अंक : 16-31 JUL, 2017 (Year 20, Issue 14)

वस्तु एवं सेवा कर (GST) के बारे में कुछ सवाल-जवाब


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    वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी ने सभी लोगों को काफी हैरान-परेशान किया है- देश के बड़े पूंजीपतियों और मोदी-जेटली जैसे उनके चाकरों को छोड़कर। यहां तक कि उत्तर प्रदेश में भाजपा के एक मंत्री से जब यह पूछा गया कि जीएसटी का पूरा नाम क्या है तो वे नहीं बता पाये। मजे की बात यह है कि वे मोदी के आदेश पर लोगों को जीएसटी के फायदे बता रहे थे।

    यहां इस लेख में जीएसटी के बारे में कुछ तकनीकी और कुछ राजनीतिक सवालों के जवाब दिये जा रहे हैं। इससे पाठकों को उसे समझने में आसानी होगी। 

सवाल: वस्तु एवं सेवा कर अथवा जीएसटी क्या है?

जवाब: जीएसटी देश में 1 जुलाई 2017 से लागू होने वाली नयी अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था है। इसके पहले अप्रत्यक्ष कर बिक्री कर, आबकारी, इत्यादि के जरिये वसूल किया जाता था। बाद में वैट (वैल्यू ऐडेड टैक्स) को भी इसमें जोड़ा गया था। अब इन सबको हटाकर केवल जीएसटी ही लागू होगा।

सवालः अप्रत्यक्ष कर और प्रत्यक्ष कर क्या हैं?

जवाबः देश और दुनिया भर में भी सरकारें जो कर वसूलती हैं वे दो तरह के होते हैं। प्रत्यक्ष कर को व्यक्ति या कंपनियां सीधे चुकाती हैं जबकि अप्रत्यक्ष कर मालों और सेवाओं पर कर के जरिये वसूला जाता है। आय कर, सम्पत्ति कर इत्यादि प्रत्यक्ष कर की श्रेणी में आते हैं जबकि बिक्री कर, सीमा शुल्क इत्यादि अप्रत्यक्ष करों की श्रेणी में आते हैं। आम तौर पर प्रत्यक्ष करों के बढ़ने का मतलब धनिकों पर कर का बोझ बढ़ेगा तथा अप्रत्यक्ष करों के बढ़ने का मतलब गरीबों पर कर का बोझ बढ़ना माना जाता है। 

सवालः जीएसटी को कौन वसूलेगा?

जवाबः जीएसटी दो हिस्सों में विभाजित है- प्रदेश जीएसटी और केन्द्रीय जीएसटी। दोनों की दरें एक ही हैं। यानी यदि किसी माल पर जीएसटी 18 प्रतिशत है तो इसमें से 9 प्रतिशत प्रदेश जीएसटी होगा और 9 प्रतिशत केन्द्रीय जीएसटी। माल एवं सेवा विक्रेता जीएसटी एक ही जगह जमा करेंगे जहां से वह विभाजित होकर संबंधित प्रदेश सरकार के खाते में और केन्द्र सरकार के खाते में चला जायेगा। 

सवालः जीएसटी की दरें क्या हैं?

जवाबः सरकार के इस दावे के बावजूद कि जीएसटी एकल कर प्रणाली है, दुनिया के बहुत सारे देशों के विपरीत भारत में लागू जीएसटी की पांच दरें हैं: शून्य, 5, 12, 18 और 28 प्रतिशत। जीएसटी कानून के अनुसार यह दर अधिकतम सीमा 40 प्रतिशत तक जा सकती है। इतना ही नहीं। सरकार को इन दरों के ऊपर भी अधिभार लगाने का अधिकार है। इस कारण इस समय भी कुछ कारों पर 43 प्रतिशत और तम्बाकू पर 75 प्रतिशत कर बैठेगा।

सवालः क्या कुछ माल एवं सेवाएं जीएसटी से बाहर हैं?

जवाबः हां! प्रदेश और केन्द्र सरकार को भारी आय प्रदान करने वाली कुछ चीजें इस कर प्रणाली से बाहर हैं। शराब और पेट्रोलियम पदार्थ ऐसी ही चीजें हैं।

सवालः विक्रेता द्वारा जीएसटी अदा करने की प्रक्रिया क्या होगी?

जवाबः हर व्यापारी माल की खरीद और बेच के बीच फर्क पर जीएसटी अदा करेगा। यदि किसी ने कोई माल दो सौ रुपये में खरीदा तथा दो सौ पचास रुपये में बेचा तथा यदि उस माल पर 12 प्रतिशत कर है तो उसे छः रुपये कर अदा करना पड़ेगा। व्यापारी को खरीद और बेच दोनों का हिसाब रखना होगा। उसे हर महीने कर के तीन फार्म भरने होंगे और एक फार्म साल के अंत में भरना होगा।

सवालः यह कर प्रणाली पहले से कैसे भिन्न है?

जवाबः एक तो यही कि इसमें विभिन्न अप्रत्यक्ष करों के बदले एक ही कर होगा हालांकि विभिन्न मालों पर इसकी दरें भिन्न-भिन्न होंगी। दूसरे यह कि अभी तक अप्रत्यक्ष करों को प्रदेश और केन्द्र सरकारें अलग-अलग वसूलती थीं तथा हर प्रदेश में इनकी दरें भिन्न-भिन्न होती थीं। हर प्रदेश सरकार अपने हिसाब से दरें तय करती थी। अब प्रदेश सरकारों की यह स्वायत्ता समाप्त हो गयी है। 

सवालः व्यापारी जीएसटी का विरोध क्यों कर रहे हैं?

जवाबः सरकार और उनके समर्थकों के अनुसार जीएसटी से व्यापारियों द्वारा की जाने वाली कर चोरी रुक जायेगी। इसीलिए वे इसका विरोध कर रहे हैं। इसके विपरीत व्यापारियों का कहना है कि उन्हें जीएसटी के तहत जो भारी-भरकम हिसाब रखना होगा वह उनके बस का नहीं है। यदि वे इसके लिए नये कर्मचारियों को रखते हैं तो उनका कारोबार घाटे में चला जायेगा। छोटे व्यापारियों का यह तर्क जायज है हालांकि सरकार का दावा है कि उसने अत्यन्त छोटे व्यापारियों को इस कर प्रणाली में छूट दी है। 

सवालः प्रदेश सरकारों ने जीएसटी का क्यों विरोध किया था?

जवाबः जैसा कि पहले कहा गया है, जीएसटी अप्रत्यक्ष करों के मामले में प्रदेशों की सरकारों की स्वायत्तता समाप्त कर देता है। इससे विकसित और पिछड़े सारे प्रदेश एक बराबर स्थिति में आ जाते हैं। आय बंध जाने के कारण खर्च की सीमा भी बंध जाती है। प्रदेश सरकारों को यह स्वीकार नहीं था। कभी मोदी की गुजरात सरकार ने भी जीएसटी का तीखा विरोध किया था। 

सवालः संघ के संगठनों का जीएसटी पर क्या रुख है?

जवाबः जहां मोदी की भाजपा सरकार गाजे-बाजे के साथ जीएसटी लागू कर रही है वहीं स्वदेशी जागरण मंच और भारतीय मजदूर संघ जैसे संघी संगठन इसका विरोध कर रहे हैं। स्वदेशी जागरण मंच ने खुलेआम घोषित किया है कि जीएसटी को बड़े पूंजीपतियों के हित में लागू किया जा रहा है। भारतीय मजदूर संघ ने इस आधार पर जीएसटी का विरोध किया है कि इसके तहत कई करों पर अधिभार खत्म होने से उसके द्वारा मजदूरों के लिए संचालित कल्याणकारी योजनाएं प्रभावित होंगी। 

सवालः क्या जीएसटी से महंगाई कम होगी?

जवाबः स्वयं सरकार का कहना है कि जीएसटी से तात्कालिक तौर पर महंगाई बढ़ सकती है। यानी अभी तात्कालिक तौर पर चीजें महंगी होंगी- कुल मिलाकर। भविष्य में भी जीएसटी के कारण महंगाई कम होने का कोई कारण नजर नहीं आता। करों की दरों के अलावा महंगाई पैदा करने वाले सारे कारक भविष्य में भी सक्रिय रहेंगे। इसीलिए महंगाई भी रहेगी। 

सवालः क्या जीएसटी से सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर में बढ़ोत्तरी होगी?

जवाबः सरकार और उसके समर्थकों का दावा है कि सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर में जीएसटी से दो प्रतिशत की वृद्धि हो जायेगी। यानी अब हर साल अर्थव्यवस्था दो प्रतिशत और ज्यादा दर से विकास करेगी। भारत की अर्थव्यवस्था की गति से परिचित कोई भी व्यक्ति जानता है कि यह शुद्ध सरकारी प्रचार है। भारत की अर्थव्यवस्था की समस्या ‘सप्लाई साइड’ नहीं है बल्कि ‘डिमान्ड साइड’ है। मतलब यह कि समस्या यह नहीं है कि मालों के उत्पादन और ग्राहकों तक पहुंचने में बाधा है जिसे दूर कर देने से अर्थव्यवस्था की गति तेज हो जायेगी। समस्या मालों की बिक्री की है। मालों के ग्राहक नहीं हैं। बाजार मालों से पटा पड़ा है। देश के लोगों की क्रय क्षमता सीमित है और उसमें बढ़ोत्तरी के कोई आसार नहीं हैं। ऐसे में यदि मालों की आपूर्ति बढ़ती है तो यह बाजार में अनबिकी चीजों की मात्रा बढ़ायेगी। बैंक जिस एनपीए की समस्या से जूझ रहे हैं उसमें वृद्धि ही होगी। 

सवालः तब फिर बड़े पूंजीपति जीएसटी के इतने समर्थक क्यों हैं?

जवाबः बड़े पूंजीपति वर्ग को लगता है कि जीएसटी से अप्रत्यक्ष करों की कुल मात्रा में बढ़ोत्तरी होगी। ऐसा होने पर बड़े पूंजीपति सरकार पर दबाव बना सकते हैं कि वह प्रत्यक्ष करों की दरें घटाए। उदारीकरण के पूरे दौर में बड़े पूूंजीपति वर्ग की यह कोशिश रही है कि प्रत्यक्ष करों को घटाकर अप्रत्यक्ष करों को बढ़ाया जाये। जीएसटी भी यही करेगा। इसके साथ यह भी है कि जीएसटी के द्वारा पूरे देश के पैमाने पर एक एकीकृत बाजार अस्तित्व में आ जायेगा। बड़े पूंजीपतियों का माल बेरोक-टोक देश में एक छोर से दूसरे छोर तक जा सकेगा। प्रदेशों की सीमा पर बनी कर चौकियां अब इसमें बाधा नहीं बनेंगी। बड़े पूंजीपति वर्ग को उम्मीद है कि इससे मालों की ढुलाई में समय की जो बचत होगी उससे उसका मुनाफा बढ़ेगा। साथ ही एकीकृत बाजार बड़े पूंजीपतियों की छोटे पूंजीपतियों पर प्रभुता को और ज्यादा पक्का कर देता है।

सवालः इससे प्रदेशों के विकास पर क्या असर पड़ेगा?

जवाबः जीएसटी के द्वारा एकल कर प्रणाली और एकीकृत बाजार व्यवस्था लागू होने से प्रदेशों के बीच असमानता और बढ़ जायेगी। आजादी के बाद प्रदेशों की कर प्रणाली लागू करने के पीछे यह भी सोच थी कि इसके द्वारा प्रदेश अपनी जरूरतों के हिसाब से कर लगा सकेंगे। प्रदेशों द्वारा ज्यादा स्वायत्तता की मांग के पीछे यह भी एक कारक था। इस सबके बावजूद प्रदेशों के बीच असमानता लगातार बढ़ती गयी है। अब जीएसटी से इस असमानता में और वृद्धि हो जायेगी। प्रदेश सरकारों की स्वायत्ता में कटौती होगी और वे केन्द्र सरकार पर और ज्यादा निर्भर हो जायेंगी। यह देश के संघीय ढांचे को और ज्यादा समस्याग्रस्त बनाएगा। 

सवालः तब विपक्षी पार्टियों ने जीएसटी का तीखा विरोध क्यों नहीं किया?

जवाबः आज राष्ट्रीय ही नहीं प्रादेशिक पार्टियां भी पूरी तरह बड़े पूंजीपति वर्ग के इशारों पर चल रही हैं। सभी आम तौर पर उदारीकरण की समर्थक हैं। सत्ता से बाहर रहने पर वे विरोध का कुछ दिखावा जरूर करती हैं। पर वस्तुतः वे पक्ष में ही होती हैं। वर्तमान जीएसटी की शुरूआत वाजपेयी सरकार के जमाने में हुयी थी। बीच की कांग्रेस सरकार ने इसे आगे बढ़ाया और अब मोदी की भाजपा सरकार इसे लागू कर रही है। विपक्ष में रहते भाजपा ने इसका विरोध किया था और अब कांग्रेस ना-नुकुर कर रही है। जहां तक प्रादेशिक पार्टियों की बात है, वे अपने यहां पूंजी निवेश के लिए बड़े पूंजीपतियों को हर तरीके से लुभाती हैं। ऐसे में जीएसटी का उनका विरोध दिखावा ही हो सकता है। यह इसके बावजूद कि जीएसटी प्रदेशों की आर्थिक स्वायत्तता को कम करता है। 

सवालः जीएसटी का जनता के विभिन्न हिस्सों पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

जवाबः इसका सामान्य जवाब तो यही है कि इससे देश की आय का बड़े पूंजीपतियों के पक्ष में वितरण बढ़ेगा यानी पहले के मुकाबले अब आय का बड़ा हिस्सा बड़े पूंजीपतियों के हिस्से में आयेगा। आम जनता की हालत उसी अनुपात में गिरेगी। पर जनता के अलग-अलग हिस्से इसे अलग-अलग तरह से महसूस करेंगे। जहां छोटे दुकानदारी वाले इसे एक तरह से महसूस करेंगे वहीं मजदूर दूसरी तरह से। मामला अप्रत्यक्ष करों का होने के चलते यह धीमे-धीमे और अप्रत्यक्ष तरीके से ही महसूस होगा। हां, महंगाई तत्काल बढ़ने से यह तत्काल ही महसूस होने लगेगा।

सवालः जनता की हालत को बदतर बनाने के बावजूद क्या यह दूरगामी तौर पर प्रगतिशील कदम है?

जवाबः पूंजीवाद में दूरगामी तौर पर प्रगतिशील कदम भी अक्सर ही मजदूर-मेहनतकश आबादी के लिए तात्कालिक तौर पर भारी विपदा साबित होते हैं इसीलिए वे उनका विरोध करते हैं। छंटनी करने वाली नयी तकनीक इसका एक उदाहरण है। जीएसटी मजदूर-मेहनतकश जनता की कीमत पर बड़े पूंजीपति वर्ग को फायदा पहुंचायेगा। पर क्या यह देश के समग्र पूंजीवादी विकास के लिहाज से दूरगामी तौर पर फायदेमंद होगा? नहीं, ऐसा नहीं होगा। ऐसा तब होता जब देश में आर्थिक असमानता कम होती। विभिन्न क्षेत्रों की आर्थिक स्थिति समान होने पर उनको एक सूत्र में बांधने वाला एकीकृत बाजार बड़ी संभावनाएं प्रदान कर पूंजीवादी विकास को बढ़ाता है। पर यदि क्षेत्रों के बीच असमानता ज्यादा हो तो एकीकृत बाजार इस असमानता को और ज्यादा बढ़ाता है। विकसित क्षेत्र और विकसित हो जाते हैं जबकि पिछड़े क्षेत्र और पिछड़े। इससे कुल मिलाकर पूंजीवादी विकास बाधित हो जाता है। यह समूची पूंजीवादी व्यवस्था के लिए विध्वंसकारी साबित हो सकता है। 

    1 जुलाई की रात को जीएसटी लागू करते हुए मोदी सरकार ने और साथ ही बड़े पूंजीपति वर्ग ने दूसरी आजादी का जश्न मनाया। भारत में दूसरी आजादी का जश्न कई बार मनाया जा चुका है। पर हर बार जश्न बाद में प्रहसन ही साबित हुआ। इस बार भी जीएसटी के द्वारा दूसरी आजादी भी प्रहसन ही साबित होगी। पर हर बार प्रहसन की कीमत देश के मजदूर-मेहनतकश आबादी को ही चुकानी पड़ी है। इस बार भी उसे ही चुकानी पड़ेगी-सीधे-सीधे पैसे में भी। 

    पर साथ ही यह भी सच है कि हर प्रहसन से मजदूर-मेहनतकश जनता और ज्यादा चेतना सम्पन्न होती जाती है। शासकों द्वारा उसे धोखा देने की क्षमता और कम होती जाती है। सारे पूंजीवादी प्रचार के बावजूद पिछले कुछ महीनों के विरोध-प्रदर्शन ही इसके प्रमाण हैं। 

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