अंक : 16-31 JUL, 2017 (Year 20, Issue 14)

फिलवक्त युद्ध नहीं, युद्ध का माहौल चाहिये


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    भारत के अपने दो विशाल पड़ोसी देशों चीन व पाकिस्तान के साथ रिश्ते तल्ख से तल्ख होते जा रहे हैं। चीन के साथ सिक्किम-भूटान सीमा पर चल रहा विवाद एक बड़े तनाव की ओर बढ़ रहा है। इस तनाव को बढ़ाने में भारत और चीन के राजनेता और सैन्य अधिकारी बढ़ चढ़ कर योगदान कर रहे हैं। इसी तनाव के बीच भारत, अमेरिका व जापान के साथ हिन्द महासागर में ‘मालाबार सैन्य अभ्यास’ कर रहा है। यह अभ्यास तनाव को और बढ़ा रहा है।

    इसी तनाव के बीच दुनिया के प्रमुख बीस देशों की बैठक G-20 जर्मनी में भारी विरोध के बावजूद आयोजित होती है। भारत व चीन के शासक वहां आमने-सामने होते हैं। सवाल उठता है क्यों ये परमाणु हथियार से सम्पन्न देश बातचीत के बजाय एक-दूसरे को सैन्य धमकियां दे रहे हैं। भारत का रक्षामंत्री कहता है कि ‘भारत, 1962 का भारत नहीं है’ तो जवाब में चीन भी कहता है कि ‘वह 1962 का चीन नहीं’ है। क्यों भारत और चीन पिछले साठ-सत्तर सालों में आपसी सीमा विवाद को नहीं सुलझा सके हैं? क्यों चीन-भारत के बीच लगातार बढ़ते व्यापार के बीच सीमा विवाद और युद्ध की आशंका सर उठाती रहती है? यही स्थिति कमोबेश पाकिस्तान के साथ है। जहां एक तरफ व्यापार बढ़ता रहता है और दूसरी तरफ सीमा पर तनाव। शासकों की लगातार बयानबाजी और एक-दूसरे को देख लेने की धमकियां भी बदस्तूर जारी रहती हैं।

    ये साफ है चाहे भारत हो या चीन या पाकिस्तान एक ही तरह की नीतियों पर चल रहे हैं। तीनों ही देश परमाणु और अन्य विनाशक हथियारों से लैस हैं। किसी भी बड़े युद्ध का मतलब होगा भारी विनाश। क्या इन देशों के शासक किसी युद्ध की तैयारी में लगे हैं? इसका जवाब फिलवक्त नहीं हो सकता है। क्या भविष्य में युद्ध का खतरा दक्षिण एशिया में मण्डरा रहा है। इसका जवाब यही हो सकता है युद्ध फूट भी सकता है।

    तीनों ही देश लगातार हथियारों का जखीरा इकट्ठा कर रहे हैं। अपने-अपने देशों में न केवल विनाशक हथियारों को तैयार कर रहे हैं बल्कि भारी पैमाने पर विदेशों से हथियार खरीद भी रहे हैं। यानी किसी संभावित युद्ध के लिये अपने आपको लगातार तैयार कर रहे हैं। युद्ध को भड़काने के लिये तीनों के पास सीमा विवाद की सामग्री मौजूद है ही। सीमा पर गोलीबारी से लेकर युद्ध हो भी चुके हैं। चीन के साथ 1962 और पाकिस्तान के साथ दो बडे़ युद्ध भारत के शासक लड़ चुके हैं। इन युद्धों ने सीमा पर चल रहे विवादों को किंचित भी हल नहीं किया। भारत के शासक सीमा पर चल रहे विवादों को न युद्ध से और न वार्ताओं से हल कर सके हैं। तो विवाद हल कैसे होंगे। कमजोर पड़ोसियों को तो भारत दबा के या कुछ ले-दे के विवाद हल करता रहा है पर उसी के बराबर या उससे ज्यादा ताकतवर देश से सीमा विवाद कैसे हल होगा।

    यहां दो प्रश्न प्रमुख तौर पर हैं। पहला, क्या भारत और उसके पड़ोसियों के बीच क्या कोई युद्ध तत्काल छिड़ सकता है? इसका जवाब सारे समीकरणों को ध्यान में रखा जाय तो शायद नहीं छिड़ सकता है। फिर ये शासक क्या चाहते हैं। ये शासक युद्ध नहीं युद्ध का माहौल चाहते हैं। युद्ध का माहौल इन देशों के भीतर बढ़ते आंतरिक संकट में बड़े काम का है। अंधराष्ट्रवाद शासकों के लिये देश के भीतर से उठती सही आवाजों को दबाने में हमेशा से कारगर हथियार रहा है। राष्ट्र की सुरक्षा का प्रश्न उठाकर चुनाव जीतने से लेकर काले कानून बनाने में इन्हें हमेशा मदद मिलती रही है। चीन का मामला पाकिस्तान और भारत से इस मामले में अलग है कि वहां लगभग एकदलीय शासन है और चुनाव जीतने की मजबूरी नहीं है। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी एक पूंजीवादी पार्टी है जो कि चीन में समाजवाद नहीं पंूजीवादी व्यवस्था को संचालित करती है। देश के भीतर एक तरह से फासीवादी राज्य को चला रही है। दुनिया में दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के साथ उसकी साम्राज्यवादी शक्ति की महत्वाकांक्षा आसमान छू रही हैं। दूसरा सवाल कि क्या इन देशों के बीच चल रहे सीमा विवाद का समाधान हो सकता है। साठ-सत्तर साल के इतिहास से तो यही जाहिर होता है कि नहीं हो सकता है। यह तभी हो सकता है जब इन देशों में पूंजीपतियों के शासन का अंत हो जाये और तीनों ही देशों में मजदूरों-किसानों की सत्ता कायम हो जाये। यानी पूंजीवाद में नहीं समाजवाद कायम होने पर ही सीमा विवाद निर्णायक तौर पर हल हो सकता हैं।

    अभी स्थिति यह है कि चीन, भारत और पाकिस्तान अपनी सीमाओं का विस्तार चाहते हैं। खासकर चीन और भारत अपनी वर्चस्वकारी स्थिति दक्षिण एशिया में चाहते हैं। चीन और पाकिस्तान के शासकों की गहरी निकटता भारत के शासकों की पेशानी पर बल डाल देती है। और दोनों ही जानते हैं कि भारत के शासक जिस तरह से अमेरिकी साम्राज्यवाद के बगलगीर होते जा रहे हैं ये उनके लिये अच्छा है कि वे गहरे आर्थिक व सामरिक सम्बन्ध-कायम करें। भारत के शासक कितना ही कहें कि वे ढाई युद्ध (चीन और पाकिस्तान के साथ दो युद्ध व आंतरिक आधा युद्ध) लड़ने में सक्षम हैं परन्तु ये युद्ध लड़ना आसान है पर जीतना मुश्किल है।

    युद्ध होने के हालात में भारत, चीन और पाकिस्तान की मेहनतकश जनता को क्या करना चाहिये। इसका जवाब है उन्हें युद्ध का हर हालत में विरोध करना चाहिये। उन्हें वर्तमान युद्ध के माहौल और अंधराष्ट्रवाद का भी विरोध करना चाहिये। युद्ध छेड़ने की अवस्था में उन्हें घोषित करना चाहिये कि ये युद्ध तीनों देशों की जनता के खिलाफ है। अन्यायपूर्ण हैं। सीमा पर कब्जे और क्षेत्रों के विस्तार के लिये है। इसमें किसी किस्म की देशभक्ति नहीं है। इससे आगे बढ़कर उन्हें इस अन्यायपूर्ण युद्ध के खिलाफ शांति और क्रांति के लिये न्यायपूर्ण युद्ध छेड़ना होगा।

Labels: सम्पादकीय


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