अंक : 16-31 JUL, 2017 (Year 20, Issue 14)

नीतिश की प्रशंसा में


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    भारतीय राजनीति में वैसे नायाब चीजों की कमी नहीं है पर नीतिश कुमार का जवाब नहीं है। नीतिश कुमार सीधी चाल नहीं चलते हैं। कभी वह शतरंज के मोहरों में ऊंट की तरह टेढ़ी तो कभी घोड़े की तरह ढाई चाल चलते हैं। उनके ‘सहयोगियों’ और विरोधियों के लिए अंदाजा लगाना मुश्किल होता है कि नीतिश कुमार क्या करेंगे। किधर चलेंगे। 

    बिहार में महागठबंधन की सरकार है। नीतिश कुमार इसके सिरमौर हैं। बिहार की ‘बेटी’ राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार हैं। नीतिश कुमार भाजपा-संघ के उम्मीदवार के साथ हैं। है ना सब कुछ उल्टा-सीधा। वे कहां हैं। महागठबंधन में कि राजग में। वे दोनों जगह हैं। वे कहीं नहीं हैं। वे महागठबंधन में ऊंट की चाल तो राजग के लिए घोड़े की चाल चलते हैं। कोई कह सकता है नीतिश कुमार चतुर हैं। कोई कह सकता है मजबूर हैं। कोई कह सकता है कि वे कोई कर्जखोर हैं जो एक बैंक से पैसा लेकर दूसरे का कर्ज चुकाते हैं। फिर दूसरे वाले से कर्ज लेकर पहले का कर्ज चुकाते हैं। हर वक्त कर्ज में होते हैं और हर वक्त कर्ज से मुक्त हो जाते हैं। 

    नीतिश कुमार की स्वच्छ छवि है। बेदाग हैं। हालांकि उनकी पार्टी और गठबंधन की बात और है। 

    नीतिश कुमार साम्प्रदायिक नहीं हैं। हालांकि भाजपा के साथ वे सालों सत्ता का आनन्द लेते रहे। भाजपा-संघ के राष्ट्रपति उम्मीदवार को प्रथम नागरिक बनाने में उन्होंने अपने सहयोगियों की राय जाने बिना समर्थन दे दिया। 

    नीतिश कुमार भारत के प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं। हालांकि उनकी पार्टी का बिहार के बाहर कोई जनाधार नहीं है। 

    नीतिश कुमार अच्छी तरह जानते हैं जैसे वे बिहार के मुख्यमंत्री बने वैसे वे भारत के प्रधानमंत्री भी बन सकते हैं। कभी भाजपा के सहयोग से तो कभी लालू, कांग्रेस के समर्थन से। 

    नीतिश कुमार खुली या बंद आंखों से जो चाहे सपने देखें इसमें भला किसी का क्या जाता है। नीतिश कुमार अच्छी तरह से जानते हैं कि कब और कैसे, किस शाख पर बैठना है। 

    नीतिश कुमार पढे-लिखे हैं। बीटेक की डिग्री है उनके पास। भारत की राजनीति जो कि वकील प्रधान है उसमें कई इंजीनियर अपनी किस्मत आजमा रहे हैं पर उनकी चल नहीं पा रही है। अरविन्द केजरीवाल, मनोहर पर्रिकर आदि। 

    नीतिश कुमार निर्द्वंद्व रहना चाहते हैं पर उनके अपने द्वन्द्व हैं। कभी वे मोदी से हाथ छुड़ाते हैं और कभी हाथ मिलाते हैं। कभी ईर्ष्या करते हैं तो कभी मुरीद हो जाते हैं। महागठबंधन में जब सब नोटबंदी की बुराई कर रहे थे तब वे सफाई दे रहे थे। 

    नीतिश कुमार की हजारों ख्वाहिशें हैं। बस हो ये रहा है कि हर ख्वाहिश पर उनका दम निकल रहा है। इसलिए जब दम ज्यादा निकल गया तो वे राजगीर चले गये ताकि ताजा दम हो सके। 

    नीतिश कुमार की कथाएं अनन्त हैं जैसे कि हरि अनन्त है। वे समाजवादी हैं पर पूंजीवादी सरकार चलाते हैं। वे जातिवाद विरोधी हैं पर अपनी जाति का चुनावी आधार बनाकर रखते हैं। वे भ्रष्टाचार विरोधी हैं पर भ्रष्टाचार पर आंख मूंद लेते हैं। वे सुशासन बाबू हैं पर उनके राज में बिहार को जंगलराज का तमगा मिलता है। वे संसद में विपक्ष में बैठते हैं पर सत्ता पक्ष का समर्थन करते हैं। नीतिश कुमार ज्ञानवान हैं मोदी का भाषण ढंग से सुनते हैं। फट से बता देते हैं कि मोदी कहां-कहां, क्या-क्या, गलत बोले। 

    नीतिश कुमार देश की ओर देख रहे हैं और डर सता रहा है कि बिहार हाथ से न निकल जाये। जानते हैं पार्टी में लोग तब तक हैं जब तक सत्ता हाथ में रहेगी। जोड़-तोड़ कर कई तरह से पार्टी में उन्होंने कब्जा कायम किया। क्या पता कोई उन्हें भी जार्ज फर्नाडीस बना दे। 

Labels: राष्ट्रीय


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