अंक : 16-31 JUL, 2017 (Year 20, Issue 14)

आधार और सुप्रीम कोर्ट


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    आधार कार्ड द्वारा नागरिकों की निजता पर हमले के मसले पर अंततः शीर्ष अदालत सुनवाई के लिए तैयार हो गयी है। सालों से इस मसले पर दायर याचिकाओं पर सुनवाई को सुप्रीम कोर्ट इस वजह से टालता रहा था कि इस मसले पर 7 या 9 जजों की बैंच वाली संवैधानिक पीठ ही सुनवाई कर सकती है और इतने जज एक साथ उपलब्ध होना संभव नहीं है। 

    अब सुप्रीम कोर्ट ने 5 जजों की बैंच द्वारा इस मसले की सुनवाई महज दो दिन 18-19 जुलाई में पूरी करने का निर्णय लिया है। उसने दोनों पक्षों को पूरी तैयारी के साथ 2 दिन में बहस पूरी करने का निर्देश दिया है। 

    इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट का अब तक का रुख किसी बेहतर न्याय की आस नहीं जगाता है। सुप्रीम कोर्ट निजता के उल्लंघन के मसले पर सुनवाई तो टालती रही पर उसने आधार परियोजना पर अपने निर्णय आने तक रोक लगाने का कोई प्रयास नहीं किया। याचिकाकर्ता बार-बार अदालत से आधार को अनिवार्य बनाने की सरकारी कोशिशों की शिकायत कर इस पर अंतरिम रोक की मांग करते रहे पर सुप्रीम कोर्ट इस पर रोक लगाने से इंकार करता रहा। 

    इस दौरान सरकारों ने पूरे देश में आधार को हर तरह से अनिवार्य करने के लिए दिन रात एक कर दिया। राशन कार्ड, मोबाइल सिम से लेकर बैंक खातों, गैस, राहत योजनाओं सब जगह इसको अनिवार्य की तरह लागू कर दिया। 98 प्रतिशत से अधिक लोगों के आधार कार्ड जारी कर दिये। यानि अदालत और सरकार ने मिलकर आधार को व्यवहारतः अदालत में बहस से पहले ही अनिवार्यतः लागू कर दिया। इस परियोजना और विभिन्न मदों से इसे जोड़ने में करोड़ों रुपये खर्च कर दिये गये। 

    अब ऐसे में दो दिन में इस गम्भीर मुद्दे पर सुनवाई पूरी करने के दावे के साथ अदालत नागरिकों के साथ फिर मजाक कर रही है। दरअसल भारत की पूंजीवादी व्यवस्था जैसे-जैसे नागरिकों के जनवादी हकों के खिलाफ होती गयी है वैसे-वैसे व्यवस्था के सभी अंगों की तरह न्यायपालिका भी कानूनों की परिभाषा बदलने लगी है। उसका रुख सरकार के रुख के हिसाब से ढलता गया है। इसीलिए पुराने कानूूनों के दायरे में ही लोगों के जनवाद पर चैतरफा हमला बोला जा रहा है। फासीवादी सरकार के सत्तासीन होने के बाद इस सबमें तेजी आ गयी है। 

    अब सुप्रीम कोर्ट इस मसले पर क्या निर्णय लेता है यह तो वक्त के साथ सामने आयेगा। पर अब तक के व्यवहार से यही समझ में आता है कि आधार के जरिये लोगों की निजता के उल्लंघन के सर्वमान्य तथ्य को सुप्रीम कोर्ट किसी न किसी तरह जारी रखने का ही आदेश देगा। सरकार को अपने मन की करने की खुली छूट दे देगा। 

Labels: राष्ट्रीय


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