अंक : 01-15 Sep, 2017 (Year 20, Issue 17)

आपका नजरिया- मजदूर वर्ग को अपनी लड़ाई के लिए खुद संगठित होना होगा।


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    निजता के मौलिक अधिकारों में स्वीकार किए जाने पर संविधानवादी मध्य वर्ग और रवीश कुमार जैसे उदारवादी झूम रहे हैं। संविधान और लोकतंत्र के कसीदे पढ़े जा रहे हैं। चलिए हम भी आपके वर्ग की खुशी में शामिल हो जाते हैं। लेकिन जनाब जरा मजदूरों के अधिकारों पर चले इस हथौड़े पर चुप क्यों हैं, मजदूरों के सभी अधिकार खत्म होने जा रहे हैं। वामपंथी विपक्ष चुप है। मजदूर वर्ग के खिलाफ पूंजी की रक्षा और मुनाफा बढ़ाने के लिए सभी सरकार बनाने वाली पार्टियों में एकता है। मजदूरों की आवाज उठाने वाले इनमें कोई नहीं, मजदूर वर्ग को अपनी लड़ाई के लिए खुद संगठित होना होगा। इस को गौर से पढ़ेंः-

1. 10 अगस्त को, लोकसभा में The Code on Wage, 2017 पेश किया गया है। इसके लागू होने के बाद, ये सारे Acts अप्रभावी हो जाएंगेः- The Payment of Wages Act, 1936, the Minimum Wages Act, 1948, the Payment of Bonus Act, 1965 and the Equal Remuneration Act, 1976 [Clause 60]

2. सभी कंपनियों आदि के अतिरिक्त यह, इन सब पर भी लागू होने जा रहा है- रेलवे, खानों, तेल क्षेत्र, प्रमुख बंदरगाहों, हवाई परिवहन सेवा, दूरसंचार, बैंकिंग और बीमा कंपनी या किसी निगम या केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम या सहायक कंपनियां या स्वायत्त निकायों के प्रयोजनों के लिए ठेकेदारों की स्थापना सहित, जैसा कि मामला हो, केन्द्रीय सरकार (Clause 2(क)) यानी यह अब हर नौकरीपेशा पर लागू होगा।

3. इसके मुताबिक, अब पारिश्रमिक (I) घंटे के हिसाब से, या (II) दिन के हिसाब से, या (III) महीने के हिसाब से तय किया जा सकता है। जो, (ए) समय काम के लिए मजदूरी की न्यूनतम दर या (बी) टुकड़े के काम के लिए मजदूरी की एक न्यूनतम दर के हिसाब से दिया जाएगा। (Clause 6) यानि अब नौकरी घंटों या दिन के हिसाब से भी दी जा सकेगी, महीने के हिसाब से पगार की कोई बाध्यता नहीं रह जाएगी।

4. (Clause 9 को 60 के साथ पढ़िए) पे-कमीशन या wage&revision आदि खत्म किए जा रहे हैं। सरकार एक ‘सलाहकार बोर्ड’ बनाएगी जो पारिश्रमिक तय करेगा।

5. 15 साल से कम उम्र के लोग भी काम पर रखने पर कोई जुर्माना नहीं होगा। (Clause 19.(5) )

6. किसी को भी केवल 2 दिन के नोटिस पर काम से निकाला जा सकेगा। (Clause 17. (2))

7. काम के घंटे कुछ भी तय किए जा सकते हैं (8 घंटे की बाध्यता समाप्त)। हफ्ता 6 दिन का होगा, सातवें दिन छुट्टी (Clause 13. (1) )

    स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद शायद ही किसी ने ऐसा draconian कानून कभी सुना होगा। ILO, इस कानून के सामने एक हास्यास्पद संस्था दिखाई दे रही है। अभी तक तो यह सरकार, मजदूर का PF और बैंक-डिपाजिट ही हड़प रही थी, अब उसकी जिंदगी ही साहूकारों के चंगुल में रखने जा रही है।       

             नरेन्द्र, पटना

Labels: आपका नजरिया


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