अंक : 01-15 Sep, 2017 (Year 20, Issue 17)

महज कानूनी फैसलों से कुप्रथाओं का खात्मा असम्भव


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    तीन तलाक पर उच्चतम न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने बहुमत-अल्पमत (3-2) के आधार पर अपना फैसला सुना दिया। इस फैसले ने तीन तलाक को संविधान के आधार पर गलत ठहराया और केन्द्र सरकार को छः महीने के भीतर एक कानून बनाने की जरूरत बतायी।

    फैसले का स्वागत उत्पीड़ित उच्चवर्गीय, शिक्षित मुस्लिम महिलाओं के बाद यदि किसी ने सबसे ज्यादा किया तो वह हमारे देश के डरे हुये, कायर व धूर्त राजनैतिक नेताओं ने किया। उच्चतम न्यायालय के फैसले ने संसद में बैठकर कानून बनाने वालों को एक शानदार आड़ दे दी। शानदार आड़ इसलिये कि इनमें से किसी के पास इतना नैतिक साहस व पहलकदमी नहीं थी कि संसद में कानून के जरिये तीन तलाक को प्रतिबंधित कर सकें। भाजपा के लिये तीन तलाक का मुद्दा एक ऐसा हथियार था जिसके दम पर ये घृणित साम्प्रदायिक धुव्रीकरण कर रहे थे तो शेष के लिये यह मुस्लिम मतदाताओं को बिदका नहीं देने के लिये चुप्पी व निष्क्रियता का मुद्दा था। उच्चतम न्यायालय के फैसले ने हमारे देश के धूर्त व शातिर राजनैतिक नेताओं को ‘महा उलझन’ से हमेशा के लिये बाहर निकाल दिया।

    तीन तलाक की प्रथा महिलाओं की इज्जत, जीवन और भविष्य से खिलवाड़ था। यह मर्दों के हाथों में धर्म गुरूओं द्वारा दिया गया विध्वंसक हथियार था। महिलायें तीन तलाक की प्रथा का खात्मा चाहती थीं और पुरुष व उलेमा इस विशेषाधिकार को किसी भी कीमत पर बनाये रखना चाहते हैं। आरिफ मोहम्मद खान जैसे चंद मानवतावादी सुधारवादी मुस्लिम पुरुष ही थे जो इस कुप्रथा के खिलाफ वर्षों से कानूनी संघर्ष कर रहे थे। आरिफ मोहम्मद खान वही राजनीतिज्ञ हैं जिन्होंने शाहबानो प्रकरण में राजीव गांधी मंत्रीमण्डल से इस्तीफा दिया था। यानी तीन तलाक की प्रथा खात्मे के लिये उन्होंने लम्बा कानूनी संघर्ष किया।

    यहीं से इस प्रथा के सामाजिक तौर पर खत्म होने की सीमा शुरू होती है। तीन तलाक की प्रथा ऊपर से, कानूनी तौर व औपचारिक तौर पर भले ही खत्म कर दी गयी हो परन्तु इसका गहरा सामाजिक व धार्मिक आधार बना हुआ है। इसकी एक बानगी उच्चतम न्यायालय के फैसले के एक दिन बाद ही मेरठ में दिये गये तीन तलाक के मामले से मिल गयी।

    कुप्रथाओं का अंत यदि महज कानून, नियम बना देने से होता तो हमारे देश में बहुत सारी कुप्रथायें आसानी से खत्म हो गयी होतीं। बाल विवाह, विधवा विवाह, दहेज प्रथा, भ्रूणहत्या छुआछूत जैसी सैकड़ों प्रथायें कानूनी तौर पर बहुत पहले समाप्त कर दी गयी परन्तु वे यदि बनी हुयीं हैं तो इसलिये कि उनका खात्मा जुझारू सामाजिक आंदोलन के जरिये ही हो सकता है। एक झटके में ऐसी महिला, दलित व जन विरोधी कुप्रथाओं का खात्मा तो सिर्फ व सिर्फ सामाजिक क्रान्ति ही कर सकती है। क्योंकि हमारे देश में कोई जनवादी सामाजिक क्रान्ति नहीं हुयी इसलिये ये प्रथायें अपने हजारों घृणित रूपों में मौजूद हैं। तब भी मौजूद हैं जबकि कानूनी तौर पर वे अपराध की श्रेणी में आती हैं।

    तीन तलाक की प्रथा खात्मा महज कानूनी फैसले के जरिये नहींं हो सकता है। यह सही है कि उच्चतम न्यायालय का यह फैसला कम से कम उच्च साधन सम्पन्न, धनी व मध्यम वर्गीय मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक के दंश से मुक्त करने में सहायक होगा परन्तु करोड़ो गरीब मुस्लिम महिलाओं की समस्या में यह फैसला कुछ खास मदद नहीं कर सकता है। उनके लिये कानून के दरवाजे बिना मोटी रकम खर्च किये खुल ही नहीं सकते हैं। तलाक के आंतक में जीती गरीब, आर्थिक रूप से परनिर्भर व धार्मिक कूपमंडूकता की शिकार महिला की सहायता तो तभी हो सकती है जब कोई जुझारू सामाजिक आंदोलन स्त्री-पुरुष दोनों की ही मानसिकता को मुकम्मल ढंग से ही बदल दे।

    वैसे भी कानूनी ढंग, सामाजिक मानसिकता को बदलने में उससे भी कम कारगर होते है जितने सामाजिक सुधार के आंदोलन कर पाते हैं। इसलिये यह उम्मीद पालना कि इससे तीन तलाक की कुप्रथा समाप्त हो जायेगी मूर्खों के स्वर्ग में रहना होगा। ‘दूसरी’ या ‘तीसरी आजादी’ जैसी बातें फालतू की हैं।

    उपरोक्त बातों के अलावा फिर भी इस कानूनी फैसले का एक बड़ा महत्व इस बात में है कि इसने तीन तलाक की कुप्रथा के कानूनी धार्मिक व दार्शनिक आधार पर चोट की है। उसको कमजोर किया। सबसे बढ़कर कानूनी आधार को खत्म कर दिया। 

    जहां तक भाजपा-संघ व सरकार में बैठे नेताओं की बात है उन्हें मुस्लिम समाज को टारगेट करने के बजाये अपने गिरेबां में झांकना चाहिये। कन्या भ्रूण हत्या, दहेज प्रथा, बाल विवाह, विधवा जीवन, जात-पात, छुआ-छूत जैसी हजारों कुप्रथायें हिन्दू समाज में मौजूद हैं उन पर उन्हें कार्य करना चाहिये। इन प्रथाओं का तो कानूनी आधार दशकों पहले ही समाप्त कर दिया गया था। पर संघी-भाजपाइयों से ऐसे सामाजिक आन्दोलन की बात सोचना ही हास्पास्पद है। उनसे अपने गिरेबां में झांकने की बात करना ही बेकार है। वैसे भी वह अगर झांकेंगे तो वहां क्या मिलेगा। एक काली प्रतिक्रियावादी साम्प्रदायिक फासीवादी आत्मा ही मिलेगी। तीन तलाक पर इनकी मुस्लिम महिलाओं से सहानुभूति नकली, झूठी व प्रपंची ही थी। तीन तलाक पर इनका अदालत के फैसले पर स्वागत भी वैसा ही है।

    उच्चतम न्यायालय का यह फैसला ऐसे वक्त में आया जब 6 माह से संघी फासीवादी इस मुद्दे को उछाले हुए थे। वे साबित करने में जुटे थे कि मुस्लिम धर्म में तीन तलाक के चलते महिलाओं की स्थिति बहुत बुरी है और इसलिए तीन तलाक की प्रथा खत्म होनी चाहिए। मुस्लिम महिलाओं के शुभचिंतक बने ये फासीवादी कभी भूल कर भी हिन्दू धर्म में महिलाओं की स्थिति की चर्चा नहीं करते। जब कोई हिन्दू धर्म में भी महिलाओं की बदतर स्थिति के तथ्य को सामने लाता है तो वे बिल्कुल मुस्लिम धर्म के मुल्लाओं की तरह रुख अपनाकर खड़े होने लगते हैं और हिन्दू धर्म पर हमले की बातें छेड़ने लगते हैं। मुनस्मृति व पितृसत्ता के ये पुजारी घोर स्त्री विरोधी हैं। तीन तलाक का इनके द्वारा मुद्दा बनाया जाना महिलाओं की दशा सुधारने के लिए नहीं बल्कि मुस्लिम धर्म को बुरा साबित करने के लिए था। यशोदाबेन को भरी जवानी में छोड़ने वाला शख्स अगर तीन तलाक का विरोध करने लगे तो समझा जा सकता है कि वह महिलाओं का कितना शुभचिंतक होगा। 

    वास्तविकता यही है कि मुस्लिम धर्म को निशाने पर लेने के चलते यह मुद्दा फौरी तौर पर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण बढ़ाने का जरिया बन गया है। अदालत ने संघी फासीवादियों की तीन तलाक के खात्मे की मांग पर मुहर लगा इस साम्प्रदायिक विभाजन को और बढ़ाने में मदद ही की है। आगे इस पर जो हंगामा खड़ा होगा उससे तात्कालिक तौर पर साम्प्रदायिक गोलबंदी बढ़ेगी ही। यह निर्णय दिखलाता है कि कैसे एक कुप्रथा के खिलाफ अदालती निर्णय साम्प्रदायिक ताकतों के हितों की पूर्ति का साधन बन जाता है। इस बीच कुप्रथा की शिकार आबादी कराहती रहती है। 

    तीन तलाक की कुप्रथा का खात्मा भारतीय समाज में फैली तमाम स्त्री विरोधी कुप्रथाओं के खिलाफ व्यापक जुझारू सामाजिक क्रान्ति की मांग करता है। हिन्दू-मुस्लिम कट्टरपंथी जिनमें घोर स्त्री विरोधी संघी फासीवादी भी शामिल हैं इसके निशाने पर होंगे। सभी धर्मों के मेहनतकश स्त्री-पुरुष मिलकर इसको अंजाम देंगे। और आज का भारत ऐसी क्रान्ति भारत के मजदूर वर्ग के नेतृत्व में ही कर सकता है।

Labels: राष्ट्रीय


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