अंक : 01-15 Sep, 2017 (Year 20, Issue 17)

रोहिंग्या मुस्लिमों की दुर्दशा


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    हर देश में अल्पसंख्यक आबादी का जीवन दिनों-दिन संकट में पड़ता जा रहा है। किसी देश में यह आबादी धार्मिक रूप से तो किसी देश में नस्लीय रूप से अल्पसंख्यक होती है। यही स्थिति म्यांमार के रोहिंग्या मुस्लिमों की है। 

     रोहिंग्या मुस्लिम आबादी एक तरह से राष्ट्रविहीन आबादी बन गयी है। म्यांमार उन्हें बांग्लादेशी और बांग्लादेश उन्हें म्यांमार का मानता है दोनों ही देशों में वे बेहद बुरी परिस्थितियों में रहने के लिए मजबूर हैं। म्यांमार में जहां बौद्ध बहुसंख्यक आबादी और सरकार उन्हें अपने देश से खदेड़ना चाहती है। वहां बांग्लादेश में शरण लिए रोहिंग्या वहां अवांछित है। नारकीय परिस्थितियों में रहने वाली आबादी सभी तरह के मानवीय व नागरिक अधिकारों से वंचित है। म्यांमार में जहां 11 लाख रोहिंग्या रहते हैं वहां बांग्लादेश में शरणार्थी के रूप में 4 लाख रोहिंग्या रह रहे हैं। कुछेक हजार लोग भारत में भी रह रहे हैं। 

    पिछले वर्ष अक्टूबर माह की तरह इस वर्ष अगस्त माह में भी रोहिंग्या मुस्लिमों व बहुसंख्यक बौद्ध आबादी के बीच तनाव व दंगे की स्थिति बन गयी। बौद्ध उग्र व दक्षिणपंथी समूहों के जवाब में रोहिंग्या हथियार बंद समूहों की झड़पों के बाद म्यांमार की सरकार ने सेना को उतारकर रोहिंग्या मुस्लिमों का कत्लेआम शुरू किया हुआ है। म्यांमार के उत्तरी प्रांत रखहाइन में सेना के साथ झड़पों में करीब सौ लोग मारे गये। मारे गये लोगों में 80 से अधिक रोहिंग्या विद्रोही और 12 सुरक्षा सैनिक है। 

    नोबेल का शांति पुरूस्कार पाने वाली म्यांमार की अप्रत्यक्ष राष्ट्र प्रमुख आंग सांग सू की इस पूरे मुद्दे पर चुप लगाकर बैठी हैं। इस बड़बोली राजनीतिज्ञ को रोहिंग्या मुसलमानों के ऊपर बहुसंख्यक बौद्ध आबादी और राजसत्ता के द्वारा किया जा रहा दमन-उत्पीड़न नजर नहीं आता है। इस महत्वाकांक्षी राजनीतिज्ञ ने सत्ता पर पकड़ बनाये रखने के लिए अपने ड्राइवर को ही राष्ट्रपति बना दिया। ऐसा उन्होंने इसलिए किया कि वह स्वयं संविधान के अनुसार राष्ट्रपति नहीं बन सकती थी। 

    रोहिंग्या मुसलमानों के बीच ऐसे हथियारबंद समूह तब जन्म लेने लगे जब उनका दमन-उत्पीड़न चरम पर पहुंचने लगा। अपने ऊपर बढ़ते हमलों के जवाब में जब इन समूहों ने हमलों को अंजाम देना शुरू किया तो हिंसा-प्रतिहिंसा का एक सिलसिला चल पड़ा। इस सबमें पिछले एक वर्ष में खासी वृद्धि हुई है। इस माह हुई झड़पें इसी कड़ी में हैं। 

    अगस्त माह में हुई झड़पों में रखहाइन प्रांत की एक व्यापक आबादी चपेट में आ गयी। परस्पर हमलों के कारण जहां रोहिंग्या मुसलमानों को कठिन परिस्थितियों में नदियों को पार कर बांग्लादेश भागना पड़ा है। वहां कई हजार गैर मुस्लिम आबादी को म्यांमार की सेना ने सुरक्षा कारणों से उनके गांव से हटा लिया है। इस तरह म्यांमार के शासक म्यांमार को सांप्रदायिक तनाव में धकेलकर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। 

    बांग्लादेश या भारत के शासकों की रोहिंग्या मुसलमानों से कोई हमदर्दी नहीं है। सिर्फ कुछ पश्चिमी साम्राज्यवादी देश समय-समय पर उनका मुद्दा मानवाधिकार के नाम पर उठाते रहते हैं। उसमें भी उनका असली मकसद म्यांमार के समृद्ध वन, तेल व खनिज सम्पदा को हड़पने के लिए नई छूटों की मांग होती है। म्यांमार के रोहिंग्या मुस्लिमों का दमन पश्चिमी साम्राज्यवादियों के लिए म्यांमार के शासकों से सौदेबाजी का जरिया बन जाता है। 

    रोंहिग्या मुस्लिमों के दमन के जरिये म्यांमार के शासक म्यांमार की मजदूर-मेहनतकश, किसान आबादी को धार्मिक कूपमंडूकता के दल-दल में धकेल रहे हैं। उग्र धार्मिक भावनाएं व घृणित सांप्रदायिक प्रचार के जरिये वह उनके रोजी-रोटी, गरीबी, कुपोषण, बेरोजगारी जैसे मुद्दों से ध्यान भटकाने में कामयाब हो रहे हैं। 

Labels: अन्तराष्ट्रीय


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