अंक : 01-15 Sep, 2017 (Year 20, Issue 17)

संघर्ष की सजा


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    पिछले दिनों ग्रेजियानो नोएडा के सालों से जेल में बंद मजदूरों पर अदालत ने अपना निर्णय सुना दिया। एक अधिकारी की हत्या के आरोप में 4 मजदूरों को उम्रकैद की सजा दे दी गयी। तीन तलाक व निजता के अधिकार पर निर्णय में अदालत की वाहवाही करने में जुटे पूंजीवादी मीडिया को मजदूरों को दी सजा को कवर करने का वक्त नहीं था। हाल के वर्षां में प्रिकाल, मारुति के बाद ग्रेजियानी तीसरी कम्पनी है जिसमें किसी अधिकारी की हत्या के आरोप में मजदूरों को उम्र कैद सरीखी सजा सुनायी गयी।

    इन तीनों ही कम्पनियों के मजदूरों को क्या वास्तव में इस बात की सजा दी गयी कि इन्होंने किसी अधिकारी की हत्या की थी? दरअसल न तो इन्होंने किसी अधिकारी की हत्या की थी और न ही इन्हें इस बात के लिये सजा ही दी गयी। हां, सजा देने के लिये अधिकारी की हत्या को कानूनी कारण जरूर बनाया गया। तो फिर इन कम्पनियों के मजदूरों को किस बात की सजा दी गयी? इन्हें सजा इस बात की दी गयी कि इन्होंने, उदारीकरण के मौजूदा दौर में, जहां सरकार से लेकर प्रशासन सभी पूंजी के मुनाफे के लिये निर्लज्जता से समर्पित हो चुके हैं, मजदूरों के हकां की आवाज उठायी। इन्होंने संगठित हो पूंजी की लूट पर लगाम लगाने की मांग उठायी। इन्हें सजा दी गयी क्योंकि इन्होंने मजदूरों के पक्ष में पूंजी से संघर्ष का साहस किया।

    इन्हें सजा दी गयी क्योंकि इन्होंने पूंजी के हमले के आगे बेबस खड़े मजदूरों को एक बार फिर से संघर्ष की राह दिखायी। इन्हें सजा दी गयी क्योंकि इन्होंने मजदूरों के भीतर यह विश्वास कायम किया कि मजदूर एकजूट हा अपने मलिकान को चुनौती दे सकते हैं। इन्हें संघर्ष की अलख जिन्दा रखने की सजा दी गयी।

    मजदूरों के संघर्षां की अलख ही वह चीज है जिससे न केवल पूंजीपति वर्ग बल्कि समूची पूंजीवादी व्यवस्था डरती है। भारत के मजदूरों को भले ही अपनी ताकत का अन्दाजा न हो पर देश का लुटेरा पूंजीपति वर्ग, उसकी सरकार, न्यायपालिका, प्रशासन सब इस ताकत को न केवल पहचानते हैं बल्कि उससे डरते भी हैं। उन्हें पता है कि अगर मजदूर वर्ग एकजुट हो, उन्हें सबक सिखाने निकल पड़ेगा तो उनके सामने बचने का कोई रास्ता नहीं रहेगा। इसीलिये फैक्टरी के भीतर एक अधिकारी की मौत उनके सामने भविष्य को लेकर दहशत पैदा कर देती है। और वे पगलाये कुत्ते की तरह मजदूरों को सजा देने निकल पड़ते हैं।

    मजदूरों को सजा देना तय कर लेने के बाद न्याय का प्रपंच रचा जाता है बोझिल, उबाऊ, गवाहियों का दौर चलता है। कानूनों को तोड़-मरोड़ कर पूंजीवादी न्याय मजदूरों के माथे पर सजा के रूप में आ टपकता है। बाज दफा तो कानूनों का उल्लंघन इतना स्पष्ट होता है कि दोनों पक्षों को यह साफ-साफ नजर आता है कि निर्णय तो पहले से तय था। मुकदमा, गवाही, जिरह तो महज खानापूरी है। 

    शासक वर्ग इन सजाओं के जरिये मजदूर वर्ग को संदेश देना चाहता है कि संघर्ष करोगे तो यही हश्र होगा। शासक वर्ग इस गलतफहमी में जीता है कि कुछ मजदूरों को जेल के सींखचों के पीछे ढकेल मजदूरों की आवाज बंद कर देगा। वह खुद अतीत को नहीं देखता कि पूंजीवाद के धरती पर पैदा होने के समय से वह यही करता आ रहा है। दमन-सजा से मजदूर वर्ग की आवाज बंद करने का उसका प्रयास आज तक सफल नहीं हुआ है। इसीलिये यह आगे भी सफल नहीं होगा। उल्टा मजदूर वर्ग के ऊपर उसका हर हमला मजदूरों को और ज्यादा एकजुटता की ओर ढकेलता है। मजदूरों को सजा देने के उतावलेपन में उसके द्वारा खुद के कानून की उड़ाई गयी धज्जियां मजदूरों की निगाहों में भी कानून के भ्रम को साफ कर देती हैं।

    प्रिकाल व मारुति के मामले में भी यही हुआ। कहां तो शासक वर्ग चाहता था कि मजदूर डर जायें पर हुआ उल्टा। देश का कोई औद्योगिक शहर ऐसा नहीं बचा जहां से मजदूरों ने मजदूरों की सजा के खिलाफ आवाज नहीं उठायी। अब ग्रेजियानो के मामले में भी यही होगा। अभी यह प्रक्रिया अलग-थलग आवाजों तक है पर आने वाले वक्त में शासकों का नया हमला अलग-थलग आवाजों को एकजूट करने की ओर ले जा सकता है।

    अपने ही कानून को ठेंगा दिखा मजदूरों को सजा देना दरअसल पूंजीपति वर्ग की ताकत का नहीं, भय और कमजोरी का संकेत है। वह अपनी मुनाफे की बढ़ती की खातिर जब सारे कानूनों को तोड़ मजदूरों के शोषण में जुटा हुआ है, जब उसकी पुलिस-न्यायपालिका भी निर्लज्जता के साथ मजदूरों पर हमले में जुटी है। तो उसकी ये हरकतें ही मजदूरों के सामने उसकी लुटेरी व्यवस्था का पर्दाफाश कर देती हैं। मजदूर संघर्ष का कोई रास्ता शेष न होने पर खुद इन कानूनों को धता बता लड़ने को मजबूर हो जाते हैं। उनके लिये वर्ग संघर्ष की तस्वीर स्पष्ट हो जाती है कि एक ओर मजदूर वर्ग है दूसरी ओर पूंजीपति वर्ग और उसका पुलिस-प्रशासन, न्यायपालिका आदि।

    पूंजीपति वर्ग द्वारा भारत के मजदूर वर्ग पर बोला जाने वाला हर हमला मजदूरों के दिमाग में वर्ग संघर्ष की यह तस्वीर और स्पष्ट करेगा। इस तस्वीर को धुंधला करने में जुटे, मजदूरों के बीच भ्रम फैलाने में जूटे पूंजीवादी-संशोधनवादी ट्रेड यूनियन सेण्टरों के प्रयासों का वक्त के साथ अधिकाधिक उद्घाटन होता जायेगा।

    अपना वेतन बढ़ाने, निकाले साथियों को रखवाने, यूनियन बनाने सरीखी मांगो की सजा उम्रकैद के रूप में सामने आना, मजदूरों को अधिकाधिक इस समझ की ओर बढ़ायेगा कि सजा देने वाले मलिकों के लिये काम करते हैं। वे इस समझ को तेजी से हासिल करेंगे, कि समूची पूंजीवादी व्यवस्था उनके हितों के खिलाफ है, कि उन्हें बेहतर जीवन पूंजीवादी व्यवस्था को खत्म कर समाजवाद में ही हासिल हो सकता है, कि पूंजीवाद विरोधी समाजवादी क्रांति ही मजदूर वर्ग का मिशन है। निश्चय ही क्रांति की यह समझ मजदूर वर्ग में क्रांतिकारी संगठनों के द्वारा ही फैलायी जायेगी, पर उसे मजदूर ज्यादा तेजी से ग्रहण करते जायेंगे।

    ग्रेजियानो के मजदूरों को सजा के वक्त जरूरत है कि पूंजीवादी न्याय की असलियत को समाज में स्थापित किया जाये। स्थापित किया जाये कि पूंजीवाद में मजदूरों-मेहनतकशों के पाले में हर हमेशा अन्याय ही आता है। जब मजदूर हम की आवाज उठाते हैं तो उन्हें जेल की सलाखों के पीछे डालना ही पूंजीवाद में ‘न्याय’ है। फैक्टरी में काम के दौरान मालिक प्रबंधन की लापरवाही से दुर्घटना का शिकार हो मरने वाले मजदूरों के लिये कभी किसी मालिक को उम्रकैद तो दूर जेल तक नहीं भेजा जाता पर एक अधिकारी के मरने पर भारी तादाद में मजदूरों को सालों जेल में सड़ा देना, यही पूंजीवादी न्याय है।

    स्थापित किया जाये कि मजदूर को पूंजीवादी व्यवस्था में चाहे जितने मौलिक अधिकार मिल जायें, हमेशा व्यवहार में उनसे दूर ही रहेगा। मजदूर वर्ग संगठित हो पूंजीवादी व्यवस्था को बदलने का संघर्ष छेड़ ही बेहतर जीवन की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

Labels: सम्पादकीय


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