अंक : 01-15 Sep, 2017 (Year 20, Issue 17)

12 घण्टे काम, मजदूरी केवल 150 रुपये


Print Friendly and PDF

    जैसा कि इस लेख की हैडिंग है। यह हैडिंग अपने आप में बिलकुल सच है। यह लेख जो मैंने यहां पर लिखा है। वह एक मजदूर के साथ बातचीत पर आधारित है और क्योंकि मैं भी उसी फैक्टरी के भीतर काम करता हूं। इसलिए मैंने भी उस मजदूर को काम करते देखा है। जिस फैक्टरी का जिक्र मैं यहां पर कर रहा हूं वह फैक्टरी के एण्ड के, एक्सपोर्ट रजा कालोनी, निकट कर्मचारी नगर बाईपास बरेली में स्थित है। इस फैक्टरी के भीतर 450 से 500 मजदूरों के आस-पास काम करते हैं। इस फैक्टरी के भीतर कोई श्रम कानून लागू नहीं होता है। आज से 3 से 4 साल पहले इस फैक्टरी के मजदूरों ने तंग आकर हड़ताल कर दी थी तब जाकर कहीं फैक्टरी प्रबंधन ने 125 मजदूरों को परमानेन्ट किया था और बाकी मजदूरों को ठेकेदार की तरफ से काम करवाती है। और यह ठेकेदार और कोई नहीं बल्कि फैक्टरी के मैनेजमेण्ट के ही आदमी हैं। फैक्टरी के भीतर दो तरह के ठेकेदारी के मजदूर काम करते हैं। एक फैक्टरी के मैनेजमेण्ट की तरफ के होते हैं जिनके द्वारा जो लड़के काम पर रखे जाते हैं उन्हें 8 घण्टे के 185 रुपये दिये जाते हैं और जो दूसरे ठेकेदार के मजदूर होते हैं जो फैक्टरी में 5 से 10 साल पुराने हैं जो फैक्टरी में परमानेंट नहीं हैं। वह हैं जिन्हें 8 घण्टे के 120 से 150, 165 तक रुपये देते हैं। फैक्टरी के भीतर जो मजदूर ज्यादातर काम कर रहे हैं। वह दूसरे ठेकेदार की तरफ से काम कर रहे हैं। इस फैक्टरी के भीतर फैन्सी डेकोरशन टाइप आइटम बनते हैं जैसे कि लोहे के तमाम तरह के गमले, मोमबत्ती के स्टैण्ड व तमाम तरह की झालरें। यहां पर जो झालरें तैयार की जाती हैं वे 1 एमएम से लेकर 10 एमएम तक के लोहे की होती हैं। लोहे को घिसने के लिए ग्राइण्डर का इस्तेमाल किया जाता है। ग्राइण्डर चलाते समय कई बार मजदूरों को चोट भी लग जाती है। लेकिन यहां पर फर्स्ट एड बॉक्स भी नहीं है। मजदूर इस तरह की गंभीर परेशानी में काम करने को मजबूर हैं। 

    अब जैसा कि हैडिंग में मैंने जिक्र किया है। उस मजदूर की बात करते हैं। यह मजदूर जिसका नाम सोनू है, बरेली से 40 किमी. दूर गांव का निवासी है। यहां बरेली में किराये पर रहता है और यहां फैक्टरी में रोज सुबह 8 से शाम 8 बजे तक काम करता है और मजदूरी केवल 150 रुपये मिलती है। महीने में कोई छुट्टी नहीं है। 30 दिन के 4500 रुपये मिलते हैं। 1200 रुपये किराये के मकान के, 600 रुपये का सिलेण्डर, 500 रुपये महीना दूध के चले जाते हैं। बचे केवल 2300 रुपये उसे उसमें खाना भी खाना है। कपड़े भी पहनने हैं। आखिर वह इतने कम रुपये में खर्चा कैसे चलाये उसके दिल में पीड़ा थी। इसी तरह का हाल उस फैक्टरी के बहुत सारे मजदूरों का है। इस फैक्टरी की कमाई मजदूरों के ही दम पर पिछले 3-4 सालों में बहुत तेजी के साथ बढ़ी है। 2 मंजिल से 4 मंजिल फैक्टरी खड़ी कर ली, मालिक का मुनाफा बहुत तेजी के साथ बढ़ा। अगर कुछ नहीं बदला तो वह मजदूरों के दिन, मजदूरों को मिला तो केवल 12 घण्टे के 150 से 185 रुपये, गम्भीर घाव और चोटें। 

    यहां पर हमें यह साफ दिख रहा है कि आखिर श्रम कानून लागू नहीं हो रहा है तो वह किसके लिए फायदा पहुंचा रहा है। जाहिर सी बात है- मालिक के लिए। 

    ऐसे हालात में सभी मजदूरों को एकजुट होकर मालिक व इस शासन तंत्र के खिलाफ बिगुल फूंक देने की जरूरत है और इस लूट शोषण पर टिकी पूंजीवादी व्यवस्था को नेस्तनाबूद करके मजदूर मेहनतकशों का राज समाजवाद के लिए संघर्ष तेज करने की जरूरत है। 

        -एक पाठक, बरेली  

Labels: मजदूरों के पत्र


घोषणा

‘नागरिक’ में आप कैसे सहयोग कर सकते हैं?
-समाचार, लेख, फीचर, व्यंग्य, कविता आदि भेज कर क्लिक करें।

अन्य महत्वपूर्ण लिंक्स


हमें जॉइन करे अन्य कम्यूनिटि साइट्स में

घोषणा

‘नागरिक’ में आप कैसे सहयोग कर सकते हैं?
-समाचार, लेख, फीचर, व्यंग्य, कविता आदि भेज कर
-फैक्टरी में घटने वाली घटनाओं की रिपोर्ट भेज कर
-मजदूरों व अन्य नागरिकों के कार्य व जीवन परिस्थितियों पर फीचर भेजकर
-अपने अनुभवों से सम्बंधित पत्र भेज कर
-विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, बेबसाइट आदि से महत्वपूर्ण सामग्री भेज कर
-नागरिक में छपे लेखों पर प्रतिक्रिया व बेबाक आलोचना कर
-वार्षिक ग्राहक बनकर

पत्र व सभी सामग्री भेजने के लिए
सम्पादक
'नागरिक'
पोस्ट बाक्स न.-6
ई-मेल- nagriknews@gmail.com
बेबसाइट- www.enagrik.com
वितरण संबंधी जानकारी के लिए
मोबाइल न.-7500714375