अंक : 16-31 JUL, 2017 (Year 20, Issue 14)

मिले सुर मेरा तुम्हारा.....


मोदी की इजरायल यात्रा


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    पिछले दिनों नरेन्द्र मोदी इजरायल के दौरे पर थेे। उनके अनेकों-अनेक कीर्तिमानों में एक नया कीर्तिमान और जुड़ गया। भारत के प्रधानमंत्री की पहली इजरायल की यात्रा।

    इस यात्रा की खास बात यह थी कि नरेन्द्र मोदी ने फिलीस्तीन के मामले में ऐसा रुख अपनाया जो कि इजरायल के जियनवादी शासक चाहते थे। इजरायल की यात्रा करने वाले विश्व पूंजीवादी नेता अक्सर दोनों ही जगह जाते थे। फिलीस्तीन की मुक्ति का भारत हमेशा से समर्थन करता आया था। अरब देशों के साथ भारत अपने राजनैतिक कारणों के साथ आर्थिक कारण की वजह से फिलीस्तीन के मुद्दे को खास तरजीह देता रहा था। इजरायल के द्वारा फिलीस्तीन के ऊपर ढाये जाने वाले अत्याचारों की वैसे औपचारिक निन्दा की जाती थी। अब जब से ‘हिन्दू-हिन्दू’ का राग अलापने वाले सत्ता में बैठे हैं तब से इजरायल (जो कि घोर फिलीस्तीन विरोधी के साथ-साथ मुस्लिम विरोधी है) के साथ रिश्तों में प्रगाढ़ता आयी है। इसकी शुरूवात वाजपेयी सरकार के समय ही हो गयी थी। अब तो मोदी इजरायल की यात्रा भी कर आये हैं। 

    इजरायल अमेरिकी साम्राज्यवाद के ‘सभ्यताओं के संघर्ष’ में मुख्य भूमिका निभाता रहा है। मुस्लिम बहुल अरब देशों को दबाव में रखने के लिए ‘मुस्लिम आतंकवाद’ का जो शिगूफा अमेरिका ने छोड़ा उसमें इजरायल अहम भूमिका निभाता रहा है। इजरायल पश्चिम एशिया में अमेरिकी साम्राज्यवाद के हितों को साधने के लिए एक तरह से उसका लठैत है। इस ‘लठैत’ को अमेरिकी साम्राज्यवाद का पूरा संरक्षण हासिल है। अमेरिकी साम्राज्यवाद की शह पर इजरायल फिलीस्तीन की अधिकांश भूमि को हड़प चुका है। उसके समुद्र, आसमान से लेकर धरती में मौजूद पानी के स्रोतों पर कब्जा कर चुका है। 

    इजरायल ने पूरे अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के विरोध के बावजूद फिलीस्तीन की भूमि को हड़पने, जबरन उसमें यहूदी बस्तियां बसाने का काम जारी रखा हुआ है। इजरायल ने फिलीस्तीन को दो हिस्सों गाजा पट्टी और वेस्ट बैंक में बांट दिया है। गाजा पट्टी तो वस्तुतः एक विशाल जेलखाना ही है। हजारों फिलीस्तीनियों को अब तक इजरायल की फौजों द्वारा कत्ल किया जा चुका है। और हजारों फिलीस्तीनी इजरायल की जेलों में बेहद अमानवीय स्थिति में कैद हैं। इजरायल की सेना और गुप्तचर संस्था मोसाद लगातार फिलीस्तीन और पड़ोसी मुस्लिम देशों में अपने षड्यंत्र रचती रहती है। 

    ऐसे आताताई इजरायल के साथ भारत के सत्तारूढ़ हिन्दू फासीवादियों की एकता बतला देती है कि ये दोनों एक जैसे ही हैं। भारत में मुस्लिम और ईसाई आबादी के साथ ये वही सुलूक करते और करना चाहते हैं जो इजरायल के यहूदी अंधराष्ट्रवादी शासक मुस्लिमों के साथ कर रहे हैं। इनका आदर्श इजरायल का अर्द्ध-फासीवादी राज्य है। अति आधुनिक हथियारों से लैस फौज इनको लुभाती है। पश्चिम एशिया में इजरायल का दबदबा और अमेरिकी साम्राज्यवाद का वरदहस्त इन्हें प्रेरित करता है। इस समय भारत के शासक जिस तरह अमेरिकी साम्राज्यवाद की गोद में जा बैठे हैं ऐसे समय में इजरायल इन्हें अपना बिछुडा भाई लगता है। इजरायल के शासक पहले से ही अमेरिकी साम्राज्यवाद की गोद में बैठे हुए हैं।

    भारत के शासक यदि इजरायल के शासकों से प्रेरणा पाते हैं तो भारत की मुक्तिकामी जनता की फिलीस्तीन की जनता से स्वाभाविक एकता है। भारत के लोग फिलीस्तीनी जनता के मुक्ति संघर्ष का समर्थन करते रहे हैं और उनसे प्रेरित भी होते रहे हैं। यहां तक कि कश्मीर के लोग अपनी आजादी की लड़ाई की प्रेरणा अभी तक फिलीस्तीन के संघर्ष से पाते रहे हैं। कश्मीर भारत का फिलीस्तीन जैसा बना हुआ है। भारत के शासक इजरायल के शासकों के दमन के तरीकों को खास तौर पर सीखना चाहते हैं कि कैसे वे फिलीस्तीन पर कब्जा और दबदबा बनाये हुए हैं। मोदी जी की यात्रा का एक मकसद यह भी था कि ये कश्मीर को अपने काबू में लायें। किस-किस तरह के तरीके व हथियार ये आजमायें। ‘मुस्लिम आतंकवाद’ से ये कैसे निपटें। दोेनों ही देशों के शासकों ने अपने यहां चलने वाले ‘मुक्ति संघर्ष’ को यही नाम दिया हुआ है। 

    इजरायल की सत्तारूढ़ लिकुड पार्टी और उसके नेता बेंजामिन नेतनयाहू अपने घोर फिलीस्तीन व मुस्लिम विरोध के कारण जाने जाते हैं। यही बात भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर लागू होती है। ऐसे में दोनों एक ही तरह की विचारधारा और सोच के आदमी हैं। और दोनों ही अमेरिकी साम्राज्यवाद के विश्वास प्राप्त हैं। 

    इजरायल के शासकों के लिए भारत की और भारत के लिए इजरायल की अहमियत का एक अन्य बड़ा कारण हथियार उद्योग है। भारत में रूस के बाद सबसे बड़ा हथियारों का जखीरा आज इजरायल से ही आता है। दोनों ही देशों के शासकों की यह दोस्ती न केवल एशिया बल्कि खुद इन देशों की जनता के खिलाफ जाती है। इनके सुरों के मिलने का अर्थ नये युद्धों की तैयारी और ऐसी दुनिया कायम करना है जहां अमेरिकी साम्राज्यवाद की सरपरस्ती में अपने-अपने क्षेत्रों में उसके इन लगुओं-भगुओं की दादागिरी चलती हो। 

Labels: अन्तराष्ट्रीय


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