अंक : 16-31 JUL, 2017 (Year 20, Issue 14)

7 मजदूर निलम्बित व मजदूरों का धरना 56वें दिन जारी


रिचा प्रबंधन यूनियन तोड़ने हेतु गुण्डागर्दी पर उतारू


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    काशीपुर/रिचा इंडस्ट्रीज लिमिटेड, रामनगर रोड, काशीपुर (उत्तराखण्ड) में स्थित है जिसमें 210 स्थाई व 50 ठेका मजदूर कार्यरत हैं। सितम्बर 2015 में एक स्वतः स्फूर्त आंदोलन के बाद मजदूरों ने यूनियन बनाने का फैसला किया। लम्बे संघर्ष और इंकलाबी मजदूर केन्द्र के सहयोग से 26 अप्रैल 2016 को यूनियन का रजिस्ट्रेशन हुआ। यूनियन बनने के बाद प्रबंधन से लगातार संघर्षरत रही। 10 जुलाई 2017 को प्रबंधन ने 7 नेतृत्वकारी मजदूरों को निलम्बित कर मजदूरों को संघर्ष उग्र करने के लिए बाध्य कर दिया। 

    कम्पनी प्रबंधन शुरूआत से ही मजदूरों पर हमलावर था। यूनियन गठन के साथ ही प्रबंधन ने नेतृत्व के प्रमुख लोगों को झूठे आरोपों में कम्पनी से बाहर कर दिया। इसके खिलाफ मजदूरों ने लगभग 6 माह तक एस.डी.एम. कार्यालय पर धरना दिया तथा 40 दिन तक हड़ताल की। इसके दबाव में 27 जून 2016 को प्रशासन की मध्यस्थता में एक समझौते के तहत छः मजदूरों को 8 माह के लिए स्थानान्तरित किया गया। समझौते के तहत स्थानान्तरित मजदूरों को 8 माह बाद मुख्य प्लांट काशीपुर में काम पर वापस ले लेना था। प्रबंधन ने षड्यंत्रपूर्वक दो मजदूरों (अध्यक्ष बलदेव व महामंत्री योगेश) को काम से निकाल दिया। अन्य दो मजदूरों से इतनी अमानवीय परिस्थितियों में काम करवाया गया कि वे इस्तीफा देने को मजबूर हुए। इसके अतिरिक्त एक मजदूर राधेश्याम को झूठे आरोप के बाद प्रबंधन ने अभी तक काम पर वापस नहीं लिया। एस.डी.एम., ए.एल.सी. ने राधेश्याम के मामले में कम्पनी प्रबंधन की कार्यवाही को गैर कानूनी मानते हुए, काम पर वापस लेने का लिखित अनुरोध भी किया। यह स्थिति दिखाती है कि आज श्रम कानून मजदूरों के लिए इतने खोखले हो चुके हैं कि पहले तो प्रशासन मजदूरों का पक्ष नहीं लेता है। अगर आंदोलन के दबाव में प्रशासन उनका पक्ष ले तो भी पूंजीपति की ही मनमानी चलती है। शासन-प्रशासन निरीह बना रहता है। 

    इस दौरान 4 अन्य मजदूरों को अन्यान्य कारण बताकर काम से निकाल दिया गया व 40 मजदूरों के खिलाफ आंतरिक जांच बैठा दी गयी। कम्पनी ने रजिस्टर्ड यूनियन को भी मान्यता नहीं दी। कम्पनी प्रबंधन के इस गैरकानूनी व हठधर्मितापूर्ण रवैये के खिलाफ मजदूर 17 मई 2017 से एस.डी.एम. कार्यालय काशीपुर में धरने पर बैठे हैं। साथ ही यूनियन द्वारा इस दौरान उपरोक्त मांगों पर हड़ताल की चेतावनी भी दी जाती रही है। कम्पनी के भीतर मजदूर प्रतिदिन सभा व नारेबाजी करते रहे हैं। कम्पनी के अंदर व बाहर मजदूरों के आंदोलन से कम्पनी प्रबंधन बौखलाया हुआ है। प्रबंधन किसी भी तरह से यूनियन को ध्वस्त करना चाहता है। यूनियन ध्वस्त करने की मंशा इतनी गहरी है कि मालिक ने पिछले डेढ़ साल के दौरान यूनियन ध्वस्त करने में असफल रहे 5 प्रबंधकों को बाहर कर दिया। साथ ही अन्य स्टाफ भी लगभग पूरी तरह से बदला गया है। आज मालिक स्वयं प्रबंधन कर रहा है। 

    यूनियन ध्वस्त करने के अपने तमाम प्रयासों पर असफल होने के बाद प्रबंधन ने क्षेत्र के दबंग एवं आपराधिक पृष्ठभूमि के ब्लाॅक प्रमुख गुरमुख सिंह को कम्पनी में मजदूर सप्लाई का ठेका दिया है। दबंग का प्रबंधन से समझौता है कि हड़ताल की स्थिति में भी वह कम्पनी में उत्पादन जारी रखेगा। मजदूरों व मजदूर नेताओं को धमकाकर उनको एकजुट नहीं होने देगा और देर-सबेर यूनियन को ध्वस्त करा देगा। दबंग ब्लाॅक प्रमुख की गुण्डागर्दी के दम पर प्रबंधन ने 10 जुलाई 2017 को 7 मजदूरों एवं पदाधिकारियों को निलम्बित कर दिया। निलम्बन की यह कार्यवाही 50-60 लठैतों के दम पर की गयी जो निलम्बन के दौरान मालिक और दबंग ब्लाॅक प्रमुख की सुरक्षा के लिए कम्पनी परिसर में मौजूद थे। इसके बावजूद मजदूरों ने उनसे टक्कर ली तथा उत्पादन को प्रभावित किया। इस दौरान पुलिस भी कम्पनी परिसर में मौजूद रही। वह भी मालिक की ही रक्षा में वहां तैनात थी। 

    इस घटना के बाद मजदूरों का आक्रोश और बढ़ गया है। मजदूरों ने कम्पनी में उत्पादन कम कर दिया है। दबंगों की कम्पनी परिसर में उपस्थिति के खिलाफ मजदूर लगातार नारेबाजी, सभा करते हुए उनसे भिड़ रहे हैं। 11 जुलाई को मजदूरों ने सैकड़ों की संख्या में एस.डी.एम. कार्यालय का सांकेतिक घेराव किया, जुलूस निकाला, स्थानीय विधायक के कार्यालय पर सभा की तथा ज्ञापन सौंपा। 11 जुलाई का यह प्रदर्शन दबंग ब्लाॅक प्रमुख और उसके लठैतों के खिलाफ केन्द्रित था। पिछले दिनों कम्पनी ने स्थानीय ग्राम प्रधानों को साथ में कर लिया। इन ग्राम प्रधानों ने भी मजदूरों को धमकाने का काम किया। 12 जुलाई को कम्पनी के दलाल ग्राम प्रधानों के खिलाफ भी प्रदर्शन किया गया। प्रदर्शन में मजदूर साइकिलों-मोटरसाइकिलों पर सवार होकर, जोरदार नारेबाजी करते हुए ग्राम प्रधानों के घर व गांव में गए। ग्राम प्रधानों को चेतावनी दी गयी कि वे कम्पनी की दलाली एवं मजदूरों की रोजी-रोटी छीनना बंद करें, अन्यथा उनके खिलाफ भी आंदोलन किया जाएगा। 

    शासन-प्रशासन का रुख इस दौरान मजदूरों के प्रति उदासीन बना रहा। बार-बार कम्पनी परिसर में मौजूद गुण्ड़ों-लठैतों के बारे में कोतवाल व एस.डी.एम. को सूचित करने के बावजूद कोई कार्यवाही नहीं की गयी। कम्पनी में विवाद की स्थिति उत्पन्न होने व कानून व्यवस्था गड़बड़ाने की आशंका के बावजूद एस.डी.एम. कार्यवाही करने के स्थान पर मजदूरों को कोर्ट में जाने की सलाह देते रहे। एस.डी.एम. का व्यवहार मामले से पल्ला झाड़ने का था। कोतवाल, काशीपुर ने कहा,‘‘कम्पनी निजी क्षेत्र है, वहां मैं कुछ नहीं कर सकता। कानून व्यवस्था भंग होने की स्थिति में ही मैं कुछ कर सकता हूं।’’

    मजदूरों के आंदोलन के व्यापक दबाव में एस.डी.एम. ने लेबर इंसपेक्टर को त्रिपक्षीय वार्ता बुलाने के लिए निर्देशित किया है। मजदूर संघर्ष का मोर्चा संभाले हुए हैं। 

    रिचा इण्डस्ट्रीज के मजदूरों का संघर्ष दिखाता है कि आज श्रम कानून केवल कागजी शोभा की ही चीज रह गये हैं। हालांकि मोदी सरकार इन्हें और भी अधिक भोंथरा कर मजदूरों को हासिल कुछ अधिकार भी छीनने पर उतारू है। प्रशासन का रवैया कानून को भी लागू न करने का है जिससे मजदूरों को प्राप्त अधिकार कहीं लागू नहीं होते हैं। 

    एक बड़ी चुनौती रिचा इण्डस्ट्रीज के मजदूरों के सामने यह है कि यह क्षेत्र की सैकड़ों कम्पनियों में इकलौती यूनियन है। जिससे क्षेत्र की अन्य कम्पनियों के मजदूरों में परस्पर कोई सहयोग नहीं हो पाता है। क्षेत्र की अन्य कम्पनियों के मजदूरों के जागरूक होेने की स्थिति में मजदूर एकजुट होकर अपने अधिकारों को अधिक सुरक्षित रख सकेंगे।       काशीपुर संवाददाता

Labels: रिपोर्ट


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