अंक : 16-31 JUL, 2017 (Year 20, Issue 14)

बांग्लादेश में गारमेण्ट फैक्टरी में बाॅयलर फटने से 13 मजदूरों की मौत


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    3 जुलाई को शाम को बांग्लादेश के ढाका के बाहरी इलाके गाजीपुर में स्थित मल्टीफेब लिमिटेड गारमेण्ट फैक्टरी में बाॅयलर फटने से 13 मजदूरों की मौत हो गयी और 50 से ज्यादा लोग घायल हो गये। यह घटना उस समय की है जब 3 जुलाई शाम को बाॅयलर की मरम्मत के बाद उसे शुरू किया गया और 1 घंटे बाद ही वह फट गया। इससे पहले प्लांट ईद की छुट्टी के कारण बन्द था और 4 जुलाई से इसमें काम शुरू होना था। अगर छुट्टी न होती तो मरने वालों की संख्या और ज्यादा हो सकती थी। 

    मल्टीफेब लिमिटेड गारमेण्ट फैक्टरी यूरोप की ब्रांडेड कम्पनियों लिन्डेक्स, एएलडीआई, डेन्क्स सुपरमार्केट एआईएस, शाॅप डायरेक्ट और कई अन्य के लिए रेडीमेड वस्त्र तैयार करती है। इसमें कुल मिलाकर 6000 लोग काम करते हैं। इस कम्पनी की स्थापना 1992 में हुई थी और 2016 तक यह इतनी बड़ी हो चुकी थी कि यह 7 करोड़ डाॅलर सालाना का निर्यात करने लगी थी। 

    मल्टीफेब लिमिटेड फैक्टरी में बाॅयलर फटने से हुई मजदूरों की मौत ने एक बार फिर बांग्लादेश में फैक्टरियों में मजदूरों की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है। जब 2013 में राणा प्लाजा में बिल्डिंग दुर्घटना में 1000 से ज्यादा लोगों की मौत हुयी थी तब मजदूरों की सुरक्षा की बातें मीडिया में सुर्खियां बनीं और बांग्लादेश में कपड़े बनवाने वाली ब्रांडेड कम्पनियों ने अपनी साख बचाने के लिए मजदूरों की सुरक्षा व्यवस्था दुरूस्त करने के लिए दो संगठन बांग्लादेश एकार्ड आन फायर एण्ड बिल्डिंग सेफ्टी (बीएससीआई- BSCI) और एलायन्स फाॅर बांग्लादेश वर्कर सेफ्टी (ABWS) बनाये थे। जब यह दुर्घटना हुयी उससे एक सप्ताह पूर्व ही बांग्लादेश की ट्रेड यूनियन और बीएससीआई के बीच तीन साल तक के लिए इसे और बढ़ाने पर समझौता हुआ और यह अब मई 2018 से 2021 तक बढ़ गया लेकिन इस दुर्घटना ने यह दिखला दिया कि पूंजीपति वर्ग मजदूरों के प्रति कितना चिंतित रहता है। 

    जैसा कि इस मामले में सामने आ रहा है कि यह बाॅयलर 24 जून को एक्सपायर हो गया था लेकिन इसके बावजूद इसे चलाया जा रहा था। बीएससीआई ने भी इस फैक्टरी में मई 2016 को ही आॅडिट किया था उसने इस फैक्टरी में कोई खास सुरक्षा मानकों के लिए फैक्टरी को नहीं चेताया था। यह आॅडिट दो साल के लिए मान्य होता है। हालांकि यह बाॅयलर का निरीक्षण नहीं करती है। बाॅयलर के निरीक्षण का काम बांग्लादेशी सरकार का है और इस मामले में फैक्टरी को यह चेतावनी दी गयी थी कि वह बाॅयलर को आग वाली जगह से दूर लगाये इसके बावजूद इस काम को नहीं किया गया। 

    जब भी मजदूरों के साथ ऐसी दुर्घटना हो जाती हैं जिसमें मजदूर बड़ी संख्या में मारे जाते हैं तो बांग्लादेश की सरकार व ब्रांडेड कम्पनियां मजदूरों की सुरक्षा के प्रति चिंतित होने का दिखावा करती हैं, उनके प्रति संवेदनशील होने का दिखावा करती हैं लेकिन उनके ये दिखावे घडियाली आंसू ही होते हैं। यह बात हमें उनके मजदूरों के प्रति होने वाले व्यवहार से ही साफ पता चल जाती है। आज बांग्लादेश के गारमेण्ट मजदूरों को मात्र 68 डाॅलर(5440 टका) मिलते हैं जबकि चीन में मजदूरों को 280 डाॅलर मिलते हैं। इसके अलावा काम के लम्बे घंटे और यूनियनों को न बनने देना मजदूरों की स्थिति को और बुरी बनाता है। लेकिन कहीं से भी इनके बारे में बात नहीं की जाती हैं। अगर बांग्लादेशी सरकार व ब्रांडेड कम्पनियां मजदूरों के प्रति वास्तव में इतनी ही हमदर्द हैं तो फिर वे मजदूरों की इन समस्याओं के प्रति क्यों खामोश हैं?

    जब 2013 में राणा प्लाजा की बिल्डिंग के ढहने से 1000 से ज्यादा मजदूर मारे गये थे तब मजदूरों ने फैक्टरी प्रबंधकों को इस बात की जानकारी दी थी कि फैक्टरी की बिल्डिंग में दरारें हैं और कभी भी दुर्घटना हो सकती है। इसके बावजूद मजदूरों को काम पर जबर्दस्ती बुलाया गया और न आने पर तनख्वाह न देने की बात की गयी। ऐसे में यदि मजदूरों की सशक्त यूनियन वहां होती तो वह विरोध कर सकती थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ और अगले ही दिन बिल्डिंग ढहने से 1000 से ज्यादा मजदूर मारे गये। उसके बाद जिन लोगों पर केस दर्ज हुए उनमें अधिकांश लोग आज छूट चुके हैं। 

    बांग्लादेश में आज रेडीमेड वस्त्र उद्योग का एक महत्वपूर्ण स्थान है। आज निर्यात में 80 प्रतिशत हिस्सा रेडीमेड वस्त्रों का है। इस उद्योग में बांग्लादेश में 40 लाख लोग काम करते हैं तथा 28 अरब डाॅलर का इसका कारोबार है। इसका अधिकांश निर्यात यूरोप व अमेरिका को होता है। यहां का सस्ता श्रम बड़ी-बड़ी ब्रांडेड कम्पनियों के लिए आकर्षण का केन्द्र है। इसके अलावा यहां मजदूरों की जान सस्ती है और सुरक्षा के मानकों के ढीले होने के कारण और कम लागत आती है। इसलिए उन्होंने अपने उद्योगों को यहां स्थापित किया है। मजदूरों की लाशों पर ये कम्पनियां अकूत मुनाफा पीट रही हैं।

Labels: मजदूर हालात


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