अंक : 01-15 Mar, 2014 (Year 17, Issue 05)

आपका नजरिया- आरक्षण क्या है? और क्यों जरूरी है


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    आरक्षण व्यवस्था भारतीय इतिहास के लिए कोई नई बात नहीं है। यह इस देश में तब से है जब आर्यों ने इस देश पर अपना शासन स्थापित किया और इस देश के मूल निवासी बहुसंख्यक लोगों पर वर्ण व्यवस्था लागू की। अतः भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त आरक्षण व्यवस्था प्रारम्भ से ही विवाद का विषय रही है। देश की 15 प्रतिशत प्रभुसत्ता ब्राह्मण, 3.5 प्रतिशत क्षत्रिय, 5.56 प्रतिशत, वैश्य 6 प्रतिशत समाज ने यहां के 85 प्रतिशत आदिवासी मूल निवासी बहुजन समाज को जातीय भेदभाव का शिकार बनाकर सभी संसाधनों से वंचित समाज को पशुओं से भी बदतर जीवन जीने पर मजबूर कर दिया जो शैक्षिक व साामाजिक क्षेत्र में आज भी बरकरार है।

    1932 में हुए पूना पैक्ट के बाद अस्पृश्य जातियों की पहचान कर उनकी एक अनुसूची बनायी जिसके कारण वह अस्पृश्य वर्ग अनुसूचित जाति(341) और आदिवासी वर्ग अनुसूचित जनजाति(342) बना। पूना पैक्ट के आधार पर विधायिका में 1935 के भारत सरकार अधिनियम से लागू हो गया और यही पूना पैक्ट संविधान बनाते समय सरकारी नौकरियों में आरक्षण का आधार बना। धर्म जाति या नस्ल के आधार पर शोषित व शासित मूल निवासी बहुजन समाज तथाकथित वंचित समाज को सामाजिक न्याय स्थापित करने के लिए भारतीय संविधान में अपनायी गयी नीति को ही आरक्षण व्यवस्था कहा जाता है, तो अमेरिका, न्यूजीलैण्ड कनाडा जैसे विकसित देशों में यह नीति ‘अफरमेटिव एक्शन’(Affirmative Action) या डाइवर्सिटी के नाम से जानी जाती है। इन्द्रा साहनी वाले मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा ‘‘आरक्षण नीति का उद्देश्य केवल गरीबी दूर करना नहीं बल्कि आरक्षित वर्ग की सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित करना है।’’(ए आई आर 1993 एस सी 477: (1992) 3 एस सी सी 217, पैरा 492) शिक्षा प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था करना सरकार का दायित्व है। संविधान के अनुच्छेद 41 से 45 में नीति निर्देशक सिद्धान्तों में शामिल की गयी चूंकि ब्राह्मणवादी मानसिकता वाले लोग जिनकी सत्ता में- प्रमुखता रही है जिसके कारण देश में प्रारम्भ से ही प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में दोहरी शिक्षा नीति लागू कर दी। जिसका परिणाम है कि मूल निवासी बहुजनों के 80 प्रतिशत बच्चे खस्ताहाल सरकारी स्कूलों में अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी करते हैं। जबकि अन्य बच्चे जो उच्च वर्गीय हैं या जिनकी देश में प्रभुसत्ता रही है। वे विदेशों में या महंगे स्कूलों (अंग्रेजी माध्यमों) में शिक्षा ग्रहण करते हैं। भारतीय संविधान में अनुच्छेद 15 से 15(4), 16(4), 16(4)ए, 16(4)बी की व्यवस्था की ही इसीलिए गयी थी कि जिससे यदि राज्य सरकार देश के सामाजिक व शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग के उत्थान के लिए कोई कार्य करती है तो उसे समानता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन के आधार पर चुनौती न दी जा सके। संविधान के अनुच्छेद 15 में सामाजिक बराबरी तथा अनुच्छेद 16 में राज्याधीन नौकरियों के संबंध में कहा गया है। आरक्षण विरोधी जानबूझकर अनुच्छेद 334 द्वारा प्रदत्त राजनैतिक आरक्षण से संबंधित 10 वर्ष की अवधि को रोजगार व शैक्षिक संस्थानों में अनुच्छेद 15(4) व 16(4) द्वारा प्रदत्त आरक्षण से जोड़ देते हैं। ताकि समाज में भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो सके जबकि आज भी सरकारी नौकरियों में प्रथम श्रेणी में 12 प्रतिशत द्वितीय श्रेणी में 14 प्रतिशत तथा तृतीय श्रेणी में 17 प्रतिशत पद रिक्त पड़े हैं। क्योंकि इन पदों की भर्तियों पर आर्थिक, शैक्षिक (मेरिट) नामक प्रश्नचिह्न लगा होता है। इसके विपरीत न्यायपालिका (सर्वोच्च) निजी संस्थानों जिन्हें सरकार से सहायता प्राप्त है, में आरक्षण का प्रावधान ही नहीं है। परिणाम यह कि मूल निवासी बहुजनों को समता बंधुता, स्वतंत्रता एवं न्याय आज भी प्राप्त नहीं है। शिक्षा से समस्याओं का समाधान सम्भव है जबकि समान शिक्षा के लिए किसी भी वर्ग द्वारा कोई आंदोलन नहीं है। आज के परिवेश में (चुनावी दौर में) सभी राजनैतिक दल लुभावने विज्ञापन जैसे गरीबी मिटाओ, जातिवाद मिटाओ, नौकरियों में भर्ती, अच्छी शिक्षा की खूब बातें करते हैं। परन्तु शायद वे यह भूल जाते हैं कि भारत से बाहर जन्मे लोग भारतीय होने का दावा करते हैं जबकि भारत में जन्म लेने वाले लोगों को अपनी नागरिकता की पहचान के लिए जूझना पड़ता है। यह गैरबराबरी का ज्वलंत उदाहरण है। प्राचीन भारत में दलितों एवं पिछड़ों को जमींदार एवं जागीरदारों पर निर्भर रहना पड़ता था जबकि आज का पूंजीवाद जिसमें शिक्षा माफिया, व्यवसाय, एलपीजी से एसईजेड तक जमींदारी प्रथा एवं जागीरदारी प्रथा का ही परिमार्जित रूप है, 10 से 12 परिवार व्यापार मण्डल के मालिक हैं। 15 प्रतिशत उच्च वर्गीय लोगों को 50 प्रतिशत आरक्षण (सुरक्षित सीटें) प्राप्त हैं। जबकि 85 प्र्रतिशत जनसंख्या के बड़े भाग को 50 प्रतिशत आरक्षण प्राप्त है। प्रथम श्रेणी की नौकरियों में 95 प्रतिशत सीटों पर गैर आरक्षित लोगों का कब्जा है जो गैर बराबरी की मिसाल है। अंततः आरक्षण कोई भीख नहीं है। आरक्षण समस्त नैसर्गिक संसाधनों, पशु-पक्षियों, जमीन, व्यापार आदि में बराबरी का अधिकार है।

नरेन्द्र कुमार, शिक्षक एवं समाजसेवी हरिद्वार

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