अंक : 16-31 JUL, 2017 (Year 20, Issue 14)

डोकलाम विवाद


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    पिछले माह (जून) से भारत-चीन के सम्बन्धों में तल्खी आ गयी है। भारत और चीन दोनों की सैन्य टुकड़ियां भूटान के भीतर छोटी झड़पों में उलझी हैं और दोनों तरफ से युद्ध में एक दूसरे को देख लेने के बयान आ रहे हैं। नाथू ला दर्रे होकर गुजरने वाली मानसरोवर यात्रा को चीन सरकार ने रोक दिया है। यात्रा का यह रूट सिक्किम होकर गुजरता है और दो साल पहले इसे खोला गया था। अभी यह यात्रा पुराने रूट उत्तराखण्ड के लिपुलेख होकर जारी है। तनाव के बीच में नरेन्द्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति जी जिनपिंग जी-20 की बैठक के दौरान आपस में मिले जरूर लेकिन पिछली मुलाकातों से भिन्न किसी ने भी गर्मजोशी का प्रदर्शन नहीं किया। दोनों देशों के बीच कोई वार्ता का कार्यक्रम भी नहीं रखा गया। 

    भारत और चीन के बीच के हालिया तनाव के केन्द्र में डोकलाम पठार है। डोकलाम पठार तिब्बत, सिक्किम और भूटान के संगम के पास स्थित है। भूटान और चीन के बीच के विवाद में एक बिन्दु डोकलाम पर चीनी दावेदारी रही है। भूटान की तुलना में चीन कई गुना ज्यादा ताकतवर है, लेकिन इसके बावजूद वह भूटान पर कोई प्रभाव नहीं कायम कर पाता रहा है। इसका कारण भारत का भूटान पर प्रभाव है। भूटान एक संधि के तहत विदेश नीति के मामले में भारत का मार्गदर्शन मानने को बाध्य है। भारत की सैन्य टुकड़ी भूटान के भीतर मौजूद रहती है और भूटान-चीन सीमा पर भी यह भूटानी सेना के साथ तालमेल में निगरानी रखती है। चीन और भूटान के बीच का सीमा विवाद कुछ मौकों पर हल होने के निकट पहुंचा तो भारत ने हस्तक्षेप कर भूटान को पीछे हटने को बाध्य किया। 

    जून माह में भारत की सैन्य टुकड़ियों ने भूटान के भीतर चीन द्वारा कराए जा रहे सड़क निर्माण को रोका। यह सड़क चीन चादोंग से डोकलाम तक बना रहा है। भारतीय सैनिकों के हस्तक्षेप के बाद उस दिन चीनी सैनिक लौट गए, लेकिन अगले दिन वे भारी लाव-लश्कर के साथ आए और भारत द्वारा बनाए गए खाली पड़े बंकरों को तोड़ दिया। इसके बाद से भारत और चीन के बीच जुबानी जंग शुरू हो गयी। चीन ने भारत को 1962 की याद दिलाई तो भारत की तरफ से अरुण जेटली ने कहा कि 1962 और 2017 के भारत में बहुत फर्क है। 

    भारत के लिए डोकलाम पठार रणनीतिक महत्व का है। चीन की मंशा डोकलाम पठार तक पहले सड़क निर्माण और फिर रेल पटरी बिछाने की है। इससे डोकलाम पठार पर मजबूत चीनी मौजूदगी पैदा हो जायेगी जो कि पूरे क्षेत्र की यथास्थिति को बदल देगा। इसके बाद भारत की मुख्य भूमि को उत्तर पूर्व से जोेड़ने वाला संकरा ‘‘मुर्गी के गर्दन’’ वाला गलियारा खतरे की जद में आ जायेगा। उत्तर पूर्व में पहले से चल रहे पृथकतावादी आंदोलन वैसे ही भारत सरकार को चैन की नींद नहीं सोने दे रहे हैं। इन सब वजहों से भारत डोकलाम पठार पर चीनी कब्जे को स्वीकार करने में परेशानी महसूस कर रहा है। लेकिन, किसी तीसरे देश में वह चीन के साथ सैन्य तरीके से उलझना भी नहीं चाहता। भारत के थिंक टैंक से एक राय यह भी आ रही है कि भारत के लिए सबसे बढिया विकल्प यही है कि वह डोकलाम पठार पर सम्मानजनक तरीके से वापस निकल आए और कूटनीतिक तरीके से इस वापसी का हवाला देकर चीन के साथ जारी मोल भाव की प्रक्रिया को आगे बढ़ाये। लेकिन भारत में कायम 56 इंची सरकार के लिए इस तरह की एकतरफा वापसी काफी कठिन होगी। 

    भारत और चीन के आपसी संबंधों में अमरीकी साम्राज्यवाद एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पिछले समयों में भारत-अमरीकी रणनीतिक साझेदारी काफी मजबूत होती गयी है। इस रणनीतिक साझेदारी का एक मतलब अमेरिका द्वारा चीन की घेरेबंदी के प्रयासों में भारत द्वारा क्षेत्रीय लठैत की भूमिका निभाना है। अमेरिका का पूरी दुनिया पर कायम एकछत्र प्रभुत्व लगातार चरमरा रहा है। इसको कई तरफ से कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा है। इनमें से एक कठिनाई चीन का साम्राज्यवादी मंसूबा भी है। चीन अपनी बढ़ती ताकत के अनुरूप प्रशांत महासागर के द्वीपों पर अपनी दावेदारी बढ़ा रहा है और इस तरह अमरीकी साम्राज्यवाद और जापानी साम्राज्यवाद को आंखें दिखा रहा है। अमेरिका के चीन के भीतर काफी आर्थिक हित हैं इसलिए वह चीन के साथ संबंध टूटने की हद तक नहीं जाना चाहता है। इसके बजाए वह चीन को अन्य तरह के झगड़ों में उलझाकर अपनी परेशानी कम करने की चालें चलता है। अमेरिका की इस चाल में भारत एक महत्वपूर्ण मोहरा बन जाता है। भारत का पूंजीपति वर्ग भी इतना ज्यादा जनद्रोही और पतित हो चुका है कि सब कुछ जानते हुए भी वह इसी दिशा में आगे बढ़ रहा है। 

    भारत-चीन तनाव के संबंध में एक दूरस्थ संभावना यह भी है कि भारत और चीन आपस में एक पूर्ण युद्ध में उलझे। अगर ऐसा होता है तो यह पूरे तरीके से साम्राज्यवाद की चाल में फंसना होगा और पूंजीपतियों के बीच का लुटेरा युद्ध होगा। ऐसा होने पर भारत की मजदूर मेहनतकश जनता अपने खिलाफ हो रही चालबाजियों को समझेगी और पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के खिलाफ युद्ध छेड़ देगी।  

Labels: राष्ट्रीय


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