अंक : 16-31 JUL, 2017 (Year 20, Issue 14)

मोदी और अडानी


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    80 के दशक में गुजरात के आयात निर्यात कारोबारी से एक शख्स आज देश के 10 सबसे बड़े पूंजीपतियों में शुमार है। और यह शख्स गौतम अडानी अपनी राजनीतिक दखल व पहुंच के चलते सरकार से अपने पक्ष में फैसले कराने की कुव्वत रखता है। हालांकि यह अन्य पूंजीपतियों के संबंध में भी सही है। यह सही है भी कि सरकार पूंजीपति वर्ग की प्रबंधक कमेटी ही होती है। लेकिन फिर भी व्यक्तिगत सम्बन्धों का असर यहां ज्यादा साफ दिखता है। गौतम अडानी तब भी सुर्खियों में आये थे जब नरेंन्द्र मोदी चुनाव प्रचार के दौरान अडानी के चार्टर प्लेन से अपना तूफानी भाषण अभियान चला रहे थे।

    प्रधानमंत्री बनने के कुछ दिन गुजरते-गुजरते गौतम अडानी को स्टेट बैंक के जरिये 6 हजार करोड़ रुपये ऋण के रूप में दिलवाये गये। यह आॅस्ट्रेलिया में खनन के मकसद से लिया गया था। यह इसके बावजूद किया गया कि अडानी कर्ज चुकता करने के मामले में डिफाॅल्टर था। मोदी के विदेश दौरे में भी अडानी अक्सर साथ ही रहे थे। मोदी के चुनाव प्रचार से लेकर प्रधानमंत्री बनने के 5 माह बाद सितंबर 13 से सितंबर 14 तक एक साल में अडानी के धन में 152 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी।

    गुजरात में मोदी के मुख्यमंत्रित्व काल में अडानी की पूंजी बहुत तेज गति से आगे बढ़ी। इस दौर में अडानी ने अपना स्पेशल इकोनोमिक जोन स्थापित किया था। जमीन कौड़ी के मोल लगभग 15 रुपये प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से अडानी पर लुटाई गई थी। हालांकि भुगतान इससे भी कम यानी 0.1 रुपये प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से किया गया था। इन 13 वर्षाें के दौरान अडानी की कम्पनी के शेयर के दाम सितंबर 14 तक 5 रुपये से बढ़कर 786 रुपये हो गये।

    यही नहीं मुंद्रा में जो कि कच्छ की खाड़ी में है सबसे बड़े कोल आयात टर्मिनल को स्थापित किया गया। कोस्टल नियामक नियमों की धज्जियां उड़ाई गई। पर्यावरण को हो रही भारी क्षति से पर्यावरण से जुड़े कार्यकर्ताओं ने कोर्ट में याचिका दाखिल कर दी थी और फिर गुजरात हाईकोर्ट ने अडानी के इस काम को गैरकानूनी घोषित कर दिया था और वहां की सारी फैक्टरियों को बंद करने का आदेश दिया था। इसके बाद अडानी सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले के खिलाफ गया। सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को रद्द करते हुये काम को पूर्ववत स्थिति में जारी रखने का फैसला सुनाया साथ ही नये निर्माण व विस्तार पर रोक लगा दी थी।

    अडानी को पर्यावरण संबंधी क्लीयरेंस तत्कालीन कांग्रेस सरकार के अधीन पर्यावरण मंत्रालय से हासिल नही हो पाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय से भी क्लियरेंस के सम्बन्ध फैसला लेने को निर्देशित किया था।

    लेकिन दो माह बाद मोदी प्रधानमंत्री बन गये बस फिर तुरंत ही यह क्लियरेंस भी अडानी को हासिल हो गई। बात इतनी ही नहीं बाद में यह आरोप भी मोदी सरकार पर लगा कि पर्यावरण को क्षति पहुंचाने के एवज में अडानी की कंपनी पर 200 करोड़ रुपये की पेनल्टी यू पी ए कालीन पर्यावरण मंत्रालय द्वारा लगायी गयी मोदी सरकार ने इस पेनल्टी को हटा दिया था।

    अभी कुछ वक्त पहले ही ई पी डब्लू ने सरकार से सवाल करते हुये अडानी को 500 करोड़ रुपये का फायदा सीधे पहुंचाने की बात उजागर की। दरअसल मोदी सरकार (मोदी) ने अपने चहेते पूंजीपति अडानी के लिये स्पेशल इकोनाॅमिक जोन से संबंधित नियमों में इस तरह से फेरबदल किया कि अडानी को 500 करोड़ रुपये का फायदा पहुंचे।

    ई पी डब्लू द्वारा तैयार की गई प्रश्नावली का जवाब वित्त मंत्रालय के हेड अरुण जेटली तथा उद्योग व वाणिज्य मंत्रालय की निर्मला सीतारमण ने नहीं दिया। लेकिन इसके बावजूद भी अडानी द्वारा अरूण जेटली की तर्ज पर मानहानि का मुकदमा ई पी डब्लू व द वायर पर लगा दिया गया। यह स्थिति तब है जबकि अडानी सी एन एन को काफी पहले दिये गये इंटरव्यू में खुद यह स्वीकार कर चुके थे कि मोदी के मुख्यमंत्रित्व काल ने उन्हें फायदा पहुंचाया था क्योंकि मोदी का आर्थिक विकास पर ज्यादा जोर था।

    कुल मिलाकर मोदी और अडानी का यह संबंध पूंजीपति वर्ग व उसके प्रतिनिधियों के बीच के संबंध को ही तथ्यतः उजागर करता है।

Labels: राष्ट्रीय


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