अंक : 16-31 JUL, 2017 (Year 20, Issue 14)

अमेरिकी प्रभुत्व वाली विश्व व्यवस्था को खुली चुनौती


जी-20 शिखर सम्मेलन


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    विकसित एवं विकासशील उभरती हुयी अर्थव्यवस्थाओं का समूह जी-20 अथवा ग्रुप-20 का शिखर सम्मेलन 7-8 जुलाई को जर्मनी के हैम्बर्ग शहर में आयोजित हुआ। 

    यह शिखर सम्मेलन अपने आप में ऐतिहासिक साबित हुआ। इस शिखर सम्मेलन में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पहली बार साम्राज्यवादी दुनिया में अमेरिका के एकछत्र वर्चस्व को खुली चुनौती मिली। केवल चुनौती ही नहीं मिली बल्कि पहली बार अमेरिका किसी वैश्विक मंच पर अलग थलग पड़ गया और हाशिये की स्थिति में पहुंच गया। अमेरिका के खिलाफ जर्मनी और फ्रांस के नेतृत्व में यूरोपीय संघ खुले टकराव की स्थिति में आ गया और उसने अमेरिका को छोड़कर जी-20 के अन्य देशों को अपने पीछे लामबंद कर अमेरिका को हाशिये पर धकेल दिया। 

    अमेरिका फर्स्ट अथवा अमेरिका के हित सर्वोपरि की अमेरिकी साम्राज्यवादी नीति को इस शिखर सम्मलेन में जबर्दस्त धक्का लगा। 

    हैम्बर्ग शिखर सम्मेलन की सबसे खास बात यह रही कि जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते से अमेरिका के द्वारा संधि से हटने के बाद पेरिस समझौते के भविष्य पर जो सवाल खड़े हुए थे उनका निराकरण इस सम्मेलन में हो गया। जर्मनी और फ्रांस और चीन आदि के नेतृत्व में अमेरिका को अलग थलग कर इस सम्मेलन ने 1 के मुकाबले 19 के बहुमत से पेरिस समझौते पर मुहर लगा दी। 

    वैसे जी-7 की मई में हुई बैठक के बाद अमेरिका द्वारा पेरिस समझौते से हटने की घोषणा पर जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी वर्चस्व वाली विश्व व्यवस्था के विखंडित होने की घोषणा करते हुए कहा था कि ‘हम यूरोपीय लोगों को अपने भाग्य का निर्धारण अपने हाथ में लेना होगा।’ इस संदेश को उन्होंने जी-20 बैठक के दौरान दोहराया। 

    जी-20 की हैम्बर्ग बैठक वास्तविक तौर पर अमेरिका व यूरोपीय यूनियन के बीच रस्साकस्सी का मंच बन गया और इस खेल में यूरोपीय यूनियन ने अमेरिका को छोड़कर जी-7 के अन्य देशों व चीन-भारत सहित उभरती हुयी अर्थव्यवस्थाओं को अपने साथ खड़ा कर लिया और अमेरिका पहली बार किसी वैश्विक आर्थिक मंच पर अलग-थलग पड़ गया। उसकी किसी भी मुद्दे पर एक नहीं चली। ट्रम्प के तेवर ढीले पड़ गये तथा माथे पर पसीना आ गया।

    अमेरिका ने जी-20 बैठक में उत्तर कोरिया पर एक प्रस्ताव लेने का मुद्दा रखा था। और उत्तर कोरिया के मामले पर जोर देने के लिए अमेरिका द्वारा राजनयिक, सामरिक और आर्थिक दबाव बनाने के अलावा शिखर सम्मेलन के दौरान ही उत्तर कोरिया के बार्डर पर 900 किलोग्राम के एक डमी बम का विस्फोट किया गया। उत्तर कोरिया के मामले में प्रस्ताव हेतु अमेरिका द्वारा इसे एक महाविध्वंसक युद्ध की शुरूवात करने वाला मुद्दा बना दिया गया। लेकिन शिखर सम्मेलन की अध्यक्षा जर्मन चांसलर एंजेला मर्कल ने उत्तर कोरिया पर प्रस्ताव की अमेरिकी कोशिशों को यह कहकर खारिज कर दिया कि जी-20 ऐतिहासिक तौर पर और मुख्यतः एक आर्थिक मंच है। 

    इसी तरह अपने राष्ट्रीय हितों का हवाला देते हुए अमेरिका द्वारा संरक्षणवादी कदम उठाने का भी शिखर सम्मेलन में विरोध हुआ। अमेरिका द्वारा बार-बार इस्पात के आयात पर प्रतिबंध लगाकर अपने इस्पात उद्योग के संरक्षण की बात की गयी।

    जी-20 सम्मेलन के दौरान उन्मुक्त व्यापार व संरक्षणवाद के मुद्दों पर अमेरिका व यूरोपीय यूनियन व अन्य विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के बीच तनातनी का माहौल रहा।

    बहरहाल अमेरिका व यूरोपीय यूनियन व चीन समेत बाकी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यापार को लेकर अंतर्विरोध तीखा हो चला है। इस अंतर्विरोध का प्रमुख मुद्दा इस्पात भी है। अमेरिकी प्रशासन द्वारा धमकी दी जा रही है कि वह अपने संविधान के 1962 के कानून का इस्तेमाल कर इस्पात आयात को प्रतिबंधित कर सकता है। अमेरिका के इस कानून के मुताबिक राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर राष्ट्रपति को आयातों को प्रतिबंधित करने की शक्ति दी गयी है। 

    शिखर सम्मेलन के दौरान जी-20 ने वैश्विक स्तर पर इस्पात की अधिकता पर 2016 में तय एक मंच के गठन के प्रयासों को तेज करने की प्रतिबद्धता जाहिर की। 

    इस्पात आयात पर प्रतिबंध को अमेरिका नाभिकीय विकल्प के समान एक ब्रहमास्त्र की तरह इस्तेमाल करने की धमकी देता रहा है। अमेरिका की इस धमकी से निपटने के लिए भी यूरोपीय यूनियन ने रणनीति तैयार की है। अधिकृत सूत्रों के मुताबिक यूरोपीय यूनियन के अधिकारियों ने अमेरिका की ऐसी किसी प्रतिबंध की कार्यवाही का जवाब देने के लिए अमेरिका के निर्यात वाले बहुत से उत्पादों की सूची बना ली है जिसमें व्हिस्की, संतरे का रस, डेरी उत्पाद आदि शामिल हैं। 

    कुल मिलाकर इस बार जी-20 की बैठक में संभावित व्यापार युद्ध की छाया स्पष्ट दिखाई दी। अमेरिका के लिए जी-20 का यह शिखर सम्मेलन कितना असहज बन गया था इसकी बानगी यह भी है कि हर बार शिखर सम्मेलन के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति अथवा प्रतिनिधिमंडल द्वारा जो प्रेस कांफ्रेस करने की रवायत थी वह भी उन्होंने नहीं की। 

    कुल मिलाकर जी-20 का यह शिखर सम्मेलन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी एकछत्र प्रभुत्व वाले दौर के अवसान, बहुध्रुवीय दुनिया के आगाज एवं पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया के भीतर शांतिपूर्ण दौर की जगह विग्रह व कलह के दौर के आरम्भ का गवाह बना।

    अमेरिकी चैधराहट की जी-20 सम्मेलन में दुर्गति कोई यकायक होने वाली घटना नहीं है। इस घटना को महज अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के संरक्षणवादी व उग्र राष्ट्रवादी तेवरों का परिणाम नहीं माना जा सकता हालांकि इसने इस पूरी प्रक्रिया में एक उत्प्रेरक की भूमिका निभायी है। 

    दरअसल यह परिघटना एक लंबे समय से चली आ रही परिघटना का हिस्सा है। पिछली शताब्दी में ही 70 के दशक के बाद अमेरिका की विश्व पूंजीवाद में नेतृत्वकारी स्थिति डांवाडोल हो गयी थी। जर्मनी-जापान तेजी से अमेरिका को चुनौती देने के लिए आगे आये। पर 90 के दशक में जापानी अर्थव्यवस्था के ठहराव ने अमेरिका का प्रभुत्व टूटने से बचा लिया। इस शताब्दी के अंत तक अमेरिकी अर्थव्यवस्था की विकास दर कमजोर रहने तथा बार-बार संकटों के पैदा होने के चलते इसकी स्थिति डांवाडोल होती रही। इस संकट को हल करने के लिए अमेरिकी साम्राज्यवाद ने ईराक, अफगानिस्तान पर कब्जा करने व वैश्विक स्तर पर तेल व्यवसाय पर अपनी पकड़ मजबूत करने के प्रयास किये। लेकिन साम्राज्यवादी हाथी दलदल में फंसता चला गया और 2008 में गिरवी आवास संकट और उसके बाद ऋण संकट ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था सहित साम्राज्यवादी दुनिया को बेहद धक्का पहुंचाया। इसी दौरान उभरती हुयी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं ने वैश्विक मूल्य विनियोग में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने का दावा प्रस्तुत किया तथा 2009 मेें जी-20 अस्तित्व में आया। जी-20 का अस्तित्व में आना ही अमेरिका के एकछत्र प्रभुत्व वाली साम्राज्यवादी विश्व व्यवस्था के लिए चुनौती था। 

    जी-20 के हैम्बर्ग सम्मेलन ने दुनिया में बदलते आर्थिक राजनीतिक संतुलन के मद्देनजर अमेरिकी प्रभुत्व वाली पुरानी विश्व व्यवस्था के कालातीत होने की घोषणा कर दी है। यह घोषणा व्यवहारिक तौर पर कितनी सही साबित होगी इसे आने वाला वक्त ही तय करेगा क्योंकि यूरोपीय यूनियन खुद आर्थिक संकट के साथ अपने भीतर अंतरविरोध का शिकार है और अभी भी अमेरिका की आर्थिक सामरिक हैसियत को चुनौती देने के मामले में कोई भी मुल्क उसके मुकाबले खड़ा होने की स्थिति में नहीं हैं। लेकिन फिर भी यह निश्चित है कि अब साम्राज्यवादी-पूंजीवादी दुनिया अमेरिका की मनमर्जी से संचालित होने की स्थिति में नहीं रही है। 

    जहां तक भारतीय शासकों का सवाल है अपने दीर्घकालिक हितों के मुताबिक उन्होंने अपने को अमेरिका के खिलाफ यूरोपीय यूनियन के पाले में खड़ा किया। प्रधानमंत्री मोदी को अपने नए मित्र ट्रम्प का साथ निभाने के बजाय यूरोपीय यूनियन व अपने एशियाई प्रतिद्वंद्वी चीन के साथ खड़ा होना पड़ा। उनके लिए कोई बीच का रास्ता बचा नहीं था। 

    इस शिखर सम्मेलन के दौरान जर्मनी का हैम्बर्ग शहर पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया था। सम्मेलन के शुरू होने से पहले से लेकर सम्मेलन समाप्त होने तक हैम्बर्ग की सड़कों पर लगातार सम्मेलन के विरोघ में प्रदर्शन होते रहे। सबसे बड़े प्रदर्शन में लगभग 1 लाख लोगों ने हिस्सा लिया। कुछ प्रदर्शनों पर पुलिस ने बर्बर लाठीचार्ज भी किया। इसके चलते ढेरों लोग घायल हुए। 

    प्रदर्शनकारियों में वामपंथी संगठनों, एनजीओ, पर्यावरणवादी सभी शामिल थे। ये यूरोप के अलग-अलग देशों से हैम्बर्ग प्रदर्शन को आये थे। ढेरों प्रदर्शनकारियों को जर्मनी की सीमा पर ही रोक दिया गया था। प्रदर्शनकारी ‘पूंजीवाद बंद करो’ (shut down capitalism) सरीखे नारे लगा रहे थे। दुनिया भर के शासकों के सम्मेलन के खिलाफ बड़े पैमाने पर हुए इन प्रदर्शनों ने दिखला दिया कि यूरोप में जनता खासकर नौजवानों का सरकार व व्यवस्था के प्रति गुस्सा लगातार बढ़ रहा है। 

Labels: अन्तराष्ट्रीय


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