अंक : 16-31 JUL, 2017 (Year 20, Issue 14)

मोसुल का हस्र


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    मोसुल इराक का एक प्रमुख शहर है। पिछले दिनों अमेरिकी सहयोग से इराकी सेना ने मोसुल को इस्लामिक स्टेट के कब्जे से मुक्त करा लिया। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने मोसुल की इस मुक्ति के लिए इराकी सेना को बधाई दी। मोसुल शहर को अपनी यह ‘मुक्ति’ कितनी भारी पड़ी इसकी चर्चा तक करना पश्चिमी मीडिया ने उचित नहीं समझा। 

    ‘मुक्ति’ कितनी कड़वी थी इसका अंदाजा इस बात से लग जाता है कि अमेरिका के प्रति नरम रुख रखने वाली अमनेस्टी इंटरनेशनल तक को अपनी रिपोर्ट में मोसुल में अमेरिकी नेतृत्व वाली गठबंधन सेना द्वारा किये युद्ध अपराधों को स्वीकारना पड़ा है। रिपोर्ट में इन युद्ध अपराधों की निष्पक्ष जांच की मांग की गयी है। 

    जुलाई 2014 में मोसुुल शहर पर आई.एस. ने कब्जा कर लिया था। तब से हजारों नागरिक मारे जा चुके हैं। हजारों को विस्थापित होना पड़ा है। रिपोर्ट बताती है कि आई.एस. ने हजारों नागरिकों को अपने सुरक्षा घेरे के बतौर इस्तेमाल कर मरवा दिया। रिपोर्ट में मोसुल को मुक्त कराने के लिए जनवरी से जुलाई 17 तक चले युद्ध में अमेरिका के नेतृत्व वाली गठबंधन सेना के कुकृत्यों की भी चर्चा है। 

    रिपोर्ट बताती है कि इराकी नागरिक दोनों पक्षों द्वारा कायम किये आतंक से भयभीत हैं। दोनों पक्षों ने इंसानी जीवन की कोई चिन्ता किये बगैर अंधाधुंध बमबारी नागरिक इलाकों पर की। इस हिंसा में परिवार के परिवार साफ हो गये। ढेरों लाशें अभी खण्डहरों में दबी पड़ी हैं। 

    अमेरिकी नेतृत्व वाली गठबंधन फौजों ने मोसुल के नागरिक आबादी वाले इलाकों पर राकेट, बम आदि बड़े पैमाने पर बरसाये। अमेरिकी जहाजों ने बगैर इस बात की चिन्ता किये कि इससे नागरिकों की जानें जायेंगी, बड़े पैमाने पर लगातार बम बरसाये। लगभग 6 हजार से अधिक जानें इस दौरान गयीं। 

    अमेरिकी विमानों ने दिखाने के लिए मोसुल में पर्चे गिराये जिनमें कहा गया था कि आई एस से लोग दूर रहें व अपने घरों के बाहर बच्वों के कपड़े टांगे ताकि उनको पहचान कर उन पर बमबारी न की जाये। पर वास्तव में ऐसे कपड़े टंगे घरों पर बमबारी न करने का कोई प्रयास अमेरिकी सेना ने नहीं किया। 

    आईएस के रूप में पहले अमेरिका द्वारा सीरिया में खड़ा किया गया आतंकी संगठन मोसुल भी जनता पर अत्याचार करता रहा फिर आई.एस. से मुक्ति के नाम पर अमेरिकी-इराकी सेना लोगों पर बम गिराती रही। अब ‘मुक्ति’ के बाद हस्र यह है कि हर नागरिक को आई.एस. का आतंकी होने के शक में उत्पीड़ित किया जा रहा है। अपने को निर्दोष साबित करने में विफल रहने वाले नागरिकों को बगैर किसी मुकदमे के सजा दे दी जा रही है। मोसुल निवासी आई.एस. से मुक्त हो अमेरिकी-इराकी सेना के गुलाम बन गये हैं। 

    अमेरिका द्वारा दुनिया भर में ‘लोकतंत्र’ कायम करने के ढिंढोरे की असलियत इराक को देखकर समझी जा सकती है। जो दिखलाती है कि ‘लोकतंत्र’ के ढिंढोरे के तले अमेरिका को इराकी जनता की जान की जरा भी परवाह नहीं है। उसे बस अपने वैश्विक प्रभुत्व के लिए इराक पर कब्जा व उसका तेल चाहिए। इसके लिए पूरी इराकी आबादी का कत्ल करना भी उसे मंजूर है। 

Labels: अन्तराष्ट्रीय


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