अंक : 16-31 JUL, 2017 (Year 20, Issue 14)

बढ़ती आत्महत्याओं के साथ बढ़ता आक्रोश


किसानों की स्थिति


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    देश में किसानों की स्थिति लगातार बुरी होती जा रही है। इसमें सबसे बुरी बात यह है कि किसान आत्महत्या जैसे खतरनाक कदम तक उठा रहा है। पिछले कुछ सालों में किसानों की आत्महत्या की घटनायें तेजी से बढ़ रही हैं। पर न तो केन्द्र सरकार और न ही राज्य सरकारों ने इस सम्बन्ध में गम्भीर प्रयास किये। 

    किसानों की बढ़ती आत्महत्याओं के आंकड़ों पर नजर डालें तो ‘एक्सीडेंटल डेथ एवं सुसाइड इन इंडिया’ शीर्षक से प्रकाशित राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की एक रिपोर्ट के अनुसार 2014 में कृषि क्षेत्र में कुल 12,360 आत्महत्यायें हुई। इसमें से 5650 किसान और 6710 कृषि मजदूर थे। यानी वर्ष 2014 में हर रोज औसतन 33 आत्महत्यायें देश के किसान/कृषि मजदूरों ने की। वर्ष 2015 में यह आंकड़े और अधिक बढ़ गये। 2015 में 8000 किसान और 8600 कृषि मजदूरों ने आत्महत्यायें की। यानी औसत हर रोज 45 किसान/कृषि मजदूरों ने आत्महत्यायें कीं। 

    पंजाब में एक सर्वे के अनुससार 95 प्रतिशत ग्रामीण परिवार कर्ज में डूबे हुए हैं। पंजाब में 2000 से 2011 की अवधि के दौरान 7631 किसानों और कृषि मजदूरों ने आत्महत्यायें की हैं। 

    पंजाब में कांग्रेस की नई सरकार बनी उसने किसानों की कर्ज माफी की बात की। परन्तु यह बातें जमीनी स्तर पर नहीं उतरीं। तभी तो सत्ता परिवर्तन के तीन महीनों में 60 किसान आत्महत्या कर चुके हैं। 

    सर्वे के अनुसार किसानों की आत्महत्याओं की सबसे ज्यादा घटनायें महाराष्ट्र में हुई हैं। यह कुल किसानों की आत्महत्या का 37.8 प्रतिशत है। जबकि महाराष्ट्र की सरकार कुछ सालों में किसानों की आमदनी दुगुनी करने का वायदा कर रही है। 

    मध्य प्रदेश में भी 1 जुलाई 2016 से फरवरी 2017 तक 818 किसानों और खेत मजदूरों ने आत्महत्या की है। जबकि मध्यप्रदेश के नाम देश में सबसे अधिक कृषि पैदावार का राज्य होने का तमगा लगा है। पिछले 22 सालों में पूरे देश में करीब 3,25,000 किसानों ने आत्महत्या की हैं। यानी औसतन हर साल 14,773, हर महीने 1231 और हर रोज 41 किसानों ने आत्महत्या की है। 

    किसानों की बदहाल होती स्थिति और बढ़ती आत्महत्याओं का एक कारण सरकार की उदारीकरण-वैश्वीकरण की नीतियां हैं। इन नीतियों के कारण बीज, खाद, कीटनाशक, दवायें, सिंचाई के साधनों आदि के मूल्यों में वृद्धि हुई और फसल की लागत बढ़ती गयी है। इन वस्तुओं के लिए किसान कर्ज लेता है। इसके बाद यदि खराब मौसम की वजह से फसल बर्बाद हो जाती है तो किसान के पास बेचने के लिए कुछ नहीं होता। और यदि फसल की पैदावार अच्छी हो जाती है तो फसल की कीमत पहले की तुलना में और कम हो जाती है। किसान को अपनी फसल का उचित मूल्य नहीं मिलता। किसान दोनों तरफ से मरता है। फसल के बर्बाद होने पर भी और पैदावार अच्छी होने पर भी। 

    हरियाणा, कुरूक्षेत्र के पिपली में मंगोली गांव के किसान ने अपना 43 क्विंटल आलू मात्र 900 रुपये में बेचा। 900 रुपये में से किसान ने मंडी के मजदूरों को 520 रुपये मजदूरी का भुगतान किया। किसान के पास 380 रुपये रह गये। किसान ने जब सारा हिसाब लगाया तो उसे पता चला कि मंडी में उसके आलू की कीमत सिर्फ 9 पैसे प्रति किलो रह गयी। यह आंकड़ा हरियाणा सरकार की मार्केट कमेटी के रिकाॅर्ड में दर्ज है। 

    यही हाल टमाटर और प्याज की अधिक पैदावार होने के बाद इनकी फसल लगाने वाले किसानों का भी होता है। 

    अपनी फसल के उचित दाम न मिलने के कारण किसान प्याज, आलू, टमाटर आदि को सड़कों पर फेंकने को मजबूर होता है तो कभी अपनी गन्ने, प्याज आदि की फसल को खेतों में ही जला कर नष्ट करने को मजबूर होता है। इस साल भी कई स्थानों पर इस तरह की कार्यवाही कर किसानों ने अपना आक्रोश दर्ज कराया है। 

    मंडी में इन वस्तुओं के इतना सस्ता बिकने पर भी उपभोक्ताओं को स्थानीय बाजारों में यह वस्तुयें 10-15 रुपये कीमत से नीचे कभी नहीं मिलती। 

    फसल का उचित दाम न मिलने के कारण किसान अपने कर्ज की अदायगी नहीं कर पाता और कर्ज का ब्याज बढ़ता जाता है। आमदनी न होने के कारण किसान को पारिवारिक जरूरतों के कारण जैसे बच्चों की पढ़ाई, शादी व बीमारी आदि में भी कर्ज लेना पड़ता है। कर्ज और ब्याज की अदायगी के लिए राष्ट्रीयकृत बैंकों के अधिकारी भी अमानवीय व्यवहार करते हैं। बैंक व साहूकार उसे बार-बार अपमानित करते हैं। किसान सामाजिक रूप से अपमानित होता है और अंततः आत्महत्या जैसा खतरनाक कदम उठाता है।

    यह भी गौर करने वाली बात है कि ज्यादातर आत्महत्यायें कृषि में उन्नत माने जाने वाले प्रदेश जैसे- महाराष्ट्र, पंजाब, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु आदि प्रदेशों में हो रही है। उदारीकरण, वैश्वीकरण की नीतियों के कारण किसानों ने नकदी फसलों को उगाना तो शुरू कर दिया। परन्तु उन्हें उचित मूल्य व अन्य सुविधायें उपलब्ध नहीं कराईं और किसानों को निर्मम बाजार के हवाले छोड़ दिया गया।

    दूसरी तरफ कृषि से सम्बन्धी सामानों की आपूर्ति करने वाली कम्पनियां लगातार अपने उत्पादों की कीमतें बढ़ा रही हैं। खादों, बीजों, कीटनाशकों आदि की कीमतों में प्रतिवर्ष 10 से 20 प्रतिशत तक इजाफा तय है। कृषि के लिये जरूरी खाद की आपूर्ति करने वाली तीन बड़ी कम्पनियों का मुनाफा 2016-17 में 1255 करोड़ रुपये था जो वर्ष 2015-16 के मुकाबले 37 प्रतिशत अथिक था। कीटनाशकों की आपूर्ति करने वाली तीन बड़ी कम्पनियों को 2016-17 में 900 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ जो 2015-17 के मुकाबले 23 प्रतिशत ज्यादा था। बीज आपूर्ति करने वाली तीन बड़ी कम्पनियों को 2016-17 में 85 करोड़ का लाभ हुआ। ट्रैक्टर बनाने वाली तीन बड़ी कम्पनियों ने वर्ष 2016-17 में किसानों को ट्रैक्टर बेच कर 5300 करोड़ रुपये कमाये।

    किसान और किसान संगठन लम्बे समय से फसलों की उचित कीमत न्यूनतम समर्थन मूल्य लागू करने व उसे बढ़ाने की मांग करते रहे हैं। साथ ही कर्ज के जाल में फंसे किसानों की कर्ज मांफी की मांग भी उठती रहती है। हर चुनाव में किसानों की कर्ज माफी का वायदा हर पार्टी करती है पर सत्ता में आने के बाद कुछ किसानों के कुछ कर्जों को माफ करने की खानापूरी कर इससे बचती है। जब किसानों की कर्ज माफी की बात होती है तो देश के पूंजीपतियों व बैंकों के बड़े अधिकारियों के कान खड़े हो जाते हैं और वह किसानों की कर्ज माफी पर सरकारों को चेतावनी देते हैं। परन्तु जब बड़े-बड़े पूंजीपतियों व काॅरपोरेट घरानों कों कर्जमाफी व अन्य तरीकों से करोड़ों रुपयों की छूट दी जाती है तो इनके कानों में जूं नहीं रेंगती।

    किसान स्वामीनाथन समिति की सिफारिशों को भी लागू करवाने की मांग कर रहे हैं। जिसमें किसान को कृषि लागत का डेढ़ गुना मूल्य देने, कृषि को रोजगार परक बनाने, सिंचाई, भंडारण आदि सुविधायें उपलब्ध कराने के सुझाव दिये गये हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी ने वायदा किया था कि यदि भाजपा सत्ता में आई तो वह स्वामीनाथन समिति की सिफारिशों को लागू करेगी। परन्तु यह वायदा भी अन्य वायदों की तरह एक जुमला साबित हुआ।

    पिछले कई सालों से किसान अपनी मांगों के लिये शान्तिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे हैं। कभी अपनी फसलों को सड़क पर फेंक कर, तो कभी खेतों में ही फसलों को आग लगा कर नष्ट करके।

    किसान अब इससे आगे बढ़ रहा है। अभी जून महीने में बढ़ती आत्महत्याओं और उपज का उचित दाम न मिलनें के कारण मध्यप्रदेश के कई स्थानों पर किसानों ने उग्र प्रदर्शन किया। इसी के साथ महाराष्ट्र में भी किसानों ने प्रदर्शन किये जिसका अन्य प्रदेशों के किसानों ने भी समर्थन किया। मध्यप्रदेश के किसान आन्दोलन को पुलिस ने दमन कर दबाने की कोशिश की जिसमें 6 किसानों की मौत हो गई। इसके बावजूद आन्दोलन कम होने की जगह और तेज हो गया। तब जाकर मध्यप्रदेश की सोई हुई सरकार जागी और उसने राहत देने के लिये कुछ घोषणायें कीं। यही स्थिति महाराष्ट्र में भी रही। परन्तु ये घोषणायें जमीनी स्तर पर कितनी लागू होती हैं। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि घोषणाओं के बावजूद मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या का सिलसिला अभी तक रुका नहीं है।

    किसानों का यह संघर्ष आगे और अथिक भड़केगा क्योंकि किसानों की आत्महत्या और बदहाली केवल कर्ज माफी से नहीं रूकेगी। उदारीकरण-वैश्वीकरण के दौर में सरकारें लगातार कृषि आगतों में सब्सिडी खत्म करती जा रही हैं जिस कारण खेती की लागत बढ़ती जा रही है। परन्तु उसे उसकी फसल का उचित दाम नहीं मिल रहा। इस कारण किसान फिर कर्ज के जाल में फंसता है और कर्ज-ब्याज का यह चक्र इसी तरह बढ़ता रहेगा। किसानों की बदहाली और आत्महत्यायें बढ़ेंगी। वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था में किसान इस जाल से नहीं निकल पायेंगे। आने वाले समय में किसानों के संघर्ष और अधिक व्यापक और मारक होंगे। 

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