अंक : 16-31 JUL, 2017 (Year 20, Issue 14)

उत्तराखण्ड में दिखने लगी शिक्षा पर संघी छाप


Print Friendly and PDF

    उत्तराखण्ड के उच्च शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत ने शिक्षा मंत्री बनते ही एक के बाद एक ऐसे बयान और फैसले दिये हैं जो कि शिक्षा के भगवाकरण से सीधे नाभिनालबद्ध हैं। इसी तरह प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा मंत्री अरविन्द पाण्डे ने भी ऐसे ही फैसले दिये हैं। इनमें प्रमुखतः धन सिंह रावत का ‘उत्तराखण्ड में रहना होगा, वन्दे मातरम कहना होगा’, महाविद्यालयों मे राष्ट्रगान व राष्ट्रगीत गाने की अनिवार्यता, महाविद्यालयों में यूनिफाॅर्म की अनिवार्यता, छात्र संघ चुनाव न होना आदि हैं। वहीं अरविन्द पाण्डे ने प्राथमिक शिक्षकों के लिए यूनिफाॅर्म अनिवार्य करने, शिक्षकों की स्थायी नियुक्ति भूल जाना आदि फैसले लिये हैं। 

    उत्तराखण्ड के शिक्षा मंत्री (अरविन्द पाण्डे एवं धन सिंह रावत) ने शिक्षा को धीरे-धीरे भगवा रंग में रंगने के ऐसे कदम उठाये हैं, जिनमें से कुछ कदमों में शिक्षक और समाज के अन्य लोगों को भी भ्रमित किया गया है। उन्हें ये विश्वास दिला दिया गया कि इन कदमों से शिक्षा में सुधार होगा। मसलन यूनिफाॅर्म के सवाल पर। शिक्षा मंत्री ने कहा कि महाविद्यालयों में यूनिफाॅर्म होने से छात्रों में अनुशासन आयेगा। मानो यूनिफाॅर्म न हुयी शक्तिमान का कवच हुआ जिसे पहनकर गंगाधर में अलौकिक शक्तियां आ जायेंगी। यदि महाविद्यालयों में शिक्षकों, संसाधनों की पूर्णता होगी, शिक्षा से जीवन सुधरने या रोजगार पाने के अवसर प्राप्त हो रहे होंगे तो अनुशासन स्वाभाविक तौर पर आ जायेगा। वैसे भी हमारे महाविद्यालयों में आज भी छात्रों की वेशभूषा असभ्य या हमारे समाज की सीमाओं से पार नहीं हैं। मसलन छात्र जींस-टी शर्ट, कमीज, लोअर आदि पहने महाविद्यालय आते हैं। वहीं छात्रायें सलवार-कमीज, जींस-टी शर्ट पहनती हैं। जब हमारे महाविद्यालयों के शिक्षक या उनकी उम्र के सज्जन अपने छात्र होने के समय की बात बताते हैं तो उस समय वह अपने शिक्षकों व महाविद्यालयों के बारे में भी बताते हैं कि तब ऐसा था या वैसा था, अब माहौल बिगड़ गया है, वैसा समय नहीं रहा। इसी तरह देश के तमाम नामी सरकारी महाविद्यालयों या विश्व विद्यालयों में भी यूनिफाॅर्म नहीं है लेकिन तब भी वहां अराजकता नहीं है बल्कि कुमांऊ विश्व विद्यालय से बेहतर शिक्षा का माहौल है। प्राइवेट काॅलेजों में यूनिफाॅर्म होती है जिसमें प्रबन्धकों का एक जोर इस वजह से होता है कि उनके संस्थान का प्रचार हो। हमारे शिक्षा मंत्री सोचते हैं सिर्फ यूनिफाॅर्म से अनुशासन आ जायेगा। ये कोरी बकवास या दिवास्वप्न के अलावा कुछ नहीं। 

    तब इस फैसले के वास्तविक निहितार्थ क्या हैं? साफ है आज अनुशासन के नाम पर यूनिफाॅर्म लागू करना डिग्री कालेजों को संघ की शाखा में बदलने का प्रयास है। छात्र संघ चुनाव को भाषण प्रतियोगिता में बदल देने की बात छात्र संघों को और पालतू बनाने का प्रयास है। यह सब आने वाले समय में ज्यादा साफ अंधराष्ट्रवादी माहौल कायम करने का प्रयास है। अब उत्तराखण्ड में केवल ‘वन्दे मातरम’ कहने वाला ही रहेगा। महाविद्यालयों में ‘वन्दे मातरम’ कहने वाला ही पढ़ेगा। 

   शिक्षकों के लिए यूनिफाॅर्म की अनिवार्यता वाली बात को लें। शिक्षकों की विद्यालयों में वेशभूषा आज भी शालीन ही होती है। तब भला शिक्षकों के लिए यूनिफाॅर्म की आवश्यकता क्यों है? शिक्षकों का पेशा डाॅक्टर या पुलिस जैसा तो नहीं है जहां समाज को वेशभूषा वाले शिक्षकों की आवश्यकता हो। शिक्षकों को यदि बायो मैट्रिक मशीनों से अनुशासित नहीं किया जा सक रहा है तो यूनिफाॅर्म से कैसे अनुशासित किया जा सकता है। जब तक शिक्षक केवल शिक्षण कार्यों के लिए नहीं होंगे और उसके लिए उनकी जवाबदेही नहीं बनायी जायेगी। तब तक शिक्षा में सुधार नहीं होने वाला। 

  ऐसे समय में शिक्षा मंत्री का यह कहना कि स्थायी नियुक्ति की बात को भूल जाइये, शिक्षा का बंटाधार करने वाला बयान है। जबकि जरूरत है कि शिक्षकों के रिक्त पड़े पदों को भरा जाये, साथ ही विद्यालयों को अन्य संसाधन भी उपलब्ध कराये जायें। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय, नैनीताल ने संसाधनों की दीन-हीनता को देखते हुए ही कहा कि विद्यालयों में संसाधनों की पूर्ति की जाये तब तक अधिकारी सरकारी खर्च पर कोई कार, ए.सी., फर्नीचर आदि कोई चीज न खरीदें। उच्च न्यायालय का यह फैसला शिक्षा में संसाधनों के अभाव को बेहतर ढंग से उजागर करता है। संसाधनों की पूर्ति करने के बजाय हमारे शिक्षा मंत्री का सारा ध्यान यूनिफाॅर्म में अटका हुआ है। हैरानी है! नहीं। इसके अलावा कोई और उम्मीद नहीं ऐसे मंत्रियों से। 

  जरूरत है कि भाजपा की उत्तराखण्ड सरकार और उसके मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हिन्दू राष्ट्र के वास्तविक एजेण्डे को समझने की। इस एजेण्डे को जनवाद का गला घोंट कर और समस्याओं के छद्म हलों के जरिये पूरा करने का प्रयास किया जा रहा है। फासीवाद की तरफ आगे बढ़ने के लिए तैयार की जा रही इस पृष्ठभूमि को समझने और इसे पूरे समाज में उजागर करने की आवश्यकता है। साथ ही समस्याओं के वास्तविक हलों को पुरजोर तरीके से रखने की जरूरत है। समस्या है कि देश की व्यवस्था चंद लोगों के मुनाफे के लिए चिंतित है। सरकारें शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य आदि बुनियादी समस्याओं से निरंतर अपने हाथ पीछे खींच रही हैं। ऐसे हालात में केवल क्रांति ही सच्चा विकल्प है। भगत सिंह के सपनों का समाजवादी भारत ही आज मेहनतकशों-नौजवानों का लक्ष्य होना चाहिए। इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है। इसे अपने मन-मस्तिष्क में बैठाने और समाज में इस विचार को स्थापित करने की जरूरत है। 

Labels: राष्ट्रीय


घोषणा

‘नागरिक’ में आप कैसे सहयोग कर सकते हैं?
-समाचार, लेख, फीचर, व्यंग्य, कविता आदि भेज कर क्लिक करें।

अन्य महत्वपूर्ण लिंक्स


हमें जॉइन करे अन्य कम्यूनिटि साइट्स में

घोषणा

‘नागरिक’ में आप कैसे सहयोग कर सकते हैं?
-समाचार, लेख, फीचर, व्यंग्य, कविता आदि भेज कर
-फैक्टरी में घटने वाली घटनाओं की रिपोर्ट भेज कर
-मजदूरों व अन्य नागरिकों के कार्य व जीवन परिस्थितियों पर फीचर भेजकर
-अपने अनुभवों से सम्बंधित पत्र भेज कर
-विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, बेबसाइट आदि से महत्वपूर्ण सामग्री भेज कर
-नागरिक में छपे लेखों पर प्रतिक्रिया व बेबाक आलोचना कर
-वार्षिक ग्राहक बनकर

पत्र व सभी सामग्री भेजने के लिए
सम्पादक
'नागरिक'
पोस्ट बाक्स न.-6
ई-मेल- nagriknews@gmail.com
बेबसाइट- www.enagrik.com
वितरण संबंधी जानकारी के लिए
मोबाइल न.-7500714375