अंक : 01-15 Sep, 2017 (Year 20, Issue 17)

उन्हीं के ‘एक्शन’, उन्हीं का फायदा


भारत सरकार नीति आयोग का तीन वर्षीय एक्शन प्लान


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    केन्द्रीय योजना आयोग को समाप्त करके, मोदी सरकार द्वारा उसकी जगह स्थापित नीति आयोग (नेशनल इन्स्टीट्यूशन फार ट्रांसफार्मिंग इंडिया) द्वारा तीन वर्षीय ‘एक्शन प्लान’ (वर्ष 2017-18, 2018-19, 2019-20) जारी किया गया है। चूंकि योजना आयोग की 12 वीं पंचवर्षीय योजना मार्च 2017 में समाप्त हो रही थी अतः अप्रैल 2017 से उक्त एक्शन प्लान लागू हो चुका माना जा सकता है।

    नीति आयोग को थिंक टैंक भी कहा जाता है और स्वयं नीति आयोग का कहना है कि एक्शन प्लान को तैयार करने में उसकी कड़ी मेहनत के अलावा अन्य सैकड़ों विद्वानों, विशषज्ञों, राज्य सरकारों तथा भारत सरकार के सचिवों की अनेकानेक समितियों के निष्कर्षां आदि का सहयोग रहा है। नीति आयोग जनवरी 2015 में स्थापित हुआ और मई 2015 में प्रधानमंत्री कार्यालय ने नीति आयोग से 15 वर्षीय दृष्टिकोण पत्रक (विजन डाक्यूमेण्ट), 7 वर्षीय रणनीतिक पत्रक (स्ट्रेटजी डाक्यूमेण्ट) तथा 3 वर्षीय एक्शन प्लान तैयार कर पेश करने को कहा था जिसके अंतर्गत यह एक्शन प्लान जारी किया गया है।

    एक्शन प्लान के शुरू में कहा गया है कि देश की आजादी के बाद से ही देश को विकसित करने के प्रयासों में मुख्य तत्व गरीबी को दूर करना रहा है ताकि देश का हर नागरिक समुचित स्तर (Minimum Standard) का भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य, वस्त्र, आवास, ऊर्जा एवं यातायात सुविधा हासिल कर सके। यह भी कहा है कि एक ओर भीषण गरीबी, दूसरी ओर प्रति व्यक्ति अति अल्प आय की स्थिति में हमारे लिये यह असंभव था कि बिना अर्थव्यवस्था की उन्नति से उसे हासिल किया जा सके। कर राजस्व इतना कम था कि केवल उसके पुनर्वितरण से, भीषण आर्थिक जरूरतों के बीच गरीबी पर प्रहार का ज्यादा असर नहीं पड़ा। 80 के दशक के उत्तरार्ध से और खास कर 1991 से लागू नई आर्थिक नीतियों से तथा विशेषकर भाजपायी प्रधानमंत्री वाजपेई के दौर में चीजें ठीक होती हुई बतायी गयीं। देश की पूरी अर्थव्यवस्था और कृषि, उद्योग, सेवा क्षेत्र के साथ-साथ विभिन्न अंचलों, शहरों व ग्रामीण क्षेत्रों के विकास एवं मौजूदा अर्थव्यवस्था को तथाकथित गति देने वाले पी.पी.पी., ऊर्जा, यातायात, संचार, विज्ञान एवं तकनीक, पर्यावरण, शासन, टैक्स वसूली, न्याय, शिक्षा, स्वास्थ्य, जल जैसे मामलों में कायापलट हेतु व्यवहारिक व नीतिगत सुझाव इसमें दिये गये हैं। 

    कहा जाता है कि योजना आयोग द्वारा पेश की गयी प्रथम पंचवर्षीय योजना आलेख - खास कर इसके अवधारणात्मक अंश को - देश के विद्वानों, अर्थशास्त्रियों को दिखाया गया था, उनकी राय ली गयी थी। इस एक्शन प्लान में ऐसा नहीं है। यह विशुद्ध ‘राष्ट्रीय’ मेधा प्रसूत प्रतीत होता है। निश्चित ही यह ‘राष्ट्रीय’ मेधा, वास्तव में उपलब्ध राष्ट्रीय मेधा का सूक्ष्म अंश ही है क्योंकि ठोस जनपक्षधर विशेषज्ञ व योजनाकार इसमें शामिल नहीं हैं। पूंजीपतियों की पूंजी और उनके मुनाफे में सतत वृद्धि को समर्पित विशेषज्ञों को ही इसमें शामिल किया जा सकता था। देश की सत्ता पर पूंजीपति वर्ग है।

    इसमें नया क्या कुछ है? ऐसा कुछ नहीं है। सभी बातें पहले से होती रही हैं। अवश्य ही बार-बार चीन का उल्लेख आया है। चीन के विकास, चीन का निर्यात, वहां की प्रति व्यक्ति आय, भारत के मुकाबले वहां की औसतन तीन गुनी मजदूरी...... सीधे-सीधे चीन से सीखने और नकल करने की ‘भारतीय’ कोशिश इसमें दिखती है। तृष्णा से लबालब नयनों से दर्ज किया गया है कि वर्ष 2015 में विश्व व्यापार में निर्यात 16.6 ट्रिलियन डालर रहा जिसमें चीन का हिस्सा 13.72 प्रतिशत था जबकि भारत का मात्र 1.67 प्रतिशत। इसी साल चीन का सकल घरेलू उत्पाद भारत के मुकाबले 5.2 गुना था। वर्ष 2015 में भारत ने, अत्यधिक कम मजदूरी होने के बावजूद, केवल 18.2 बिलियन डालर के सिलेसिलाये वस्त्र निर्यात किये जबकि चीन ने, औसतन तीन गुनी मजदूरी के बावजूद, 175 अरब डालर के। पूंजी व उसके मुनाफे को समर्पित बुद्धिजीवी वर्ग के पास और कोई विकल्प है भी नहीं।

    तीन वर्षीय एक्शन प्लान को समग्रता में देखने पर बड़ी छटपटाहट इस बात की दिखती है कि विदेशी-बहुराष्ट्रीय कम्पनियां किसी तरह अपनी पूंजी, अपनी तकनीक, अपनी प्रबंधन क्षमता और अपनी निर्यात क्षमता आदि लेकर देश में आयें, यहां की कम मजदूरी पर मिल रही जवानी का फायदा उठायें। इस प्रक्रिया में ही बेरोजगारी व अल्प मजदूरी की समस्या हल होगी। देश के युवाओं को स्किल सिखाने आदि की बातें इसी संदर्भ में हैं। आश्चर्यजनक रूप से देशी पूंजीपतियों से कोई उम्मीद नहीं की गयी है। इसके अलावा मैनुफैक्चरिंग क्षेत्र से सरकार कतई बाहर आये तथा बड़ी ही निर्ममता से सार्वजनिक क्षेत्र की विभिन्न इकाइयों को और खास कर घाटे पर चल रही इकाइयों को बंद कर देने-बेच देने अथवा दूसरे किसी को दे देने पर पूरा जोर दिया गया है। तरह-तरह की सब्सिडी को भी समाप्त करने अथवा कम से कम करने की बात कही गयी है। टैक्स के मामले में भी हजारों तरह की छूटों को खत्म करते हुये टैक्स आधार बढ़ाने पर जोर है। विभिन्न फसलों (गेहूं, गन्ना आदि) के मिनिमम सपोर्ट प्राइस की आलोचना करते हुये यह व्यवस्था भी समाप्त करने को कहा गया है। यह सभी बातें और इसी दिशा में अन्य बातें कोई नयी नहीं हैं बल्कि इन पर नई आर्थिक नीतियों के लागू होने के समय से ही पूरा जोर रहा है।

    भारत सरकार के बजट के सम्बन्ध में कहा गया है कि अब तक पूंजीगत व्यय पर जोर देने के बजाय राजस्व व्यय पर जोर रहा है और राजस्व व्यय में भी तरह-तरह की सब्सिडी रहने के कारण जन स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी मदों पर कम राशि ही मिल पाती रही हैं। इस प्रकार सब्सिडी समाप्त करने अथवा कम से कमतर करने को कहा गया। बजट में खर्च को ‘प्लान’ तथा ‘नान प्लान’ शीर्षक में विभाजन करने की परम्परा को भी समाप्त करने को कहा गया है। असल में ‘प्लान’ शीर्षक में खर्चां को अच्छा माना जाता है क्यों कुछ नया होने का आभास होता है। चूंकि ‘प्लान’ शीर्षक में तनख्वाहों की राशि भी शामिल रहती है अतः इस विभाजन को ही समाप्त कर रहे हैं। अब आगे से कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे मदों को इन्हीं शीर्षक से दिखायेंगे। इस प्रक्रिया से सिर्फ इतना ही होगा कि इन शीर्षकों में एक-मुश्त बड़ी राशि (बजट में) दिखेगी।

    तीन वर्षीय एक्शन प्लान में खेती-किसानी तथा किसान तथा बेरोजगारी-मजदूर-उद्योग आदि जैसे विशिष्ट मुद्दों पर क्या एक्शन लिया जाना है, यह देखना भी रोचक होगा। मोदी सरकार की एक बड़ी घोषणा (जो अब भी बार-बार की जाती रहती हैं) किसानों की आमदनी 2022 तक दोगुना कर देने की है। किसानों की दुर्दशा, उनकी आत्महत्यायें, खेती की वर्बादी और कृषि क्षेत्र का हिस्सा सकल घरेलू उत्पाद में लगातार कम होता जाना तथा दूसरी ओर अधिकांश आबादी का कृषि पर ही निर्भर बने रहना जैसी समस्यायें भी हैं। कौन से एक्शन लिये जाने हैं? 

    इस दिशा में पहला एक्शन यह है कि किसानों को उनकी फसल के लाभकारी मूल्य मिलें। इस हेतु किसान और उसकी उपज के उपभोक्ता के बीच बिचौलियों को खत्म किये जाने की कल्पना की गयी है कि इससे किसान को उपज के लाभकारी मूल्य मिल सकेगें। इसके लिये राज्यों की कृषि उत्पाद मण्डी समिति एक्ट में वदलाव कर उसे केन्द्रीय एक्ट के अनुसार बनाना है। अखिल भारतीय मण्डी निर्माण, इलेक्ट्रानिक मण्डी निर्माण जैसे कदम उठाने को कहा गया है ताकि उत्पादक और उपभोक्ता का मिलन हो सके और किसान लुटने से बचे। सड़नशील कृषि उत्पाद (सब्जी, फल आदि) को मण्डी एक्ट से बाहर करने ऐसे बिचौलिये (Appreatem) तैयार करने जो किसान की उपज क्रय कर भंडारित करें तथा लाभकारी मूल्य पर बेच सकें, आवश्यक वस्तु अधिनियम के अंतर्गत कुछ तत्वों को छूट देना कि वे ज्यादा स्टॉक रख सकें (जैसेः बड़े होटल, डिपार्टमेण्टल स्टोर आदि)।

    इसके अलावा, कान्ट्रेक्ट व ग्रुप फार्मिंग को बढ़ावा दिया जाय ताकि कृषि में उन्नत तकनीक व विधि का समावेशन हो सके। इस दिशा में बजट 2017-18 भाषण में ‘आदर्श कान्ट्रेक्ट फार्मिंग एक्ट’’ बनाने की घोषणा हो चुकी है अतः शीघ्र ही इसे बना कर लागू किया जाये। इसके बाद खड़े होने वाले ‘‘लघु किसान समूह’’ और नाबार्ड जैसी संस्थायें कृषि में अपनी पूंजी झोंक सकेंगी।

    ‘‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’’ व्यवस्था के अंतर्गत चूंकि क्षेत्रीय असमानता उत्पन्न हो गयी है (जैसे देश का पूर्वी क्षेत्र गेहूं नहीं पैदा करता) और गेहूं, चीनी जैसी फसलों पर अन्य जरूरी फसलों के मुकाबले ज्यादा जोर रहता रहा है, अतः इसकी जगह ‘‘प्राइस डिफिसियेंसी सिस्टम’’ लागू किया जाय। इसके अंतर्गत फसल खरीद की जरूरत नहीं पड़ेगी बल्कि किसी फसल के दाम यदि निर्धारित दर से नीचे गिर जाते हैं तो इस अंतर की भरपायी किसान को कर दी जायगी।

    इसके अतिरिक्त, कृषि की उत्पादकता बढ़ायी जाने की दिशा में ‘प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना’ को पूरी तरह से लागू किया जाय (ताकि सिंचित कृषि का क्षेत्रफल बढ़े)। बीज एवं उर्वरकों की उपलब्धता तथा इस क्षेत्र में नयी शोध तकनीक का व्यापक समावेशन हो। आमतौर से परम्परागत फसलों के स्थान पर ऊंचे मूल्य की फसलों की ओर बढ़ा जाय। पशुपालन, बागवानी, वानिकी एवं मत्स्य पालन को उन्नत और व्यापक करने के प्रयासों का उल्लेख है। कान्ट्रेक्ट फार्मिंग की दिशा में मौजूदा संकोच समाप्त करने के लिये राज्यों के भूमिधरी अधिनियमों को ठीक करने को भी अत्यावश्यक बताया गया है (ताकि मालिकाना अक्षुण्ण रहें)।

    इस प्रकार उपर्युक्त में नया क्या है? वस्तुतः कुछ भी नहीं। इस प्रकार के सभी प्रयासों की ‘चर्चा’ अक्सर होती ही रहती है। देश में खेती-किसानी की मौजूदा स्थिति तथा मुनाफा आधारित व्यवस्था की आम दिशा के चलते इस एक्शन प्लान के ‘एक्शन’ किसानों का कोई वास्तविक कल्याण कर पायेंगे। इसमें पूरा का पूरा संदेह है। 

    देश में व्याप्त भयंकर बेरोजगारी, मजदूर वर्ग तथा उद्योगों की काया-पलट के लिए तीन वर्षीय एक्शन प्लान में क्या कहा गया है?

    इस मामले में विडम्बना पूर्ण ढंग से बेरोजगारी को गम्भीर समस्या माना ही नहीं गया है। कहा गया है कि पिछले कुछ दशकों से देश में बेरोजगारी 2 से 3 प्रतिशत तक बनी रही है। (यह आंकड़ा यूजुअल प्रिंसिपल स्टेट पद्धति से है) तथा करेन्ट डेली स्टेट्स से बेरोजगारी का प्रतिशत 5 से 8 प्रतिशत तक है। प्लान में जोर देकर कहा गया है कि देश में बेरोजगारी के स्थान पर अल्प वेतन रोजगार बड़ी समस्या है अतः विभिन्न ‘एक्शन’ के जरिये अच्छे वेतन पर नियमित-संगठित क्षेत्र में रोजगार उत्पन्न किये जाने हैं। 

    इससे आगे बताया गया है कि विश्व में केवल चार विकासशील देश हैं जिन्होंने पिछले तीन दशकों में अपना काया-पलट सफलतापूर्वक कर लिया है। ये देश हैं, दक्षिण कोरिया, ताइवान, सिंगापुर और चीन। इन सभी देशों के काया पलट में निर्यात ने मुख्य भूमिका निभाई है। इस प्रकार अपने देश की काया-पलट भी निर्यात के जरिये ही हो सकती है। यह इसलिये भी कि घरेलू उत्पादक मांग की कमी का रोना रोते रहते हैं जबकि 2015 में विश्व निर्यात बाजार 16.6 ट्रिलियन अरब डालर का था। निर्यात आधारित फर्मे उच्च उत्पादकता बनाये रखेंगी इसलिये यहां मजदूरों को उच्च वेतन भी मिल सकेगा। इसके साथ घरेलू उपयोग आधारित फर्में या तो निर्यात फर्मों की ‘वेन्डर’ बन जायेंगी अथवा उनकी उत्पादकता का मुकाबला करते हुए मजबूत बनेंगी। इस तरह हर प्रकार से निर्यात पर ही जोर दिया जाना है जिससे कि देश में अच्छी तनख्वाहों की नौकरियां उत्पन्न हो सकें।

    परंतु यह कैसे संभव होगा? एक्शन प्लान फिर से चीन पर ही नजर डालता है और ‘शेनजेन’ का उदाहरण देता है। चीन का यह एस.ई.जेड. 1980 में जब स्थापित हुआ था तब इस क्षेत्र की आबादी के रूप में मछली पकड़ने वाले कुछ गांव थे। पर आज इस 2050 वर्ग किलोमीटर के दायरे में 1 करोड़ 10 लाख शहरी आबादी, प्रति व्यक्ति आय 24,000 डालर।

    इसी उदाहरण की नकल करते हुए देश में भी दो सी.ई.जेड. (कोस्टल इम्प्लायमेन्ट जोन) स्थापित किये जाने हैं जो पूर्व के एस.ई.जेड. (विशेष आर्थिक जोन) से अलग होंगे यानी कुछ सौ एकड़ के नहीं बल्कि प्रत्येक सी.ई.जेड. 500 वर्ग किलोमीटर या इससे भी बड़े होंगे। यह सी.ई.जेड. दक्षिण में एक पूर्वी घाट पर होगा और एक पश्चिमी घाट पर।

    इन दोनों कोस्टल इम्प्लायमेन्ट जोन की स्थापना उपरांत इनमें तरह-तरह की सुविधायें एवं छूटें देने को कहा गया है। जैसे इस जोन में उदारीकृत श्रम नियम लागू हों (गुजरात के विशेष आर्थिक क्षेत्र, विशिष्ट निवेश क्षेत्र, राष्ट्रीय निवेश तथा मैन्युफैक्चरिंग जोन में है)। भू उपयोग परिवर्तन के उदारीकृत नियम, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के अनुसार विद्युत आपूर्ति, व्यापक स्वायत्तता, गहरे बन्दरगाह के जरिये आयात-निर्यात की व्यापक सुविधाएं, व्यापार हेतु सुविधाएं व उदारीकरण - सभी प्रकार के औद्योगिक कर मिला कर 7 प्रतिशत से ज्यादा न हों, मुक्त व्यापार क्षेत्र सुविधाएं आदि। जोन में जो फर्मे 10,000 मजदूरों को काम देने का आयोजन करें उन्हें 5 साल तक कारपोरेट टैक्स में छूट दी जाय और जो 20,000 मजदूर रखें उन्हें यह छूट 6 वर्ष तक दी जाय। 

    पर सैकड़ों वर्ग किमी. में फैले जोन में उत्पादन के प्लांट कौन लगायगा? फिर चीन। कहा गया है कि एक समय चीन में मजदूरी कम थी तो तरह-तरह की विदेशी व बहुराष्ट्रीय कम्पनियां चीन में आयीं - जैसे शेनजेन। अब चीन में भी मजदूरी बढ़ रही है तथा इससे यहां विभिन्न कम्पनियों को अन्तर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में बने रहना मुश्किल हो रहा है। ऐसे में यदि भारत में जहां अत्यल्प मजदूरी पर जवानी उपलब्ध है, सुविधानुसार ये कम्पनियां यहां आयेगी और अच्छे वेतन पर नौकरियों का सृजन हो सकेगा। निश्चित ही श्रम नियमों में उदारीकरण की विस्तृत बातें की गयी हैं। कहा गया है कि ‘फिक्स्ड टर्म इम्प्लायमेंट’ मान्य किया जाय तथा स्टार्ट अप की परिभाषा बदली जाये। फिक्स्ड टर्म इम्प्लायमेन्ट मान्य होने के चलते मालिकों को ठेके पर मजदूर नहीं रखने पड़ेंगे। मजदूरों को छंटनी करने की स्वीकृति केन्द्र/राज्य सरकारें दें। बस छंटनी पर मजदूर को प्रति कार्य वर्ष के लिए 60 दिन की मजदूरी अदा की जाय। 

    इस दिशा में तीन वर्षीय एक्शन प्लान और भी विस्तार में गया है तथा व्यापक ‘एक्शन’ लिए जाना प्रस्तावित है। ध्यान देने की बात यह है कि इस सबमें नया क्या है? कुछ भी नहीं। इस तरह की कार्यवाहियां और चर्चे नयी आर्थिक नीतियों के लागू होने के साथ ही शुरू हो गये थे। यह भी कि कुल मिलाकर पूंजी देवी (विशेषकर विदेशी- अथवा ‘देशी’ जो अब विदेशी कारोबार भी कर रही है) की आरती उतारी गयी है। देश में आइये। यहां सभी प्रकार की सुविधाएं हैं और अत्यल्प मजदूरी भी। यह सब उदारीकरण-वैश्वीकरण-निजीकरण की राह पर और आगे बढ़ना ही है। 

    कुल मिलाकर नीति आयोग का यह तीन वर्षीय एक्शन प्लान पूंजी व मुनाफा अक्षुण्ण रखने व लगातार वृद्धि के लिए समर्पित विद्वानों/विशेषज्ञों द्वारा प्रस्तुत किया गया है तथा यदि यह लागू हुआ तो पूंजी व उसके मुनाफे में ही बढ़ोत्तरी होगी। देश के बदहाल गरीब किसानों, बेरोजगारों व गरीबों, मजदूरों को कुछ राहत पाने के लिए भी संगठित होना और संघर्ष करना होगा।

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