथ ही छोटे से निर्माण कार्यों, लकड़ी (ईंधन हेतु) काटने आदि के लिए भी अनुमति की लंबी व समयखाऊ लालफीताशाही प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा। इसी के साथ यह भी हकीकत है कि जिस बेतरतीब, अनियंत्रित व अराजकपूर्ण तरीके से यहां जिन इलाकों में जल विद्युत परियोजनाएं, खनन आदि की योजनाएं इनकी जिंदगी को कुर्बान कर परवान चढ़ायी गई है या कोशिश हो रही है वहां-वहां स्थानीय आबादी ने इसका तीखा प्रतिरोध किया है।

    यदि केवल उत्तराखण्ड की बात की जाय तो मौजूदा गोमुख से उत्तरकाशी तक घोषित ‘सेंसिटिव जोन’ से सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 88 गांव प्रभावित हो रहे हैं। समूचे देश की बात की जाय तो ‘‘पर्यावरण संरक्षण’’ के इस खतरे की जद में आने वाली आबादी की तबाही बरबादी की तस्वीर को समझा जा सकता है। देश भर में ‘‘वन एवं वन्य जीव संरक्षण’’ के लिए लगभग 668 संरक्षित क्षेत्रों के अंतर्गत 1,61,221.57 वर्ग किमी जमीन घिरी हुई है जो कि पूरे भौगोलिक क्षेत्र का 4.90 प्रतिशत है। यदि 10 किमी. तक या इससे कम का दायरा भी इन संरक्षित क्षेत्रों के लिए ‘‘आघात अवशोषक’’ के रूप में ईको जोन बनाने में चला जाता है तो तबाह-बरबाद होने वाली आबादी का अनुपात भी बढ़ता चला जाएगा।

     इसलिए स्वाभाविक है कि संरक्षित क्षेत्रों के इर्द-गिर्द बन रहे ईको सेंसिटिव जोन का विरोध होगा ही। विरोध एक ओर बांधों व खनन आदि में निवेश की गई बड़ी पूंजी का है जिनकी चिंता का विषय है कि कैसे उनकी पूंजी लगातार बढ़ती जाय। यही मुनाफे की चिंता छोटे पूंजी के मालिकों यानी होटल, रिजोर्ट व ट्रेवल एजेंसी चलाने वालों की भी है। जबकि इसके विपरीत स्थानीय आबादी के लिए यह अस्तित्व का संकट है। लगभग यही स्थिति कम या ज्यादा प्रभाव में पूरे ही देश में है।

‘‘पर्यावरण संरक्षण’’ या ‘‘पर्यावरण संकट’’ का राजनीतिक अर्थशास्त्र  

    पिछले दो तीन दशकों से ‘ग्लोबल वार्मिंग’ ‘जलवायु परिवर्तन’ पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हो रहे सम्मेलनों की रिपोर्टों के जरिये लगातार यह स्थापित किया जा रहा है कि मौजूदा वक्त में ‘‘मानवता’’ के लिए सबसे बड़ा खतरा ‘‘पर्यावरण संकट’’ का है। ‘‘मानव समाज’’ के अस्तित्व के लिए सबसे बड़े खतरे के रूप में इस संकट को खूब जोर-शोर से बढ़ा-चढ़ा कर प्रचारित किया जा रहा है। ऐसा यूं ही नहीं किया जा रहा है बल्कि एक सोची समझी रणनीति के बतौर यह किया जा रहा है। इसी के साथ इस रणनीति के तहत यह भी स्थापित किया जा रहा है कि इस ‘‘गंभीर संकट’’ के लिए ‘समूचा मानव समाज’ जिम्मेदार है, जवाबदेह है। यह सब किया जा रहा है साम्राज्यवादी मुल्कों द्वारा और उनके साथ हैं उनसे कुछ पाने व सौदेबाजी की कोशिश में कंधे से कंधा मिलाते भारत, चीन, ब्राजील आदि जैसे मुल्कों के पूंजीवादी शासक।

    साम्राज्यवादी मुल्कों द्वारा खड़ी की गई विभिन्न पर्यावरण संबंधी संस्थाएं व संगठन अलग-अलग वक्त पर पर्यावरण के संबंध में अपनी अतिरेक भरी रिपोर्ट प्रस्तुत करते हैं और फिर विकासशील पूंजीवादी मुल्कों व पिछड़े मुल्कों की पिछड़ी तकनीक पर सवालिया निशान खड़ा करते हैं और उन पर दबाव बनाते हैं ताकि ये इन्हें अपने मालों व तकनीक का निर्यात कर सकें तथा अनुदान लेने का जोखिम उठायें। और इसके विपरीत भारत, चीन, ब्राजील आदि जैसे पूंजीवादी मुल्क व इनके नेतृत्व में एकजुट हुए मुल्क इन साम्राज्यवादी मुल्कों पर ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करने का दबाव बनाकर उनसे तकनीक सुविधायें व आर्थिक सहायता हासिल करने की कोशिश करते हैं।

    ग्लोबल वार्मिंग का अर्थ है पृथ्वी के औसत वैश्विक तापमान में बढ़ोत्तरी। ग्लोबल वार्मिंग के लिए ग्रीन हाउस गैसों की बढ़ोत्तरी को जिम्मेदार ठहराया जाता है। प्राकृतिक तौर पर जो ग्रीन हाउस गैस मुख्य तौर पर पायी जाती है- वह है कार्बन डाई आक्साइड, मेथेन, नाइट्रस आक्साइड। यही वो गैसें हैं जो यदि ना होतीं तो पृथ्वी का औसत तापमान -18 डिग्री सेन्टीग्रेड होता लेकिन तब यहां जीवन ही संभव नहीं होता। ये ग्रीन हाउस गैस भी प्रकृति के विकास क्रम में एक दौर में बने जिसका ही यह परिणाम हुआ कि पृथ्वी का औसत तापमान 15 डिग्री सेन्टीग्रेड हुआ और यहां जीवन संभव हो सका। लेकिन इन ग्रीन हाउस गैसों का अपने एक संतुलित सांद्रता स्तर से अत्यधिक होते जाना भी जीवन के लिए खतरा है।

    जबकि फ्लोरिनेटेड गैस मसलन हाइड्रो फ्लोरो कार्बन, परफ्लोरो कार्बन व सल्फर हेक्साफ्लोराइड भी ग्रीन हाउस गैस हैं जोकि हाई ग्लोबल वार्मिंग पोटेन्शियल गैस कहलाती हैं यह संश्लेषित हैं और 19 वीं सदी में बनाई गई हैं।

    पर्यावरण संबंधी संस्थाओं की ‘‘पर्यावरण संकट’’ की रिपोर्ट का जिक्र किया जाय। जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र की जलवायु परिवर्तन संबंधी संस्था अंतरसरकारीय पेनल (आई.पी.सी.सी.) के चेयरमेन ने 2007 में चेताया कि 2035 तक हिमालयन ग्लेशियर के लगभग गायब हो जाने की संभावना है। इनके पिघलने के चलते पहले भयानक बाढ़ तो फिर सूखा पड़ेगा। और पर्यावरण संबंधी विभिन्न एजेंसियों द्वारा कहा जा रहा है कि यह सब ‘‘ग्लोबल वार्मिंग’’ के चलते होगा। इसी की वजह से अंटार्कटिका की बर्फ पिघलेगी, समुद्र का जल स्तर बढ़ेगा, मौसम में अप्रत्याशित परिवर्तन होंगे, जीव की कई प्रजातियां विलुप्त हो जाएगीं, कई तटीय शहर व द्वीप जलमग्न हो जाएगें। अकाल व महामारी जैसी स्थिति पैदा होगी। पारितंत्र के गड़बड़ाने की बात कही गई।

    संयुक्त राष्ट्र के इसी पेनल ने 2007 की अपनी रिपोर्ट में कहा कि वायुमंडल में कार्बन डाई आक्साइड की सांद्रता 450 पीपीएम से ऊपर तक नहीं पहुंचना चाहिये। नासा के निर्देशक हनसेन ने कहा कि अंततः कार्बन डाइ आक्साइड का सुरक्षित स्तर 350 पीपीएम से और अधिक नहीं होना चाहिए। लेकिन यह स्तर 2010 तक इसे पार कर 387 पीपीएम हो गया।

     वातावरण में कार्बन डाई आक्साइड की सांन्द्रता समुद्र व पेड़-पौधों द्वारा इसको सोखने के बावजूद अधिक तेजी से बढ़ रही है। कार्बन डाई आक्साइड का सांद्रता स्तर 2000-2009 के बीच 2.0 पी.पी.एम. प्रति साल की दर से बढ़ी। औद्योगिक क्रान्ति से पहले इसकी सांद्रता 280 पी.पी.एम.( पार्ट पर मिलियन) थी जो कि 2 मई 2013 को 400 पीपीएम के स्तर तक पहुंच गया हालांकि फिर यह नीचे गिर गया।

     लेकिन जो अतिरेक भरे खतरे इन संस्थाओं ने व पर्यावरणवादियों ने बताए थे, प्रकृति ने जल्दी ही इनकी भविष्यवाणियों व निष्कर्षों की हकीकत को उजागर कर दिया व साथ ही प्रकृति को ना समझ पाने की इनकी सीमा को भी। इसके अलावा भारत में ग्लेशियरों के पिघलने(जलवायु परिवर्तन पर) पर बढ़ा चढ़ा कर जो रिपोर्ट राजेन्द्र पचौरी (आई.पी.सी.सी. के अध्यक्ष) नामक महोदय ने पेश की थी, उसकी हकीकत भी उजागर हो गई थी। तब पचौरी महोदय के इस्तीफा देने की नौबत आ गयी थी और उन्हें कहना पड़ा ‘‘वास्तव में इस बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है कि हिमालयी ग्लेशियर किस दर से पिघल रहे हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत में या दक्षेस (दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन) देशों में ग्लेशियर पिघलने के मुद्दे पर कोई अनुसंधान नहीं हो रहा है। हमें ग्लेशियरों के पिघलने की सही गणना और मूल्यांकन के लिए एक योजना बनानी चाहिए’’(स्रोतः वन इंडिया हिन्दी साइट 23 जन. 2010)। पृथ्वी पर कभी गरम होना मतलब इसके तापमान का बढ़ जाना या कभी तापमान का कम हो जाना या हिमयुग की सी स्थिति का हो जाना कोई प्रकृति के हिसाब से कोई  अप्रत्याशित घटना नही रही है। लगभग साढ़े 4 अरब वर्ष पुरानी पृथ्वी के यदि पिछले 80-90 लाख सालों के इतिहास में ही झांके तो ऐसे ‘पड़ाव’ इस दौर में आये हैं। रही वनस्पतियों व जंतुओं के विलुप्त होने की बात तो यह सब भी पहले होता रहा है। आर्किओप्टेरिक्स से लेकर डायनासोर तक कई उदाहरण मिल जाएंगें।

    लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि पर्यावरण का कोई संकट किसी भी रूप में मौजूद नही है। यह संकट अलग-अलग रूपों में मौजूद है। अब यदि ग्रीन हाउस गैसों के सम्बन्ध में 2004 के आंकड़ों के हिसाब से बात की जाय तो कुल ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में 77 प्रतिशत कार्बन डाई आक्साइड, 14.3 प्रतिशत मेथेन, 7.96 प्रतिशत नाइट्रस आक्साइड व 1.1प्रतिशत फ्लोरिनेटेड गैस का हिस्सा है।

     2005 के आंकड़ों के मुताबिक वैश्विक स्तर पर ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन में- 24.9प्रतिशत बिजली व ऊर्जा क्षेत्र, 14.3प्रतिशत परिवहन, 13.8प्रतिशत कृषि, 12.2प्रतिशत भू-इस्तेमाल में परिवर्तन, 14.7प्रतिशत उद्योगों, 8.6प्रतिशत दूसरे ईंधन जलाने, 3.2प्रतिशत वेस्ट व 4.3प्रतिशत अन्य तरीके से उत्सर्जन का हिस्सा रहा है।

     वैश्विक स्तर पर ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में 1890-2007 के दौरान संचयी तौर पर हुई बढ़ोत्तरी में देशों की भागेदारी के लिहाज से बात की जाय तो इसमें पहला दर्जा साम्राज्यवादी मुल्क अमेरिका का है। कुल उत्सर्जन का 28प्रतिशत के लिए यह जिम्मेदार है, यूरोपीयन यूनियन 23प्रतिशत, रूस 11प्रतिशत, चीन 9प्रतिशत, जापान 4प्रतिशत, भारत 3प्रतिशत, ओ.ई.सी.डी. के अन्य देश 5प्रतिशत तो शेष दुनिया ने 18प्रतिशत ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन किया है। ग्रीन हाउस गैसों के बढ़ने से पिछली एक सदी में वैश्विक तापमान में औसतन 1.4 डिग्री फारेनहाइट(0.8 डिग्री  सेन्टीग्रेड) की बढ़ोत्तरी हुई है।

    2011 के आंकड़ों के मुताबिक --चीन ने  97 अरब टन फिर अमेरिका 54 अरब टन, दक्षिणी कोरिया 6.1अरब टन, कनाडा 5.6अरब टन, भारत लगभग 19.7अरब टन, रूस 18.3अरब टन, जापान 12.4 अरब टन व जर्मनी 8अरब टन कार्बन डाइ आक्साइड का उत्सर्जन किया।

     प्रति व्यक्ति उत्सर्जन के लिहाज से बात की जाय तो अमेरिका टाप पर है- 17.3टन, कनाडा 16.2टन, रूस 12.8टन, दक्षिणी कोरिया 12.6टन, जर्मनी 9.9टन, जापान 9.8 टन, चीन 7.2टन, भारत 1.6टन प्रति व्यक्ति के लिहाज से पैदा करता है।

     अतः इस ग्लोबल वार्मिंग या ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए एक ओर भारत, चीन, ब्राजील आदि आदि जैसे पूंजीवादी मुल्क भी जिम्मेदार है वहीं दूसरी ओर सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं- साम्राज्यवादी मुल्क। साम्राज्यवादी मुल्कों द्वारा न केवल इस सदी में बल्कि पिछले तीन-चार सौ सालों से पूंजीवादी विकास के दौरान प्रकृति का जमकर दोहन किया है। अपने मालों की बिक्री के लिए बाजार, सस्ते श्रम व प्राकृतिक संसाधनों की तलाश में दुनिया भर की खाक छानते ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, अमेरिका आदि साम्राज्यवादी मुल्कों के पूंजीपति वर्ग ने प्रकृति को अपूरणीय क्षति पहुंचायी है। प्रकृति ही नहीं बल्कि पूंजीपति वर्ग की शब्दावली में कहा जाय तो इसने ‘मानवीय संसाधनों’ का भी खूब दोहन किया है व इसे तबाह बरबाद भी किया है।

     लेकिन जिस प्रकार पूंजीपति वर्ग अपने हर हितों को आम जनता के हितों के रूप में प्रचारित करता है और अपने हर संकट का बोझ मजदूर वर्ग समेत आम मेहनतकश जनसमुदाय पर डाल देता है जैसा कि 2008 के मंदी के संकट में जब दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं तबाह होने की ओर बढ़ीं तब ‘‘मुनाफा निजी, घाटा सार्वजनिक’’ की तर्क पर घोषणा करके हजारों खरब डालर का ‘बेल आउट पैकेज’ पूंजीपति वर्ग पर लुटा कर उन्हें डूबने से बचाया गया। अलग-अलग देशों के संदर्भ में बात की जाय तो साम्राज्यवादी मुल्कों द्वारा अपने मुल्कों के पूंजीपति वर्ग को बचाने के साथ-साथ अपने आर्थिक संकट का बोझ अपने से कमजोर पूंजीवादी मुल्कों पर ‘आस्टीयरिटी (कटौती) पैकेज’ या ‘नए आर्थिक सुधारों’ को तेज गति से लागू करने के दबाव के रूप में डाला गया। देश के भीतर की बात की जाय तो इन पूंजीवादी मुल्क के शासकों ने (भारत, चीन आदि जैसे) अपने-अपने पूंजीपति वर्ग के संकट का बोझ अपने देश के मजदूर-मेहनतकश आबादी पर डाला।

    ठीक इसी तर्ज पर व अलग-अलग तरीकों से यही सब कुछ भिन्न रूपों में ‘पारिस्थितिक असंतुलन’ ‘पर्यावरण संकट’ का हौव्वा खड़ा करके किया जा रहा है। साम्राज्यवादी मुल्क इस प्रक्रिया में एक ओर ढ़ेर सारे अलग-अलग प्रकार के गैर सरकारी संगठनों का जाल खड़ा करते हैं जो कि भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में कार्य करते हैं जो ‘‘पर्यावरण संरक्षण’’, ‘‘वन संरक्षण’’ व ‘‘वन्य जीव संरक्षण’’ का नारा बुलंद करते हैं। दुनिया के लगभग सभी मुल्कों तक इनकी पैठ बनी हुई है और इनके माध्यम से ये एक ओर अपने आर्थिक-राजनीतिक हितों का ताना-बाना रचते हैं तो दूसरी ओर पर्यावरण संकट को हल करने के नाम पर जो संस्थाएं वजूद में आती हैं, जो पर्यावरणीय या जलवायु परिवर्तन पर सम्मेलन होते हैं इनमें भी इन्हीं का दबदबा होता है। और जहां ये साम्राज्यवादी मुल्क अपनी जरूरतों के हिसाब से पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में दिशानिर्देश प्रस्तुत करते हैं और कम विकसित पूंजीवादी मुल्कों पर इसे लागू करने का दबाव बनाते है। जबकि कम विकसित पूंजीवादी मुल्क के शासक अपनी जरूरतों का समीकरण बनाकर एक तरफ इनसे समझौता कर लेते हैं दूसरी ओर खुद देश के भीतर इस सबका बोझ पर्यावरण संरक्षण के नाम पर आम जनता पर डाल देते है। खुद साम्राज्यवादी मुल्क के भीतर भी यह बोझ उनकी आम जनता पर डाला जाता है।

    पर्यावरण संरक्षण की यह प्रक्रिया हालांकि एक सदी पहले से ही घट रही थी कि तब ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन आदि जैसे यूरोपियन साम्राज्यवादी मुल्कों ने 1900 ई. के आस-पास ‘वन्य जंतुओं’ को बचाने के नाम पर लंदन में पहला अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन किया। इसके बाद तत्काल ही भारत, अफ्रीका सहित उपनिवेशों में इन्होंने शिकार, मनोरंजन, खेल व अन्य आर्थिक जरूरतों को हल करने के लिए ‘अभ्यारण्य’ व ‘राष्ट्रीय पार्क’ बनाए। हालांकि पहला राष्ट्रीय पार्क 1872 में यलोस्टोन में बन गया था। तब से अब तक दुनिया में 1000 से ज्यादा ऐसे पार्क (भारत में 102) अस्तित्व में आ गए हैं। ये ऐसे इलाके हैं जहां से स्थानीय आबादी को उसकी अपनी जमीन से बेदखल कर दिया गया, चारे व लकड़ी से भी उन्हें वंचित कर दिया गया। बाद में फिर 1961 में ‘विश्व वन्य जीवन फंड’ [W.W.F.] की स्थापना भी कर दी गई जिसको साम्राज्यवादी मुल्कों व उसकी बहुर्राष्ट्रीय कंपनियों द्वारा भरपूर फंडिंग होती है। 2010 में इसे 800 लाख डालर(लगभग 432 करोड़ रुपये) का फंड दिया गया था। जबकि सरकारों, कारपोरेट से फंड ना लेकर अलग-अलग व्यक्तियों से फंड लेने का दावा करने वाला ‘ग्रीन पीस’ नाम के एन. जी. ओ. ने 2008 में 2025 लाख यूरो फंड के रूप में प्राप्त किया है और 40 से अधिक देशों में कई लाख सदस्यों के साथ काफी मजबूत स्थिति में है। ‘बाघ बचाओ’ के रूप में भी ये खुद को प्रकट करते रहते है। अब ये ‘ईको सेंसिटिव जोन’ के पक्ष में भी हैं व इसके समर्थन में लामबंद भी होते हैं।

    इतना ही नहीं इन साम्राज्यवादी निगमों के टुकड़ों पर पलने वाले गैर सरकारी संगठनों व पर्यावरणवादियों द्वारा एक दौर में यह भी प्रचारित किया गया कि कम विकसित पूंजीवादी मुल्क या गरीब व पिछड़े मुल्क के लोग ईधन के रूप में व मकान के लिए लकड़ी का इस्तेमाल करते हैं, जंगल का इस्तेमाल चारे के लिए करते हैं जिस कारण वातावरण में ज्यादा ग्रीन हाउस गैस मुक्त हो रही है। यह प्रदूषण फैला रहे हैं। नतीजतन गांवों, देहातों में रहने वाले आबादी से लकड़ी, चारा आदि भी छीन लिया गया। वनों पर उनका हस्तक्षेप खत्म करके शासकों ने अपना प्रभुत्व कायम कर लिया। इसके विकल्प के बतौर इन्होंने अपने उत्पाद लेने का दबाव बनाया या इस ओर प्रेरित किया, अपनी घुसपैठ बनाई और विनाशकारी परमाणु संयंत्रों को ऊर्जा जरूरत को पूरा करने के नाम पर जहां-तहां और बड़े पैमाने पर स्थापित किया जा रहा है।

    पूंजीवादी विकास की विद्रूपता वाले पक्ष ( बढ़ता शहरीकरण व प्रकृति से बढ़ता अलगाव) पर जोर देने व इसे एकांगी नजरिए से देखने के चलते पर्यावरणवादियों की एक और धारा पैदा हुई जो कि खुद इंग्लैंड व फ्रांस आदि जैसे मुल्कों में औद्योगीकरण के दौर में दिखी। जिनका नारा था ‘‘वापस जमीन की ओर’’। ये अतीतग्रस्तता के शिकार थे। गांव या देहात का प्राकृतिक वातावरण व उसका सान्निध्य इन्हें रात-दिन बेचैन किए रहता था। औद्योगीकरण के ये विरोधी थे व समाज विकास की धारा को फिर पीछे धकेलते हुए ‘कृषि समाज’ की स्थापना करना चाहते थे। यह आज भी मौजूद है। महात्मा गांधी इसी श्रेणी के थे। इन्हीं के अनुयायी मेधा पाटेकर, सुंदर लाल बहुगुणा आदि आदि हैं। यहां ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’, ‘चिपको आंदोलन’ के रूप में, तो कीनिया में ‘ग्रीन बेल्ट’ व ब्राजील में ‘चीकों’ आदि के नाम से प्रसिद्ध है। गैर सरकारी संगठन के रूप में यह भी तमाम जगह मौजूद है। देशी-विदेशी पूंजी अपने हितों के अनुरूप इन्हें फंड प्रदान करती है।

    पर्यावरणवादियों व गैरसरकारी संगठनों की ऐसी धारा भी है जो मुक्त प्रतियोगिता वाले पूंजीवाद की अराजकता व अनियंत्रित विकास के विरोधी हंै। इन्हें लगता है कि अलग-अलग पूंजी या उसका स्वामी- पूंजीपति पर किसी का नियंत्रण ना होने के चलते प्राकृतिक संसाधनों का जमकर दोहन करते हैं जिसके चलते आने वाले वक्त में संसाधन आने वाली पीढ़ी के लिए खत्म हो जाएंगे। इसलिए ये ‘‘सस्टेनेबल डेवलपमेंट’’(नियंत्रित विकास) की बात करते हैं। इस प्रकार प्रकारांतर से ये राज्य नियंत्रित पूंजीवाद की वकालत करते हैं, साम्राज्यवादी मुल्कों द्वारा इन्हें भी खड़ा किया गया है।

    इसी के ठीक विपरीत पर्यावरणवादियों व गैर सरकारी संगठनों की एक और धारा है जिनका नारा है ‘राष्ट्रीयकरण नहीं-नहीं’ ‘निजीकरण नहीं-नहीं’। राष्ट्रीयकरण व निजीकरण के विरोध में नारा उछालकर ये फिर अगला नारा देते हैं ‘जल-जंगल-जमीन पर नियंत्रण हो- स्थानीय आबादी का’, ‘जल-जंगल जमीन पर अधिकार हो- स्थानीय समुदाय का’। इस प्रकार ये ‘कम्युनिटी बेस्ड मैनेजमेंट’(समुदाय आधारित प्रबंधन) की बात करते है। इसकी प्रस्तोता अमेरिका के व्हनइंडियाना विश्वविद्यालय की प्रोफेसर एलीनोर ओस्ट्रम को 2009 में नोबल पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका है। अमेरिकन साम्राज्यवादी मुल्क द्वारा ही इसे भी खाद पानी मुहैय्या करवाया जा रहा है। ‘जल-जंगल-जमीन हमारी(स्थानीय समुदाय की) --- नहीं सहेंगे धौंस तुम्हारी’ का स्लोगन आजकल खूब प्रचलन में यूं ही नहीं है। ये ‘नदी बचाओ आंदोलन’ के रूप में भी खुद को प्रकट कर रहे हैं। यह नारा जितना ‘मनमोहक’ ‘लुभावना’ है उतना ही ज्यादा खतरनाक भी है।

भारत में काम करने वाले पर्यावरण व वन्य जीव संरक्षण के लिये काम करने वाले कुछ एन.जी.ओ.-

    1- एक्सनोरा इंटरनेशनल 2;- ग्रामीण तकनीकी व गैरपरम्परागत ऊर्जा एजेन्सी, 3 विज्ञान व पर्यावरण केन्द्र, 4- सीयर (C.E.R.E.) मुंबई भारत,  5- ग्रीन पीस, 6- विश्व वन्य जीवन फण्ड , 7- स्वच्छ अहमदाबाद अभियान,  8- गांधी पीस फाउन्डेशन,  9- कल्पवृक्ष, दिल्ली  10- दशोली ग्राम स्वराज्य मण्डल गोपेश्वर1964(चिपको आन्दोलन से जुड़ा हुआ) उत्तराखण्ड, 11- फ्रेन्ड्स आफ दून उत्तराखण्ड 1983,  12- एंटी न्यूक्लियर मूवमेंट।  

(ऐसे गैर सरकारी संगठनों की देश में भरमार है।)      

 कुल मिलाकर जितने भी प्रकार के ये पर्यावरणवादी या पर्यावरण के संबंध में गैर सरकारी संगठन हैं, साम्राज्यवादी-पूंजीवादी शासक इनके द्वारा पर्यावरण संकट का हौव्वा खड़ा करके वर्तमान पूंजीवादी समाज के वर्गीय अंतर्विरोधों पर पर्दा डालते हैं। जिस भी हद तक पारिस्थितिकीय असंतुलन पैदा हुआ है, पर्यावरण संकट पैदा हुआ है। उसके संबंध में कहा जाता है, प्रचारित व स्थापित किया जाता है कि इस संकट के लिए ‘‘पूरा मानव समाज’’ जिम्मेदार है कि ‘‘मानवीय गतिविधियों’’ के चलते यह संकट पैदा हुआ है। पूंजीपति वर्ग या दूसरे रूप में पूंजीवादी व्यवस्था को जिसने यह संकट पैदा किया है उसे निशाना ना बनाया जा सके, उस पर कोई आंच ना आ पाये साम्राज्यवादी-पूंजीवादी शासकों द्वारा इसके लिए हर हथकंडे अपनाए जाते हैं और यह दीगर बात है कि पूंजीवादी व्यवस्था के रहते हुए ‘पर्यावरण संकट’ का हल बेमानी बात है। यह इस तंत्र के रहते संभव ही नहीं है। इसीलिए ‘जलवायु परिवर्तन’ पर होने वाले सम्मेलनों में इसे हल करने को नीम हकीमी नुस्खे अपनाए जाते हैं। लेकिन साम्राज्यवादी मुल्क ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के समझौते को लागू करने से भी मुकर जाते हैं।

      जलवायु परिवर्तन पर हुए संयुक्त राष्ट्र के प्रारूप सम्मलेन ‘क्योटो प्रोटोकाल’ के तहत साम्राज्यवादी मुल्कों व अन्य विकसित पूंजीवादी मुल्कों ने वर्ष 1990 की तुलना में 5.2प्रतिशत ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती की कानूनी बाध्यता थी जबकि भारत, चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका( विकासशील पूंजीवादी मुल्कों को) आदि जैसे पूंजीवादी मुल्कों को छूट थी। हालांकि ‘आम लेकिन विभेदित जिम्मेदारियां’ निर्धारित की गई जिसके तहत इन्हें भी कटौती में जिम्मेदारी उठानी थी। क्योटो के तहत ही  ‘‘कैप एंड ट्रेड’’ (कार्बन क्रेडिट) जैसी व्यवस्था भी थी  जिसमें ‘‘कार्बन व्यापार’’ को प्रोत्साहित किया गया। इसके तहत कोई मुल्क या कंपनी निर्धारित दर से तय कार्बन से कम कार्बन उत्सर्जित कर या दूसरी कंपनी या मुल्क द्वारा उत्सर्जित कार्बन को अवशोषित करके इसकी रेटिंग कराकर इसे बेच सकता था। इसके लिए किसी मुल्क को करना यही था कि पर्यावरण संरक्षण के नाम पर ‘जंगलों’ का निर्माण किया जाय जोकि ‘कार्बन सिंक’ के रूप में बन जाये जो कि दूसरे मुल्कों के कार्बन उत्सर्जन को सोखे। एक ओर साम्राज्यवादी मुल्कों विशेषकर अमेरिका ने अपने लिए निर्धारित कार्बन उत्सर्जन कटौती से इंकार कर दिया तो दूसरी ओर दबाव बनाया गया कि अन्य मुल्क अपने यहां ‘कार्बन सिंक’ बनाएं और इस प्रकार ‘ग्रीन इकानोमी’ के दम पर ‘ग्रीन बोनस’ हासिल करें। और विकासशील पूंजीवादी मुल्कों ने आर्थिक मदद(लोन नहीं) व तकनीक देने का दबाव इन पर बनाया। इस प्रकार ये सम्मेलन सौदेबाजी के मंच भी बन गए। वर्तमान में भारत में बन रहे ‘ईको सेंसिटिव जोन’ को इसी आधार पर समझा जा सकता है। साथ ही यह भी कि क्यों भारतीय शासकों का इस पर इतना जोर है। यह भी ध्यान में रखना होगा कि भारतीय पूंजीपति भी प्राकृतिक संसाधनों के दोहन में दूसरो से पीछे नहीं हैं।

    जिस प्रकार इंग्लैंड में 16वीं सदी में पूंजीवादी विकास के लिए किसानों से उनकी जमीनें छीनकर व उन्हें खदेड़ कर पूंजीपति वर्ग ने भेड़ों के ऊन के लिए कृषि जमीन की बाड़ाबन्दी कर दी ताकि अकूत मुनाफा हासिल किया जा सके। इस प्रकार कृषि जमीन को चारागाह में बदल दिया। स्काटलैंड के सदर में पूंजीपति वर्ग ने 1814-20 तक पूरे प्रदेश में इसी मुनाफे से प्रेरित होकर किसानों को खदेड़ कर भेड़ पालन के लिए कृषि भूमि को तबाह कर दिया। 16वीं सदी में यूरोप के पूंजीपतियों ने अमेरिका में सोने-चांदी के खनन के लिए 5 करोड़ की आदिवासी आबादी को उनकी जमीन से बेदखल करके उन्हें मारकाट कर नष्ट कर दिया। इजटेक व इंका सभ्यतावासियों को नष्ट कर दिया। अफ्रीका के लोगों को गुलाम बनाकर इन धातुओं के निष्कर्षण में झोंक दिया गया। और 19वीं सदी के पांचवें व छठे दशक में अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने उर्वरा जमीन की तलाश में 94 द्वीप कब्जा लिए। प्रकृति के दोहन व इसे नष्ट-भ्रष्ट करने की पूंजीपति वर्ग के ऐसे कारनामों से इतिहास भरा पड़ा है। लगभग थोड़े बदले हुए रूप में व सभ्य तरीके से वही काम भारत में विशेषकर खनिज पदार्थों के खनन के क्षेत्र में मध्य भारत में टाटा, जिंदल, एस्सार, मित्तल आदि जैसे देशी-विदेशी पूंजीपति मिलकर कर रहे हैं। उनकी सेना व सरकार उनके इस अभियान में शामिल है। पास्को, वेदांता, अदानी आदि-आदि जैसे सैकड़ों उदाहरण हो सकते हैं। यही वो बिन्दु हैं जहां अन्य मामलों की तरह पूंजीवादी सरकारों का पाखंड व दोहरा रुख सामने आ जाता है यानि जहां पूंजीपति वर्ग की जरूरत है वहां किन्तु-परंतु के साथ पर्यावरण को तहस-नहस करने की छूट दे दी जाती है। यही ईको सेंसिटिव जोन वाले मामले में भी होगा। खनन व जल विद्युत परियोजनाओं के संबंध में जो रोक है कि इसमें लगी देशी-विदेशी बड़ी पूंजी को किसी न किसी प्रकार राहत दे दी जायेगी भले ही इसमें वक्त लगे। इससे छोटी पूंजी के मालिकों को तो केवल विनियमित किया गया है और वह ‘ग्रीन बोनस’ जो अलग प्रांतों की हैसियत के हिसाब से होगा यह इस काम आयेगा। मुसीबत तो अंततः स्थानीय किसान और खेतिहर मजदूर आबादी ही है।

    एक भारतीय एन.जी.ओ. व पूंजीपति के संदर्भ में तथ्य: मुंबई बेस्ड एक एनजीओ सीईआरई इंडिया 2002 में पर्यावरण संरक्षण के लिए स्थापित हुआ। इसे टाटा कैपिटल, टाटा कंसल्टेंसी सर्विस हिंदुस्तान यूनिलीवर द्वारा फंड दिया जाता है जिनमें से टाटा की कंपनी भी है। अब इस ‘परोपकारी’ टाटा की बात की जाय। केरल सरकार ने हाईकोर्ट में टाटा के खिलाफ 3000 एकड़ जमीन कब्जाने के आरोप में शपथपत्र लगाया गया है। इसी रतन टाटा ने भोपाल गैस कांड के लिए जिम्मेदार यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री के लिए राहत पैकेज प्रस्तावित किया है व यहां डाऊ कैमिकल्स को निवेश की सुविधा की है। पश्चिमी बंगाल में लार्सेन-टर्बो व टाटा स्टील के संयुक्त उपक्रम धमरा (dhamra) पोर्ट को गहिरमथा सेंचुरी व भीतेरकनिका राष्ट्रीय पार्क के पास स्थापित किया गया। टाटा समूह तंजानिया में सोडा राख निष्कर्षण फैक्ट्री बनाने के लिए प्रयासरत है। इसके नजदीक नट्रोन झील होने के चलते पर्यावरणीय कारणों से लगभग 22 दक्षिण अफ्रीकी मुल्क इस प्लांट के विरोध में हैं।

    (पर्यावरण संरक्षण के पाखंड को उजागर करता तथ्य)


        दरअसल यही पूंजीवादी व्यवस्था की खासियत है अधिकाधिक मुनाफे के लिए होने वाला अनियंत्रित व अराजक उत्पादन, अनियोजित उत्पादन इसका लक्षण है। एक ओर यह अलग-थलग पड़ी आबादी की जड़ता को तोड़ देता है और उन्हें अपने दायरे में समेट देता है उनमें सक्रियता का संचार कर देता है। विज्ञान व तकनीकी को ऊंचे धरातल पर पहुंचाकर समाज को एक नए धरातल पर खड़ा कर देता है जिसकी कि इससे पहले के समाज में कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। परिवहन, संचार, चिकित्सा विज्ञान में हुए क्रांतिकारी बदलाव ने पूरे समाज को नए मुकाम पर खड़ा किया है। लेकिन वहीं दूसरी ओर इसने आबादी को कुछ बड़े-बड़े जगहों पर इकट्ठा कर दिया है। प्रकृति व मानव के बीच एक गहरा अलगाव को पैदा कर दिया है। इसने ना केवल प्रकृति का दोहन करके अंधाधुंध रसायनों का प्रयोग करके मृदा, जल व वायु को प्रदूषित किया है व अपने नियंत्रण को बनाए रखने के लिए जैव रासायनिक व परमाणु हथियारों के जरिये जीवन के लिए खतरनाक विकिरण भी पैदा किया है बल्कि गरीबी कंगाली आदि के रूप में समाज के एक बड़े हिस्से का अमानवीयकरण भी किया है। लेकिन अपनी विकास की इस प्रक्रिया में पूंजीवाद ने समाजवादी व्यवस्था के निर्माण के लिए पूर्वाधार भी तैयार किया है। मजदूर वर्ग के अधिनायकत्व में समाजवादी व्यवस्था उत्पादन के साधनों पर मालिकाने के जरिये तत्काल ही पूंजीवादी अनियंत्रित, अराजक होड़ व उत्पादन को खत्म कर देगा। नियोजित योजनाबद्धता के साथ प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाते हुए, गांव व शहर के अंतर को कम करते हुए पारिस्थितिकीय असंतुलन व पर्यावरण संकट को हल करेगा।       

        स्रोतः weakipedia , book-  varieties of environmentalist  by ramchandra guhaa @ j- martinez alier, monthly review, environmental site, list of N.G.O. site, wwf site, green peace site, मनुष्य की भौतिक संपदा

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