अंक : 01-15 Sep, 2017 (Year 20, Issue 17)

बाड़ाबंद कालोनियों के ‘आम आदमी’


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    आज से छः साल पहले सुदूर अतीत में, जब नरेन्द्र मोदी जैसे शहंशाह का दिल्ली में उदय नहीं हुआ था, तब आज के दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने राजनीति में न आने की कसम खाते हुए अन्ना हजारे जैसे जमूरे को पकड़कर दिल्ली में एक भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन खड़ा किया था। इस आंदोलन में ज्यादातर वे लोग शामिल थे जो स्वयं को अराजनीतिक कहते थे। उनकी अपनी नजर में वे ‘आम आदमी’ थे। उनका अराजनीतिक मिशन था सरकार को जाहिल गरीब लोगों के चंगुल से छीनकर अपने जैसे ‘आम आदमी’ की सेवा में लगाना। 

    इन ‘आम आदमियों’ का एक हिस्सा आजकल बड़े शहरों की बाड़ाबंद कालोनियों में रहता है। यह ‘आम आदमी’ का ऊपरी हिस्सा है। इसे प्रचलित भाषा में उच्च मध्यम वर्ग भी कहा जाता है। इन बाड़ाबंद कालोनियों में बाहरी, खासकर गरीब लोगों का प्रवेश वर्जित है। वे वहां केवल घरेलू नौकरों की तरह ही प्रवेश पा सकते हैं।

    बाड़ाबंद कालोनियों के इन ‘आम आदमियों’ की क्या खास हैसियत हो गयी है वह जुलाई में ग्रेटर नोएडा की घटना ने दिखाया। इस घटना में एक ‘आम आदमी’ द्वारा अपने घर में काम करने वाली महिला को चोरी का आरोप लगाकर मारा-पीटा गया और कैद कर रखा गया। जब इस महिला की बस्ती के लोगों को पता चला तो वे बाड़ाबंद कालोनी के सामने इकट्ठा हो गये और महिला को न पाकर गुस्से से बेकाबू हो गये। कुछ ने मकानों पर पथराव भी कर दिया। 

    असल किस्सा इसके बाद शुरू हुआ। बाड़ाबंद कालोनी के ‘आम आदमियों’ ने अपने यहां काम करने वाली महिलाओं को बांग्लादेशी मुसलमान घोषित कर दिया और उनके खिलाफ साम्प्रदायिक अभियान छेड़ दिया। हकीकत ये थी कि ये महिलाएं पश्चिम बंगाल की थीं। एक कालोनी की पहल पर नोएडा, ग्रेटर नोएडा की सारी बाड़ाबंद कालोनियों में घरेलू काम करने वाली बंगाली मुसलमान महिलाओं का बहिष्कार कर दिया। पुलिस ने उपरोक्त कालोनी के पास की झुग्गी बस्ती को उजाड़ कर वहां बुलडोजर चलवा दिया। तोड़-फोड़ और आगजनी व हत्या के प्रयास में तेरह मजदूरों को जेल भेज दिया। पीड़ित मजदूर महिला की शिकायत को पुलिस ने हफ्ते भर बाद खारिज कर दिया। बाड़ाबंद कालोनियों के समर्थन में आने वाले केन्द्रीय सांस्कृतिक मंत्री महेश शर्मा ने कहा है कि जेल भेजे गये मजदूर दसियों साल तक जमानत नहीं पा सकेंगे यह वे स्वयं सुनिश्चित करेंगे। अदालती हस्तक्षेप के बिना वहां न्याय हो चुका है। 

    जैसा कि पहले कहा गया है। केजरीवाल के आंदोलन में बाड़ाबंद कालोनियों का यह ‘आम आदमी’ सबसे आगे था। मोदी के समर्थन में भी यही सबसे आगे है। इस ‘आम आदमी’ की नजर में गरीब और मजदूर न केवल आलसी व निकम्मे होते हैं बल्कि वे चोर भी होते हैं। स्वयं कर चोरी से लेकर हर तरह की धांधली व भ्रष्टाचार में लिप्त रहने वाला ‘आम आदमी’ गरीब लोगों को पैदायशी अपराधी व चोर मानता है। उसकी बाड़ाबंद कालोनियों की सुरक्षा व्यवस्था इन्हीं लोगों से रक्षा के लिए है। 

    इस ‘आम आदमी’ की मजबूरी यह है कि उसे इन निकम्मे, आलसी, जाहिल व चोर लोगों से टकराना पड़ता है। घर से लेकर दफ्तर और फैक्टरी सभी जगह इन्हीं से मजदूर के तौर पर काम लेना पड़ता है। पर इन्हें वह न तो अपनी तरह का ‘आम आदमी’ मानता है और न ही सोचता है कि इनके साथ बराबरी व सम्मान का व्यवहार किया जाना चाहिए। इन लोगों के घरों में काम करने वाले लोग न तो इनके साथ बैठ सकते हैं न तो अन्य किसी मानवोचित व्यवहार की उम्मीद कर सकते हैं। अक्सर तो इन्हें घर का शौचालय इस्तेमाल करने की भी इजाजत नहीं होती।

    भारतीय समाज की आम गति के अनुरूप यह बाड़ाबंद ‘आम आदमी’ बेहद रूढ़िवादी, कूपमंडूक और साम्प्रदायिक है। राजनीतिक तौर पर यह इतना बेवकूफ है कि केजरीवाल जैसे ठग इसे आसानी से बेवकूफ बना देते हैं। लेकिन यह साथ ही इतना साम्प्रदायिक है कि अमित शाह और नरेन्द्र मोदी की जय-जयकार कर सकता है। अरनब गोस्वामी जैसे चीखने-चिल्लाने वाले टी.वी. के भाड़ इसकी अंतरात्मा की आवाज हैं। यदि इसे मौका मिले तो यह ‘नायक’ फिल्म की तरह देश को एक दिन में ठीक कर देगा। 

    उदारीकरण के पूरे दौर में पूंजीपति वर्ग ने इस बाड़ाबंद ‘आम आदमी’ को खूब प्रोत्साहित किया है। यह उसका प्रबंधक, एजेण्ट, वकील, डाक्टर, लेखाधिकारी इत्यादि है। पूंजीपति वर्ग के साथ नत्थी और उसकी सेवा में लगा हुआ ‘आम आदमी’ मजदूर वर्ग से नफरत करता है। यह नफरत ग्रेटर नोएडा जैसी घटनाओं में अभिव्यक्त होती है। 

    इस ‘आम आदमी’ को मजदूरों से बेहतर व्यवहार करने के लिए नहीं फुसलाया जा सकता। इसे केवल संघर्ष से ही झुकाया जा सकता है। घरेलू काम करने वाले मजदूरों का संगठित संघर्ष ही ग्रेटर नोएडा जैसी घटनाओं को रोक सकता है।   

Labels: राष्ट्रीय


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