अंक : 01-15 Sep, 2017 (Year 20, Issue 17)

निजता का अधिकार : राज्य का कसता शिंकजा


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    24 अगस्त को देश के सर्वोच्च न्यायालय की नौ सदस्यीय पीठ ने निजता का अधिकार को संविधान की धारा 21, खण्ड-3 के तहत मौलिक अधिकार घोषित कर दिया। अभी दो दिन पहले तत्कालीन तलाक के मामले में फैसले की तरह ही सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले ने तारीफ बटोरी। फर्क बस इतना था कि संघी सरकार और भाजपा इस तारीफ में अबकी बार शामिल नहीं थे। संघी सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में निजता का अधिकार मौलिक अधिकार का दर्जा दिये जाने का हर तरह से विरोध किया था। 

    हालांकि निजता के अधिकार पर नौ सदस्यीय पीठ का फैसला सर्वसम्मत था पर जजों के तर्क अलग-अलग थे। एक जज ने इसे प्राकृतिक अधिकार घोषित किया तो दूसरे ने कहा कि नागरिक राज्य की पैदावार नहीं है जिस पर राज्य पूरा नियंत्रण रखें। इसके मुकाबले संघी सरकार ने कहा था कि नागरिक का अपने शरीर पर भी निरपेक्ष अधिकार नहीं है यानी राज्य भी इस शरीर का मालिक है। 

    नौ सदस्यीय संवैधानिक पीठ ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार तो घोषित किया पर साथ ही यह भी कहा कि यह अधिकार निरपेक्ष नहीं है। अन्य मौलिक अधिकारों पर भांति-भांति के प्रतिबंधों की तरह इस अधिकार का उपभोग भी इन प्रतिबंधों के तहत ही किया जा सकता है।

    यह याद रखना होगा कि निजता के अधिकार का मसला सर्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्यीय पीठ के सामने प्रस्तुत आधार मामले की सुनवाई के दौरान उठा था। चूंकि इसके पहले; दो बार पचास व साठ के दशक में सर्वोच्च न्यायालय निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा देने से इंकार कर चुका था इसलिए इस बार उससे भी बड़ी संवैधानिक पीठ का गठन किया गया था। पांच सदस्यीय पीठ आधार मामले के साथ ह्वाट्स अप, फेसबुक इत्यादि के संबंध में सुनवाई कर रही है जहां निजता का उल्लंघन हो रहा है। 

    जैसा कि पहले कहा गया है सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले की वाहवाही हो रही है। वाहवाही करने वालों में या तो वे लोग है जो आश्वस्त हैं कि वे इस मौलिक अधिकार का उपयोग कर सकेंगे अथवा वे लोग हैं जो इनके वैचारिक प्रभाव में हैं। इसे समझने के लिए पहले से मौजूद मौलिक अधिकारों की स्थिति को समझना फायदेमंद होगा। 

    अभिव्यक्ति का अधिकार भारत के संविधान में मौलिक अधिकार है पर इस अधिकार की क्या स्थिति है। यह अधिकार पूर्णतया पुलिस के डंडे के मातहत है। मजदूर-मेहनतकश के लिए थानेदार इस अधिकार की सीमा तय कर देता है। थोड़ा ऊंचे स्तर पर अदालतें इसे कर देती हैं बाबा रामदेव पर लिखी एक किताब पर बिना लेखक-प्रकाशक का पक्ष सुने अदालत उसके प्रकाशन पर प्रतिबंध लगा देती है। तब फिर इस अधिकार का इस्तेमाल कौन करता है? शासक वर्गीय लोग। पूंजीपति वर्ग और सत्ताधारी। आज संघी गुंडों को अभिव्यक्ति की पूरी छूट है। वे खुलेआम गाली-गलौज कर रहे हैं, हत्या व बलात्कार की धमकी दे रहे हैं। इसके मुकाबले मोदी-योगी की आलोचना करने वालों पर मुकदमे दर्ज हो जा रहे हैं।

    यह भी मौलिक अधिकार है कि बिना वारंट के किसी को भी गिरफ्तार नहीं किया जा सकता और गिरफ्तार करने के चौबीस घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना पड़ेगा। कुछ साल पहले सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर इसे दूरदर्शन पर खूब प्रसारित किया गया था। पर वास्तविकता क्या है? मजदूर-मेहनतकशों के लिए यहां भी सब कुछ थानेदार पर निर्भर है। यदि थानेदार के सामने मजदूर इन अधिकारों की चर्चा करेगा  तो वह लात-घूसें ही खायेगा। हां, पूंजीपति वर्ग और सत्ताधारी लोग इन अधिकारों का इस्तेमाल करते हैं। वैसे यह कहना होगा कि औपचारिक-कानूनी तौर पर भी विभिन्न कठोर कानूनों के तहत इस अधिकार को बहुत सीमित कर दिया गया है।

    अंतःकरण की स्वतंत्रता भी संवैधानिक मौलिक अधिकार है। विभिन्न धर्मो में विश्वास इसी के तहत आता है। इस अधिकार की व्यवहार में क्या स्थिति है। इसे हादिया मामले से समझा जा सकता है। हादिया उर्फ अखिला ने अपनी एक मुसलमान सहेली के संपर्क से इस्लाम को जाना और धर्म परिवर्तन कर मुसलमान बन जाने का फैसला किया। मुसलमान बनकर उसने एक मुसलमान से शादी की-शादी की वेबसाइट के जरिये। उसके मां-बाप को यह स्वीकार नहीं था। उसने अदालत की शरण ली और केरल उच्च न्यायालय ने यह घोषित कर दिया कि चौबीस साल की लड़की मानसिक तौर पर कमजोर होती है हादिया को उसके मां-बाप के पास भेज दिया। पुलिस समेत हिन्दू फासीवादी उसके घर के चारों ओर पहरा दे रहे हैं और उसे किसी से भी मिलने नहीं दे रहे हैं। हादिया के पति ने न्याय पाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की शरण ली। पर वहां सर्वोच्च न्यायालय ने हादिया का पक्ष सुने बिना केंद्रीय जांच एजेंसी को यह जांच करने का आदेश दे दिया कि कहीं आई.एस.आई.एस., लव जेहाद के जरिये पांव तो नहीं पसार रहा है। आदेश देने वाले वही मुख्य न्यायाधीश खेहर थे जिन्होंने एक सप्ताह बाद तत्काल तीन तलाक वाले मामले में फैसला दिया था कि कुरान सम्मत तत्काल तीन तलाक धार्मिक विश्वासों का मामला होने के चलते मौलिक अधिकारों द्वारा सुरक्षित है। हादिया जबरदस्ती अपने पति से दूर अपने मां-बाप की कैद में है- उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय की मेहरबानी से। 

    लव जेहाद का शिगूफा संघियों ने खड़ा किया हुआ है और स्वयं स्वीकार कर चुके हैं और इस बात की डींग भी हांक चुके हैं कि वास्तव में लव जेहाद का एक भी मामला न होने के बावजूद उन्होंने इसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना दिया है-इतना बड़ा कि सर्वोच्च न्यायालय भी एक वयस्क व्यक्ति के अंतःकरण की स्वतंत्रता की रक्षा करने के बदले लब जेहाद की जांच का आदेश दे रहा है। सर्वोच्च न्यायालय इस बात को स्वीकर करने को तैयार नहीं है कि यदि कोई किसी दूसरे व्यक्ति या किसी आतंकवादी संगठन के प्रभाव में भी किसी विचार को स्वीकार कर रहा है तो वह अपने आप में अपराध नहीं है। हादिया उर्फ अखिला ने कोई अपराध नहीं किया है जिसके कारण उसे अपने पति से दूर करके उसके मां-बाप की कैद में रखा जाये। यह अभी-अभी घोषित निजता के अधिकार का भी उल्लंघन है। आखिर एक 26 साल की वयस्क स्त्री को उसकी इच्छा के विरूद्ध किसी के साथ कैसे रखा जा सकता है। भले ही वे उसके मां-बाप ही क्यों न हों? हादिया के मामले में उच्च न्यायालय व सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार, अंतःकरण की स्वतंत्रता का अधिकार, निजता का अधिकार सभी खारिज हो गये। स्थापित क्या हुआ? वयस्क लड़कियों-स्त्रियों पर मां-बाप का सामंती अधिकार, वस्तुतः बाप का अधिकार। व्यक्ति की जिंदगी पर हिन्दू फासीवादियों का अधिकार। यह व्यक्ति यदि लड़की या स्त्री हो तो राज्य सत्ता, पितृसत्ता व हिन्दू फासीवादियों के अधिकार असीमित हो जाते हैं। 

    भारतीय संविधान के बारे में हमेशा से कहा जाता रहा है कि इसमें मुख्य पीठ में जो मौलिक अधिकार दिये गये हैं उन्हें हाशिये के उपबंधों के द्वारा छीन लिया गया है। हाशिये के उपबंधों में इन अधिकारों पर इतने भांति-भांति के प्रतिबंध लगाये गये हैं कि इनका कोई मतलब ही नहीं रह जाता। राज्य सत्ता किसी भी मौलिक अधिकार को बहुत आसानी से और वह भी बिलकुल कानूनी तरीके से अपने पैरों तले रौंद सकती है। जहां तक मजदूरों-मेहनतकशों की बात है, उसके लिए तो किसी कानूनी नुक्ते की भी जरूरत नहीं है। उनके लिए तो पुलिस का डंडा ही काफी है। 

    सारी दुनिया की तरह भारत में पिछले तीन-चार दशकों में, ठीक उदारीकण के दशकों में ही मौलिक अधिकारों द्वारा प्रदत्त जनवादी अधिकारों का दायरा सिकुड़ता गया है। यह व्यवहारिक तौर पर ही नहीं बल्कि कानूनी तौर पर भी हो गया है। भारत में टाडा, पोटा इसी तरह के कानून थे जिनके खात्मे के बाद उनके प्रावधानों को अन्य कानूनों में चुपके से घुसा दिया गया। 

    आज सारी दुनिया की ही पूंजीवादी राज्य सत्ताएं स्वयं को बेहद असुरक्षित महसूस कर रही हैं। यह असुरक्षा आतंकवादियों के कारण नहीं है। आतंकवादी कहीं भी, कभी भी किसी राज्य सत्ता के लिए चुनौती नहीं रहे हैं। ऐसी चुनौती बन जाने पर वास्तव में आतंकवाद की जरूरत नहीं रह जाती। आई.एस.आई.एस. सीरिया और इराक में आतंकवादी गतिविधियां नहीं करता बल्कि बकायदा जंग लड़ता है।

    आज पूंजीवादी राज्य सत्ताओं को खतरा मजदूरों-मेहनतकशों की ओर से है। इसीलिए वे अपनी सुरक्षा का इंतजाम कर रहे हैं। जनवादी अधिकारों का हनन और संपूर्ण निगरानी तंत्र इसी के लिए हैं। इसे आम जनता में वैधता दिलाने के लिए ही वे आतंकवाद इत्यादि के बहाने का इस्तेमाल कर रहे हैं। 

    भारत सरकार ने अपना निगरानी तंत्र पक्का करने के लिए आधार का खाका तैयार किया। इसे वैधता दिलाने के लिए इसे कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ा गया। कहा गया है कि इससे कल्याणकारी योजनाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार समाप्त होगा। यह मजेदार था कि जिस जमाने में कल्याणकारी मदों में लगातार कटौती की जा रही थी उसी जमाने में आधार जैसी चीजों का भी प्रस्ताव किया जा रहा था। यह भी महत्वूपर्ण है कि आधार परियोजना की शुरूआत कांग्रेस सरकार ने की थी जो आज निजता का अधिकार पर गाल बजा रही है। 

    लगातार बढ़ता निगरानी तंत्र आज पूंजीवादी राज्य सत्ता की जरूरत है। यह उसकी रक्षा के लिए जरूरी है। लेकिन इसीलिए यह जरूरी हो जाता है कि मौलिक अधिकारों की सूची में डाले गये जनवादी अधिकरों में वास्तव में कटौती की जाये। इन अधिकारों पर कानूनी व गैर कानूनी प्रतिबंध लगाये जायें। 

    वैश्विक स्तर पर पूंजीवादी निजाम की इस स्थिति में निजता के अधिकरों की स्वीकारोक्ति का क्या मतलब हो सकता है? एक ओर पहले से मौजूद जनवादी अधिकारों में कटौती और दूसरी ओर इस नये जनवादी अधिकारों की स्वीकृति का क्या मतलब हो सकता है?

    यह असल में पूंजीवादी समाज की गति में मौजूद एक अंतर्विरोध की तीखी अभिव्यक्ति है। पूंजीवादी समाज में पूंजी की गति एक के बाद एक उन क्षेत्रों से भी पुराने संबंधों को विस्थापित करती जा रही है जहां वे अभी तक बचे हुए थे। सामाजिक, पारिवारिक, सांस्कृतिक क्षेत्रों में कई मामलों में चीजें अभी तक पुराने हिसाब से चलती जा रही हैं। इनके पूंजी की जद में आने से पुरानी चीजें टूट रही हैं। इनसे या तो नई चेतना पैदा हो रही है या पुरानी चेतना का विस्तार हो रहा है। भारत जैसे देशों के बारे में तो यह और भी सच है जहां व्यक्ति पर उसके जाति, धर्म, परिवार या स्वाभाविक बड़ों का अधिकार होता है, जहां प्रेम करना अपराध है और जहां विवाह दो व्यक्तियों में नहीं बल्कि दो परिवारों में होता है। 

    पूंजीवादी समाज के व्यक्ति की अपने बारे में इस विस्तारित होती चेतना और पूंजीवादी राज्य की गति विरोधी दिशा में है। यह चेतना जनवाद के विस्तार की मांग करती है जबकि पूंजीवादी राज्य इसको सीमित करना चाहता है। पूंजीवादी राज्य इसके लिए रास्ता यह निकालता है। वह व्यवहार में इस अधिकार को सीमित करने के अनेकों इंतजाम करता है। जुबानी या कानूनी तौर पर अधिकारों की स्वीकृति और व्यवहारिक तौर पर जनवादी अधिकारों का हनन आज के पूंजीवादी निजाम की खासियत है। 

    आज से डेढ़ सौ साल पहले पूंजीवाद को इसकी जरूरत नहीं थी। तब पूंजीवादी राज्य इतना असुरक्षित नहीं था। समाज में जनवादी अधिकारों की चेतना सीमित थी। ऐसे में पूंजीपति वर्ग ने अपने लिए जो जनवादी अधिकार घोषित कर रखे थे उनका वह मजे में उपभोग करता था। छोटे-छोटे पूंजीपतियों के उस जमाने में पूंजीपतियों और राज्य सत्ता के बीच तब वह गठजोड़ भी नहीं था जो बाद के एकाधिकारी जमाने में पैदा हुआ।

    इसी से वह विचित्र स्थिति पैदा हुई। जब समाज में जनवादी अधिकारों की चेतना सीमित थी, जब जनवाद केवल थोड़े से ऊपरी लोगों तक सीमित था तब कानूनी अधिकार वास्तव में लागू होते थे। तब राज्य सत्ता वास्तव में व्यक्ति पर संपूर्ण निगरानी नहीं करती थी। तब वास्तव में निजता का कोई महत्व नहीं था। लेकिन जब बीसवीं सदी में जनवादी चेतना का विकास हुआ, जनवाद का व्यापक जनता तक विस्तार हुआ तो पूंजीवादी निजाम वास्तव में जनवादी नहीं रह गया था। पूंजीपति वर्ग अत्यन्त विशाल होकर एकाधिकारी बन गया था और राज्य सत्ता से गुंथ गया था। पूंजीवादी राज्य अत्यन्त विशाल तंत्र का रूप धारण कर समाज के पोर-पोर में समा चुका था। व्यक्ति पर पूंजीवादी राज्य सत्ता पूरी तरह हावी हो चुकी थी। 

    इस अंतर्विरोध का एक ही समाधान हो सकता था और पूंजीपति वर्ग ने वही किया। जनवादी अधिकारों को एकदम औपचारिक बना दिया गया और उसे जायज ठहराने के लिए सिद्धान्त गढ़े गये। साथ ही जनवादी अधिकारों को व्यवहार में निरस्त करने के लिए अनेकों कानूनी व गैर कानूनी प्रबंध किये गये। परिणाम यह है कि क्या तो भारत, क्या अमेरिका सब जगह व्यक्ति पूंजीवादी राज्य सत्ता के रहमो-करम पर है। हादिया उर्फ अखिला तो केवल एक बानगी भर है। 

    ऐसे में देश के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निजता के अधिकार के मौलिक अधिकार घोषित किये जाने पर केवल वे ही लोग वाहवाही कर सकते हैं जो हर तरीके से पूंजीवाद की रक्षा करना चाहते हैं या फिर वे लोग जिन्हें लगता है कि वे इस अधिकार का इस्तेमाल कर सकते हैं। अक्सर ही ये दोनों एक ही होते हैं। किसी मजदूर-गरीब किसान को भ्रम नहीं हो सकता कि वह सर्वोच्च न्यायालय जाकर अपने इस अधिकार को लागू करवायेगा। उसके घर के आस-पास तो सरकार के सबसे निचले कारकून की कलम और थानेदार का डंडा ही उसके अधिकार की सीमा तय कर देते हैं। यदि वह स्थानीय अदालत की शरण लेता है तो वहां भी इन्हीं की चलती है। 

    यदि किसी को तब भी भ्रम हो तो उसे देश की जेलों में बंद उन मुसलमान युवकों से मिल लेना चाहिए जो आतंकवाद के नाम पर पकड़े गये थे और अब वहां पड़े-पड़े अधेड़ हो गये हैं।   

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