अंक : 01-15 Sep, 2017 (Year 20, Issue 17)

सबक सबको याद रहेगा


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    जब गोरखपुर मेडिकल कालेज में अगस्त में भारी संख्या में बच्चों की मौत की खबर आयी तो उत्तर प्रदेश के छुटभैय्ये पर बड़बोले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि दोषी लोगों के खिलाफ वह कार्यवाही की जायेगी कि लोग याद रखेंगे। इस सिलसिले में कुछ डाक्टरों को निलंबित किया गया। अंततः कालेज के प्रधानाचार्य समेत कुछ डाक्टरों पर अलग-अलग धाराओं में मुकदमा दर्ज हुआ है। इसमें भ्रष्टाचार, काम में लापरवाही के साथ-साथ गैर इरादतन हत्या की धारा भी है। आरोपी लोगों में कालेज, अस्पताल को आक्सीजन की आपूर्ति करने वाली कंपनी के मालिक भी हैं। हालांकि सरकार यह लगातार कहती रही है कि बच्चों की मौतें आक्सीजन की कमी से नहीं हुई।

    वाकई यह सबक सिखाने वाली कार्यवाही है!

    पर इस कार्यवाही से यह बिलकुल स्पष्ट नहीं हुआ कि इसमें योगी आदित्यनाथ को क्यों छोड़ दिया गया। बताया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद चार महीनों में योगी ने इस कालेज का चार बार दौरा किया था। अब यदि प्रदेश का सर्वाच्च प्रशासनिक अधिकारी कहीं हर महीने दौरा करे तो उसे ही वहां का मुख्य कर्ता-धर्ता माना जायेगा। ऐसे में कालेज के अस्पताल में जो कोई भी लापरवाही या भ्रष्टाचार था उसमें योगी भी शामिल हैं। उन्हें उसमें शामिल किया ही जाना चाहिए। उन्हें आरोपियों में सर्वप्रथम रखा जाना चाहिए। 

    पर ऐसा नहीं होगा। होगा यही कि सबक सिखाने के नाम पर कुछ लोग बलि का बकरा बना दिये जायेंगे। ‘जनता की अंतरात्मा’ शांत हो जायेगी और सब कुछ यथावत चलता रहेगा। 

    पूरे मामले के लिए असल में कौन दोषी है इसका खुलासा उसी समय केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कर दिया था। इस सज्जन ने कुछ समय पहले उत्तराखंड में राष्ट्रीय राजमार्गो के लिए भूमि अधिग्रहण के मामले में हुए भ्रष्टाचार में लिप्त राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के अधिकारियों की सी.बी.आई.जांच का यह कहकर विरोध किया था कि इससे अधिकारियों के मनोबल पर बुरा असर पड़ेगा। इस सज्जन ने गोरखपुर मसले पर यह कहा कि घटना दिखाती है कि सरकारी संस्थान स्वास्थ्य सेवाएं देने में अक्षम हो गये हैं। निहितार्थ यह था कि इन्हें निजी हाथों में सौंप देना चाहिए। 

    गडकरी के इस बयान को सरकार द्वारा घोषित नई स्वास्थ्य नीति ओर नीति आयोग के हालिया प्रस्ताव के साथ मिलाकर देखा जाना चाहिए। नई स्वास्थ्य नीति हर तरीके से स्वास्थ्य में निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन देने की बात करती है। नीति आयोग ने इसी के तहत प्रस्तावित किया है कि जिला अस्पतालों को दिल, गुर्दा और लीवर की बीमारियों के लिए निजी क्षेत्र को सौंप दिया जाये। 

    इन सबका एक ही मकसद है स्वास्थ्य को पूर्णतया मुनाफे के हवाले कर दिया जाये। पूंजीपति वर्ग को इसके द्वारा ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने का अवसर उपलब्ध कराया जाये। लेकिन यह तभी हो सकता है जब स्वास्थ्य में सार्वजनिक क्षेत्र को एकदम चौपट कर दिया जाये। 

    पिछले सालों में सरकारों द्वारा यही किया जाता रहा है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर जिला अस्पताल तक सारे खस्ताहाल हैं। जांच केन्द्र बंद हैं और दवाएं नदारद। बदइंतजामी अपनी सारी सीमाएं पार कर रही हैं। पहले सरकारी मेडिकल कालेजों की हालत बेहतर थी। अब वह भी उसी गति पर है। 

    ऐसे में जान बचाने के लिए लोग निजी अस्पतालों में जाने और लुटने के लिए मजबूर हैं। जो ऐसा नहीं कर सकते हैं वे अपने को या अपने प्रियजनों को मौत के मुंह में जाते देखने के लिए अभिशप्त हैं। 

    रही खास गोरखपुर की बात तो पिछले तीन दशकों में उस क्षेत्र में इंसेफलाइटिस से पचासों हजार बच्चों की मौत हो चुकी है। बस ये बच्चे गरीबों के बच्चे हैं। पिछले तीन दशकों में सरकारों ने इस खास बीमारी की रोकथाम के लिए कुछ नहीं किया। सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति दृष्टिकोण को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि सरकारों को कुछ करना भी नहीं था। हर साल बरसात के मौसम में उस क्षेत्र में इस बीमारी से बच्चों की भारी मौतें होती हैं हर साल इस पर कुछ शोर होता है और फिर सब यथावत चलता रहता है। 

    अपनी ही नीतियों से इन ठंडी मौतों को देश का संघी प्रधानमंत्री प्राकृतिक आपदा घोषित कर देता है और बच निकलता है। प्रदेश का मुख्यमंत्री भी, जो कम प्रखर संघी नहीं है, कुछ लोगों को बलि का बकरा बनाकर बच निकलता है। 

    पर देश की जनता तो इन तरीकों से बीमारियों से बचकर नहीं निकल सकती। उसे तो अपने स्वास्थ्य के लिए संघर्ष करना ही होगा। 

Labels: राष्ट्रीय


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