अंक : 16-31 JUL, 2017 (Year 20, Issue 14)

दुकान मजदूरों की कम सैलरी के कारण गिरता उनका जीवन स्तर


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    कैसे लिखूं हाल अपने दिल का कि दिल घबराता है और शरीर कांप उठता हैै। बरेली शहर के बड़ा बाजार के चारों तरफ दुकानें ही दुकानें हैं थोक व फुटकर सामानों की। इन दुकानों पर हजारों की तादाद में लड़के, लड़कियां व 12,13 व 15 साल के बच्चों से लेकर बड़े बुजुर्ग भी इस बाजार में काम करने आते हैं।

    बाजार में काम करने की वजह यह है कि बरेली शहर के चारों तरफ फैक्टरियां बिल्कुल ना के बराबर हैं और कुछ फैक्टरियां हैं भी तो उसके भी हाल खराब हैं। वहां पर भी लोग बहुत बुरी स्थिति में नौकरी कर रहे हैं।

    बड़े बाजार (बरेली शहर) की दुकानें तो दिन-प्रतिदिन बड़ी होती जा रही हैं पर दुकान मजदूरों की हालत व उनका जीवन स्तर दिन-ब-दिन गिरता जा रहा है। वहीं हम देखते हैं कि दुकान मालिकों के पेट बढ़ते जा रहे हैं और उनके बच्चे भी लाला बनते जा रहे हैं।

    दुकान मजदूर कम सैलरी के कारण न तो अच्छा खाना खा पाता है, न ही अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ा पाता है, न ही अपने लिए एक छोटी सी झोपड़ी बना पाता है।

कम सैलरी का उदाहरण - एक बार मैं एक बाजार में काम करने वाली महिला से मिला। तो उन्होंने बताया कि वह आये दिन बीमार हो जाती हैं और लोकल डाॅक्टर से दवा लेती हैं। ठीक हो जाने पर फिर से दुकान में काम करने चली जाती हैं। ऐसे हालात में वे महिला काम करने को मजबूर हैं। फिर मैंने उन महिला से कहा कि आप बार-बार बीमार हो जाती हैं किसी अच्छे डाॅक्टर को दिखाइये। उन्होंने कहा कि खाने को रोटी नहीं है अच्छे डाॅक्टर को कहां से दिखायेें।

    अगर हम बाजार में काम करने वाली महिलाओं से मिलें तो पता चलेगा कि उनकी सैलरी पुरुष कर्मचारी से आधी है। जैसे 2000, 2500, 3000 व 3800 रुपये प्रति माह। इतनी कम सैलरी में कोई महिला अपने परिवार का खर्चा कैसे चला पायेगी और जिसमें महंगाई दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। 

    दुकान मालिक 10 साल से 15 साल के लड़के चाय-पानी पिलाने के लिए रखते हैं। इनकी सैलरी इस महंगाई में 1000, 1500, 2000 रुपये दी जाती है और जब काम का सीजन चलता है तो इन बच्चों से चाय-पानी के अलावा दुकान के और भी कई भारी काम भी कराये जाते हैं। 

    इन बच्चों के घरों में जब इनके पिता घर का खर्च कम सैलरी के कारण पूरा नहीं कर पाते। तब ऐसी मजबूरी के हालात में इन बच्चों के माता-पिता को अपने सीने पर पत्थर रखकर इन्हें बाजार में काम के लिए भेजना पड़ता है। 

    इसी कारण इन मजदूर बच्चों का शारीरिक विकास मानसिक विकास नहीं हो पाता है तथा इन मजदूर बच्चों को इनके माता-पिता कम सैलरी के कारण न तो पढ़ा पाते हैं, न अच्छा खाना खिला पाते हैं। और बहुत सी कमियां इनके जीवन में रह जाती हैं जिसका खामियाजा सारी जिन्दगी उठाना पड़ता है।

    इन बाजारों में काम करते-करते इन्सान बूढ़ा हो जाता है पर वह दुकान मजदूर बूढ़ा हो जाने के बावजूद अपने लिए एक तिनका भी नहीं जोड़ पाता है। कम सैलरी के कारण, काम का बोझ अधिक होने के कारण यह दुकान मजदूर जल्द कमजोर-बूढ़ा हो जाता है तथा काम पर ही उसकी मृत्यु भी हो जाती है।

    कई बार यह देखने में आता है कि जब दुकान मालिक देखता है कि अब यह दुकान मजदूर बूढ़ा हो गया है और इससे ज्यादा काम नहीं हो पा रहा है, तो इन बूढ़े दुकान मजदूरों को नौकरी से निकाल देते हैं। इसके बाद ये बेचारे बूढ़े मजदूर और कई दुकानों पर काम मांगने जाते हैं पर कोई भी दुकान मालिक इन बूढ़े मजदूरों को रखने को तैयार नहीं होते हैं। इसके कारण इन बूढ़े दुकान मजदूरों की जिन्दगी एक अन्धे कुएं में चली जाती है और एक दिन इनकी जिन्दगी का अन्त हो जाता है। एक दुखद अन्त। 

    अब बात आती है 18 से 40 साल तक के दुकान मजदूरों की। इनकी हालत भी कुछ अच्छी नहीं है। कारण इन्हें मिलने वाली कम सैलरी ही है। कई बार काम करते-करते 2 से 3 साल हो जाते हैं पर मालिक सैलरी बढ़ाने का नाम ही नहीं लेता तथा जब भी दुकान मजदूर सैलरी को लेकर इन दुकान मालिकों के पास जाते हैं तो ये लोग कई बहाने बनाकर टाल देते हैं, बात नहीं करते हैं, ऐसा करते-करते काफी समय निकल जाता है और सैलरी नहीं बढ़ती। कम सैलरी के कारण इनका जीवन इतना कष्ट में हो जाता है कि लगता है या तो खुद मर जाओ या इस कमीने मालिक को मार डालो। पर जब मजदूर होश में आता है तब वह सोचता है कि मेरे बाद मेरे बीवी-बच्चों का क्या होगा। यह सोचकर वह गलत कदम उठाने से रुक जाता है। मालिक वर्ग इतना कमीना होता है कि आप अपनी पूरी जिन्दगी उसके आगे तथा उसकी दुकान में गुजार देना, फिर भी मालिक को कोई तरस नहीं आता। कई बार दुकान पर काम करने के दौरान गलती होने पर मालिक काफी गाली-गलौज करता है तथा यह तक कह देता है कि तुम मरो या जियो मुझे इससे कुछ नहीं लेना, मुझे सिर्फ व्यापार से मतलब है। बताइये कितनी शोचनीय बात है कि इतनी बड़ी दुकान क्या वह मालिक अकेले चला सकता है। नहीं, कभी नहीं। क्योंकि उस दुकान को चलाने का मेन रोल हम दुकान मजदूर भाईयों का है जो 12 से 14 घण्टे काम करके उस दुकान को इतना बड़ा बना देते हैं कि वह दुकान मालिक उस दुकान से एक और दुकान, एक और व्यवसाय तथा कोई अन्य काम खोल लेता है। पर हमारी हालत बुरी से बुरी होती जाती है तथा हमें एक जिल्लत भरी जिन्दगी जीनी पड़ती है। 

    दुकान पर काम के हालात इतने बुरे हैं कि हम दुकान मजदूरों को दुकान पर रखा किसी और काम के लिए जाता है पर दुकान के । र्से   तक सारे काम कराये जाते हैं जिसमें इन मालिकों के घर के काम भी करने पड़ते हैं। कई बार काम करते-करते दुकान मजदूर को अपनी इज्जत बचानी महंगी पड़ती है क्योंकि मालिक वर्ग इतना कमीना होता है कि हम जिसे भी काम पर रख रहे हैं वो वक्त आने पर मालिक वर्ग की (हिप्स) तक धो दे। इतनी घिनौनी सोच इस दुकान मालिक की है। सोचिए, इस सोच का क्या किया जा सकता है।

    कम सैलरी का जो समीकरण इन दुकान मालिकों ने बनाया है यह वास्तव में बहुत शोचनीय है। क्योंकि मैंने (रमेश) अपनी दुकान में देखा है कि किसी स्टाफ की शादी या अन्य समारोह में जाने के लिए स्टाफ को पहले अपनी जेब देखनी पड़ती हैं ऐसा इसलिए है कि कम सैलरी होने के कारण महीने के 8 से 10 दिन ही दुकान मजदूरों की जेब में पैसे रहते हैं बाकी के बचे दिन वह खाली जेब ही काटते हैं। अगर इन 20 दिनों में अतिरिक्त पैसे की जरूरत पड़ती है तो वह कहीं बाहर से कर्जा लेता है या दुकान के अन्दर के लोगों से कर्जा लेता है और अपना काम चलाता है। कई बार कम सैलरी के कारण दुकान मजदूर क्या अन्य मजदूरों को अपने परिवारजन की उपेक्षा सहन करनी पड़ती है। कई बार रिश्तेदारों के बीच भी कम सैलरी वाले मजदूर भाईयों को बेइज्जत होना पड़ता है। क्योंकि सारी दुनिया पूंजी के वशीभूत हो चुकी है। कम सैलरी का आलम यहां तक पहुंच चुका है कि मजदूर भाई जब कोई त्यौहार आता है तब वह अपने बच्चोें और पत्नी व परिवार के अन्य सदस्यों के तो कपड़े बनवा लेता है पर अपनी बारी में वह कपड़े नहीं बनवाता है। इस बात को दो-दो साल बीत जाते हैं। वह अपनी जिन्दगी फटेहाल कपड़ों में ही गुजारता रहता है। 

    मजदूर वर्ग का जीवन इतना बेकार हो जाता है कि वह परिवार की मूल जरूरत की चीजें भी नहीं जुटा पाता है और एक दिन इन परेशानियों से जूझते हुए उसकी मृत्यु तक हो जाती है। 

    मेरा एक सवाल है कि कब ये सब परेशानियां दूर होंगी, होंगी भी या नहीं। मेरा मानना है कि अब भारत में कोई भी पार्टी की सरकार बनने पर मजदूर वर्ग की हालत क्यों सही नहीं होती। क्योंकि यह दिखाती तो यह है कि जनता की सरकार है और हम जनता के लिए काम करती हैं पर इन सरकारों में बैठी पार्टियां जब भी कोई कानून, नयी योजना आदि लाती हैं। तो जब हम इन कानूनों, योजनाओं की अन्तर्वस्तु को देखेंगे तो पता चलेगा कि इन सरकारों ने जो नीतियां जनता के लिए बनायी होती हैं उनके अन्दर एक बारीक छेद कर रखा होता है और उस छेद के जरिये मजदूर वर्ग के लिए शोषणकारी रास्ता जा रहा होता है। इस रास्ते के जरिये ये जनता का शोषण करने का ही काम करते हैं और बड़े-बड़े पूंजीपतियों की सेवा ही करते नजर आते हैं इन सरकारों में बैठी पार्टियों का उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ जनता को बेवकूफ बनाना ही होता है। अब भी अगर लोग इन पार्टियों पर उम्मीद रखते हैं तो मेरी नजर में इनसे बड़ा नासमझ कोई नहीं हैं। 

    अब समय आ चुका है कि इस समाज के अन्दर बदलाव होना चाहिए और ये बदलाव सिर्फ और सिर्फ जनता ही कर सकती है। इतिहास गवाह है कि इस दुनिया के स्तर पर जो भी बदलाव हुए हैं वे सब जनता ने ही किये हैं। 

    - दीपक, बरेली, उत्तरप्रदेश मार्केट वर्कर्स एसोसिएशन, उत्तरप्रदेश

Labels: मजदूरों के पत्र


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