अंक : 01-15 Sep, 2017 (Year 20, Issue 17)

यूरोप में बढ़ते आतंकी हमले


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    यूरोप के देशों में मुस्लिम समुदाय के क्षुब्ध व आक्रोशित लोगों द्वारा आतंकी घटनाओं में लगातार वृद्धि हो रही है। एकदम ताजा घटना स्पेन के बर्सिलोना में हुए आतंकी हमले की है जिसमें कई लोग मारे गये हैं। 

    इन आतंकी हमलों के जवाब में सरकारें अपने सुरक्षा तंत्र को और मजबूत कर रही हैं। अप्रवासी के आने पर कई तरह के प्रतिबंध लगा रही है। इन देशों में मीडिया और दक्षिणपंथी पार्टियों द्वारा मुस्लिम समुदाय के खिलाफ अनर्गल प्रचार चलाया जा रहा है। नव फासीवादी, नस्लीय व कट्टरपंथी ईसाई संगठन मुस्लिमों पर हमले तक आयोजित कर रहे हैं। 

    यूरोप के वे देश भी इन आतंकी घटनाओं और मुस्लिमों के खिलाफ कुत्साप्रचार की जद में आते जा रहे हैं जिनके बारे में अक्सर माना जाता है कि ये समाज उदार, खुले, बहुलतावादी और धर्मनिरपेक्ष हैं। फ्रांस, ब्रिटेन, नीदरलैण्ड, बेल्जियम, स्पेन आदि देश इस श्रेणी में आते हैं। 

    हाल के वर्षो में आतंकी हमले किसी घातक या खतरनाक हथियार के स्थान पर ऐसी चीजों से बढ़े हैं जिन पर नियंत्रण या बचाव किसी भी सरकार के सुरक्षातंत्र के लिए आसान नहीं है। ट्रक, लारी, कार आदि को भीड़ भरे इलाकों में दौड़ा दिया जाता है और इसमें कई निर्दोष लोग मारे या घायल हो जाते हैं। 

    इन आतंकी घटनाओं को यूरोप के शासक बाहरी या घुसपैठियों द्वारा की गयी कार्यवाही कहकर खारिज नहीं कर पाते हैं। अक्सर ही पाया जाता है कि इन घटनाओं में इन्हीं देशों में बसे नागरिक जिम्मेदार होते हैं। कई तो कभी किसी इस्लामिक देश में गये तक नहीं होते हैं। 

    यूरोप में घट रही आतंकी हमलों की घटनाओं में स्थानीय अल्पसंख्यक आबादी का शामिल होना यह बतलाता है कि इन समाजों में उनके साथ भेदभाव, घृणा और उपेक्षा का व्यवहार होता है। इन घटनाओं में पिछले ढाई दशकों में तीव्र वृद्धि हुई है। खासकर पिछले आठ-दस वर्षो में हर महीने ही इस तरह की घटनाएं हुई हैं। 

    इन आतंकी हमलों की बुनियाद पिछली सदी के अंतिम दशक में तब रखी गयी जब अमेरिका सहित पश्चिमी साम्राज्यवादियों ने सभ्यताओं का संघर्ष कहकर मुस्लिम बहुल देशों के खिलाफ मोर्चा खोला था। इराक, अफगानिस्तान, लीबिया, सीरिया, सोमालिया सहित कई देश पश्चिमी साम्राज्यवादी देशों के निशाने पर आ गये। इन देशों पर कब्जे व हमले के झूठे बहाने बनाये गये और कई ऐसे देश थे जिन पर पश्चिमी साम्राज्यवादी देशों के पिट्ठू देशों ने कब्जे व युद्ध की कार्यवाहियां की। जैसे इजरायल ने फिलस्तीन, लेबनान व सीरिया के ऊपर युद्ध थोपा। सऊदी अरब ने यमन को एकदम बर्बाद कर दिया। 

    यह सभ्यताओं का संघर्ष इन देशों के शासक वर्ग ने अपने-अपने देश के भीतर भी भिन्न-भिन्न ढंग से छेड़ दिया। यह संघर्ष कहीं चुनावी एजेंडे के रूप में, कहीं सुरक्षातंत्र को मजबूत करने तो कहीं बढ़ते अप्रवासियों पर लगाम लगाने के रूप में सामने आया। इसका परिणाम यह निकला कि इस्लाम को मानने वाली आबादी हाशिये पर आ गयी। उस पर तीखा हमला किया जाने लगा। इनके आस्था, विश्वास, रहन-सहन के तौर-तरीकों से लेकर धार्मिक स्थलों पर भी निशाना साधा जाने लगा। जैसे भारत में मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक की विभीषिका से उबारने का ठेका हिन्दू फासीवादी भाजपा और संघ ने लिया है। वैसा ही यूरोप में मुस्लिम महिलाओं को बुर्के से आजादी दिलाने का ठेका कट्टर दक्षिणपंथी श्वेत संगठनों व नवफासीवादी समूहों ने लिया हुआ है। मुस्लिम समुदाय को निशाने पर लेने व किनारे लगाने के लिए ये बेहद सस्ते तरीके बन गये हैं।  सरकारां से लेकर न्यायालय तक; उन सब मूल्यों की धज्जियां होते या तो देखते रहे या उसमें शामिल हो गये जिनकी यूरोप द्वारा विभिन्न मंचों पर बहुत जोर-शोर से वकालत की जाती है। ऐसा ही एक शोर मानवाधिकार का रहा है। 

    बहुसंख्यक आबादी और संस्थाओं के व्यवहार और उत्पीड़न का एक परिणाम यह निकला कि उत्पीड़ित मुस्लिम समुदाय के बीच क्षोभ, अलगाव, आक्रोश की भावनाएं गहराने लगी। कई आतंकी घटनाओं के सूत्रधार स्वयं इन समाजों ने तैयार किये। 

    इसके अलावा ऐसी भी घटनाएं खासकर फ्रांस में देखने में आयी कि वहां अफ्रीका-एशिया से आये अप्रवासियों व वहां बस गये कामगारों के साथ दुर्व्यवहार होता था। गहराते अर्धिक संकट ने उन्हें गरीबी, बेरोजगारी, असमानता के नये गड्ढों की ओर धकेल दिया इन समुदायों की आबादी बेहद बुरी परिस्थितियों में झोपड़-पट्टी जैसी स्थिति में रह रही थी। इस आबादी ने फ्रांस में पिछले एक दशक में कई ऐसी घटनाओं को तब अंजाम दिया जब पुलिस ने उन्हें जबरन निशाना बनाया। लूटपाट की घटनाओं के लिये व्यापक आबादी को निशाने पर लिया। 

    इसी तरह जिन देशों को पश्चिमी साम्राज्यवादियां ने तबाह-बर्बाद कर दिया वहां के अप्रवासियों के साथ जब यूरोप में दुर्व्यवहार हुआ और उनके साथ कई बार पशुवत व्यवहार हुआ तो वहां से भी ऐसे व्यक्ति तैयार हुये जो कुछ भी कर गुजरने को तैयार हो गये।

    इस्लामिक स्टेट के मजबूत होने पर क्षुब्ध, कुंठित आबादी को एक मकसद व ग्लैमर मिल गया। इससे भी ऐसे व्यक्ति तैयार हुये जिन्होंने फ्रांस, ब्रिटेन, स्पेन आदि में आंतकी घटनाओं को जन्म दिया।

    कुल मिलाकर देखा जाये तो यूरोप के देशों ने ही; खासकर बड़ी पश्चिमी साम्राज्यवादी ताकतों ने ही वह जमीन तैयार की जिससे आंतकी घटनाओं का सिलसिला यूरोप में शुरू हुआ। जैसी करनी वैसी भरनी। 

    अब सच्चाई यह है कि यूरोप एक दुष्चक्र में फंस गया है। उससे बाहर उसे वहां का प्रतिक्रियावादी शासक वर्ग नहीं निकाल सकता है। सिर्फ क्रांतिकारी विचारों पर संगठित मजदूर वर्ग ही यूरोप में आंतकवाद की समस्या को हल कर सकता है। जाहिर है ऐसा करने के लिये उसे पहले अपने शासक साम्राज्यवादी पूंजीपति वर्ग से दो-दो हाथ करने होंगे। उसे धूल चटानी होगी।

Labels: अन्तराष्ट्रीय


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