अंक : 16-31 JUL, 2017 (Year 20, Issue 14)

नियमित और ठेका मजदूरों का आंशिक सफलता के बाद आंदोलन समाप्त


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पंतनगर/ अपने लम्बे संघर्ष के बाद नियमित एवं ठेका मजदूरों का आंदोलन 19 सूत्रीय मांग पत्र की कुछ मांगों पर आदेश जारी होने के बाद 30 जून 2017 को वि.वि. प्रशासन से एक समझौते के साथ समाप्त हो गया।

    ठेका मजदूर कल्याण समिति, पंतनगर कर्मचारी संगठन, वि.वि. श्रमिक कल्याण संघ, राष्ट्रीय शोषित परिषद, अखिल भारतीय सफाई मजदूर कांग्रेस द्वारा मोर्चा बनाकर नियमित एवं ठेका मजदूरों की समस्याओं के निराकरण हेतु संघर्ष चल रहा था। पिछले 10-15 सालों से लगातार कार्यरत ठेका मजदूरों को गैर कानूनी ठेका प्रथा समाप्त कर संविदा पर रखने, श्रम नियमों द्वारा देय आवास, चिकित्सा ईएसआई सुविधा देने, चिकित्सा प्रतिपूर्ति 10,000 से बढ़ाकर राज्य सरकार की भांति करने आदि प्रमुख मांगें थी।

    आंदोलन में निर्णायक भूमिका ठेका मजदूरों की रही। धरना-प्रदर्शन हो, अधिकारियों के घरों, कार्यालयों का घेराव हो या स्थानीय विभागों में नारेबाजी, धूप, गर्मी, बरसात में अनशन, पुलिस प्रशासन से मोर्चा लेने में ठेका मजदूर, महिला मजदूर पीछे नहीं हटे। प्रशासन द्वारा मांगों पर हीला-हवाली की गयी। आंदोलन को उग्र करने हड़ताल करने, काम बंद करने को लेकर मोर्चे में स्वर मुखर होते रहे। पर समझौतापरस्त यूनियनों द्वारा आंदोलन उग्र नहीं किया गया। इसका असर मांगों पर पड़ा और ज्यादा हासिल हो सकता था, पर नहीं हुआ। फिर भी मजदूरों के आंदोलन के दम पर दबाव में शासन-प्रशासन को सातवां वेतनमान का आदेश, ठेका मजदूरों का 12 प्रतिशत वेतन बढोत्तरी का आदेश 8 प्रतिशत का इस वित्तीय वर्ष में बढ़ोत्तरी का आश्वासन, शटल पर बैठने, अस्पताल में प्राथमिक चिकित्सा व 11 दिन का सार्वजनिक एवं 20 दिन का सवैतनिक अवकाश का आदेश जारी करना पड़ा। 

    आंदोलन को लेकर ठेका मजदूरों में असंतोष व उग्र हड़ताल करने के स्वर उठते रहे। ठेका मजदूर कल्याण समिति के सुझाव के बावजूद कांग्रेस व भाजपा की पिछलग्गू यूनियनों द्वारा हड़ताल करना तो दूर की बात उत्तराखण्ड सरकार मुर्दाबाद के नारे लगाना भी इनकी शान के खिलाफ था। नारा लगाने पर ये झगड़ने लगते थे। 

    असल में राजनीतिक चुनावबाज पूंजीवादी पार्टियों की पिछलग्गू ट्रेड यूनियन सेन्टरों की वजह से मजदूर आंदोलन कमजोर पड़ा हुआ है। पूरे देश में ठेका प्रथा चरम पर है। सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थानों में ठेकेदारी के तहत निर्मम शोषण किया जा रहा है। स्थाई श्रमिकों की यूनियन संघर्ष की धार खो चुकी है। आज समझौतापरस्त यूनियनों द्वारा संघर्ष उग्र नहीं किया जा रहा है। नेतृत्व पार्टियों, मंत्रियों की दया पर मांगें हासिल करना चाहता है। 

    पंतनगर के मजदूरों का जुझारू संघर्ष का इतिहास रहा है। 1978 में मजदूरों ने अपने नारकीय जीवन व शोषण के खिलाफ संघर्ष में अपने 14 साथियों को बलिदान के बाद स्थाई नियुक्ति एवं श्रम कानूनों का पालन, सुविधाएं देने को बाध्य किया था, पर दुर्भाग्य रहा कि वि.वि. में कई यूनियनों की उपस्थिति के बावजूद 2003 से ठेका प्रथा लागू कर शासन-प्रशासन ने हजारों मजदूरों को पुनः श्रम कानूनों से वंचित कर नारकीय जीवन जीने को मजबूर कर दिया। 

    असल में समझौतापरस्त, अवसरवादी यूनियनों का ठेका मजदूरों से न पहले कोई लेना देना था और न अब है। आज सेवानिवृत्त होकर घर जाते यूनियनों के मेम्बर से कमजोर होती यूनियनों की वजह से नियमित मजदूरों के अधिकारों की रक्षा करना कठिन हो गया है। बिना ठेका मजदूरों को साथ लिए आंदोलन करना मुश्किल हो गया है। पर मोर्चे में ठेका मजदूरों की कल्याण समिति के साथ कभी बराबरी का व्यवहार नहीं किया गया। उसकी साख, आधार कार्यकर्ताओं का इस्तेमाल कर ठेका मजदूरों को आंदोलन में शामिल किया गया। जैसे ही ठेका मजदूर आंदोलन में आते, शामिल होते गये, स्थापित यूनियनें उन्हें अपने प्रभाव में लेती रहीं। अंततः ठेका मजदूरों के नेतृत्वकारी ठेका मजदूर कल्याण समिति को आन्दोलन से बाहर कर दिया गया।     

    ठेका मजदूर अपनी ईएसआई से लेकर स्थायी नियुक्ति सरीखी मांग तभी हासिल कर सकते हैं जब वे पूंजीवादी यूनियनों से नाता तोड़ ठेका मजदूर कल्याण समिति के पीछे लामबंद हों। जुझारू संघर्ष करें व उसका नेतृत्व अपने हाथ में लें। स्थायी मजदूरों के हक भी जुझारू संघर्ष के दम पर ही बच सकते हैं।            पंतनगर संवाददाता

Labels: रिपोर्ट


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