अंक : 16-31 JUL, 2017 (Year 20, Issue 14)

भारत: केरल में हजारों नर्स हड़ताल पर


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    केरल में राज्य सरकार से नर्सों के संगठन यूएनए(यूनाइटेड नर्सेज एसोसिएशन- UNA) और आईएनए (इण्डियन नर्सेज एसोसिएशन - INA) की वार्ता विफल होने के बाद 80,000 नर्सें हड़ताल पर चली गयी हैं। नर्सों के ये दोनों ही संगठन स्वतंत्र संगठन हैं। ये संगठन पिछले साल जनवरी 2016 में सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय को लागू करने की मांग कर रहे हैं जिसके अनुसार सभी राज्यों में नर्सों का न्यूनतम वेतन 20,000 रुपये होना चाहिए। वैसे तो यह हड़ताल 28 जून से शुरू हो गयी थी लेकिन अभी तक यह आंशिक थी तथा हाॅस्पिटल की जरूरी सेवाएं चालू थीं और नर्स अपनी ड्यूटी के बाद धरने पर आकर बैठती थीं। आईएनए से जुड़ी कुछ नर्स भूख हड़ताल पर भी थीं।  

    नर्सों की इस हड़ताल को विदेशों में काम कर रही भारत की नर्सों से भी भारी समर्थन मिल रहा है। लेकिन वहीं सीपीएम या सीपीआई से जुड़ी वामपंथी ट्रेड यूनियनों से इन्हें कोई समर्थन नहीं मिल रहा है। इन ट्रेड यूनियनों को डर है कि स्वतंत्र ट्रेड यूनियनों के उभरने से उनका अस्तित्व खतरे में न पड़ जाये। यह भी गौर करने वाली बात है कि केरल में कथित मजदूर पार्टी की सरकार है। इन स्वतंत्र ट्रेड यूनियनों की 2013 में न्यूनतम वेतन का निर्धारण करने में मुख्य भूमिका रही है। 

    जब 2013 में न्यूनतम वेतन का निर्धारण किया गया था तब यह 12,000 से 13,000 रुपये था लेकिन इस न्यूनतम वेतन को किसी भी निजी अस्पताल के प्रबंधन ने लागू नहीं किया। आज भी नर्सों का प्रारम्भिक वेतन 6500 रुपये है जो उन्हें ट्रेनी के बतौर दिया जाता है और यह सालों साल तक जारी रहता है। जबकि सरकारी क्षेत्र में नर्सों का प्रारम्भिक वेतन 27,400 रुपये है। इन नर्सों ने अपनी पढ़ाई के लिए कर्ज लिया हुआ है और इतने कम वेतन में ये उस कर्ज को उतारने में सक्षम नहीं हैं। यूएनए के मुताबिक कर्ज की वजह से 28 नर्सों ने आत्महत्या की है। 15 साल तक काम करने वाली नर्सों का वेतन मात्र 9000 रुपये है। कई नर्सों ने हड़ताल के दौरान बताया कि उनके ऊपर परिवार की जिम्मेदारी हैं। वे परिवार में अकेले कमाने वाली हैं। ऐसे में बच्चों की पढ़ाई और बीमार सदस्यों के साथ इतने कम वेतन में गुजारा करना मुश्किल है जबकि किराये में लगभग 3000 रुपये खर्च हो जाते हैं। 

    अस्पतालों के मालिकों द्वारा अब तक सरकार द्वारा तय न्यूनतम वेतन नहीं दिया जा रहा है उस पर सरकारी नियम कायदे कानून ऐसे हैं जिससे उन्हें ऐसा करने पर खास सजा भी नहीं मिल सकती है या उस सजा का उन पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता है। अगर कोई अस्पताल का प्रबंधन न्यूनतम वेतन नहीं देता है तो उस पर 500 से लेकर 5000 तक का ही जुर्माना है। यह सरकार की पूंजीपतियों के साथ पक्षधरता को दिखलाता है। आज जब नर्सें अपने आंदोलन में कूद पड़ी हैं तब श्रम विभाग के लेबर कमिश्नर कह रहे हैं कि सरकार  न्यूनतम वेतन न देने वाले मालिकों के खिलाफ नया कानून लेकर आ रही है जिसके तहत जुर्माना 5 लाख या 2 लाख प्रति व्यक्ति के हिसाब से होगा। 

    वहीं दूसरी तरफ निजी अस्पतालों की एसोसिएशन केरला इंस्ट्टीट्यूट आॅफ मेडिकल साइंस ने कहा है कि उसके अस्पतालों में ज्यादातर छोटे-छोटे अस्पताल हैं जो नर्सों को इतना वेतन देने में असमर्थ हैं। जबकि यह बात सच नहीं है। आज निजी अस्पताल अकूत मुनाफा कमा रहे हैं और अपनी सम्पत्ति में इजाफा कर रहे हैं। वे डाक्टरों को ऊंचा वेतन देते हैं परन्तु नर्सों को बहुत कम वेतन देकर काम पर रखते हैं और उनका शोषण करते हैं। वे सरकार द्वारा तय न्यूनतम वेतन भी उनको नहीं देते हैं और सरकार भी उनके खिलाफ कोई कदम नहीं उठाती है। 

    आज परम्परागत ट्रेड यूनियन सेण्टरों से अलग मजदूरों और कर्मचारियों के संगठन खड़े हो रहे हैं। यह हमें चाय बागान के क्षेत्र में हुए पिछले साल के आंदोलन में भी देखने को मिला। इन आंदोलनों का जुझारूपन निश्चित रूप से इनको इनके आर्थिक संघर्ष में आगे बढ़ायेगा लेकिन इन स्वतंत्र संगठनों को क्रांतिकारी संगठनों में बदलने और इन्हें मजदूर राज की तरफ आगे बढ़ाने की जरूरत है। 

Labels: मजदूर हालात


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