अंक : 01-15 Sep, 2017 (Year 20, Issue 17)

भारत सरकार के शासनादेश के अनुसार ई.एस.आई. लागू करो


Print Friendly and PDF

    पन्तनगर/भारत सरकार के शासनादेश के अनुसार पिछले एक जून 2016 से पन्तनगर में ई.एस.आई.(कर्मचारी राज्य बीमा) लागू है पर पिछले 10-15 वर्षों से लगातार अति अल्प न्यूनतम वेतन पर कार्यरत  2500 ठेका मजदूरों को आज तक वि.वि. द्वारा ई.एस.आई. का लाभ नहीं दिया गया। हारी-बीमारी में अनेकों कष्ट सहते हुए ठेकाकर्मी काम करते रहते हैं। निर्धनता के कारण अपने परिवार का इलाज नहीं करा पाते, इन्हें शासन प्रशासन द्वारा कोई आर्थिक मदद नहीं दी जाती, श्रम नियमों द्वारा देय सुविधाओं से वंचित मजदूरों का कोई बीमा भी नहीं है। तमाम हादसे हो चुके हैं, कई ठेका मजदूर दुर्घटनाग्रस्त हुए, उनके आश्रितों की कैंसर जैसी गंभीर बीमारी में इलाज के अभाव में मौतें हो चुकी हैं।

    उदाहरण स्वरूप ठेका मजदूर मनोज की मां श्रीमती कृष्णवती की कैंसर से मौत, दुर्घटना में गौतम की टांग कटी, किशन और फेजुद्दीन की इलाज के अभाव में मृत्यु, निर्मल भगत के आश्रित आग से जले, विरेन्द्र और अशोक, कैंसर से पीड़ित इलाज के अभाव में जिन्दगी और मौत के बीच झूल रहे हैं। हरीश की चैफ कटर पर चारा काटते समय ड्यूटी में दाहिने हाथ की तीनों अंगुलियां कट गईं। आज तक इलाज हेतु कोई मुआवजा नहीं मिला। घायलों को इलाज-मुआवजा, मृतक आश्रितों को स्थाई नौकरी मिलना तो दूर की बात है उल्टा परिवार के पालन-पोषण के लिए मृतक आश्रित ठेका, दिहाड़ी पर अधिकारियों से काम मांगने, दर-दर ठोकरें खाने को मजबूर हैं। ठेका मजदूर कल्याण समिति द्वारा शासन प्रशासन के अधिकारियों, मंत्रियों, मुख्यमंत्री, विधायक, प्रधानमंत्री से बार-बार ई.एस.आई. लागू करने, घायलों, कैंसर पीड़िता के इलाज के लिए आर्थिक मदद देने की गुजारिश की थी। कहीं से कोई मदद नहीं मिली। पर न्याय पसंद जनता, बुद्धिजीवी, ठेका मजदूरों ने ठेका मजदूर कल्याण समिति के कार्यकर्ताओं के जरिये भाई चारा के दृष्टिकोण से आर्थिक सहयोग देकर कैंसर पीड़िता की मदद की थी जो सराहनीय है। 

    अभी, पिछले दिनों ट्रेड यूनियन संयुक्त मोर्चा द्वारा 19 सूत्रीय मांगों को लेकर तीन माह आन्दोलन करने के बावजूद ई.एस.आई. लागू नहीं की गई। वि.वि. प्रशासन द्वारा तमाम अड़चनें लगाई गयीं जिनका कानूनी निपटारा किया गया। ई.एस.आई. विभाग द्वारा पन्तनगर वि.वि. को सीधे निर्देश लिखा भी जा चुका हे कि ‘‘पन्तनगर विश्वविद्यालय में कर्मचारी राज्य बीमा योजना को पंजीकृत किया जाना अनिवार्य है’’। ई.एस.आई. इंसपेक्टर द्वारा अधिकारियों से वार्ता के बावजूद ई.एस.आई. लागू नहीं की गई। अब जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा कहा जा रहा है कि ई.एस.आई. लागू करने में मासिक अंशदान देने को प्रशासन के पास धन नहीं है जबकि विश्वविद्यालय में ठेकेदार न तो मजदूरों की भर्ती करता है, न निकालता है, न हाजिरी, सुपरवीजन करता है। यह सब काम विश्वविद्यालय प्रशासन करता है। वि.वि. प्रशासन निरर्थक ही ठेकेदार को सर्विस चार्ज के नाम पर छः-सात लाख रुपये महीना भुगतान कर रहा है। सरकारी धन की लूट कई करोड़ की हो चुकी है जो वर्ष 2003 से जारी है। 

    उधर मोदी सरकार मजदूर वर्ग के शोषण, उत्पीड़न को और ज्यादा तीखा करके पूंजीपति वर्ग के मुनाफे को बढ़ाने पर तुली है। 

शासन-प्रशासन की मजदूर विरोधी नीति हठधर्मिता के खिलाफ विगत तीन माह चले आन्दोलन में ठेका मजदूरों की भूमिका निर्णायक रही। धरना-प्रदर्शन हो, अधिकारियों के कार्यालयों, घरों का घेराव हो या स्थानीय विभागों में नारेबाजी, कोहरे की ठंड हो, बारिश या मई-जून की धूप हो, पुलिस प्रशासन से मोर्चा लेने में ठेका मजदूरों, महिला मजदूरों ने आगे बढ़कर हमेशा मोर्चा संभाला। प्रशासन द्वारा मांगों पर हीला-हवाली करने पर उन्होंने आन्दोलन को उग्र करने, हड़ताल करने की मांग बुलन्द की थी पर समौझता परस्त यूनियनों द्वारा आन्दोलन उग्र कर हड़ताल नहीं की गई जिसका असर मांगों पर पड़ा। और जो ज्यादा हासिल हो सकता था वह नहीं हुआ। वि.वि. परियोजनाओं में तीस-चालीस वर्षों से लगातार कार्यरत नियमित कर्मियों की शासन-प्रशासन द्वारा बन्द पेंशन की बहाली, ठेका मजदूरों पर लगे फर्जी मुकदमों की समाप्ति, शासनादेश के अनुसार उपनल के समान मजदूरी आदि लागू नहीं हुए और न ही वर्ष 2003 से पूर्व से लगातार कार्यरत कर्मियों को सहमति के बावजूद ठेका प्रथा से हटा कर संविदा पर ही रखा गया। इतना ही नहीं, आन्दोलन पूंजीपरस्त पार्टियों, नेताओं, मंत्रियों की दया पर इतना निर्भर था कि प्रशासन की हठधर्मिता के खिलाफ आन्दोलन उग्र करने की मजदूरों की मांग कर रही ठेका मजदूर कल्याण समिति को ही इन समझौता परस्त यूनियनों ने आन्दोलन से बाहर कर दिया। इस मौके पर ठेका मजदूरों द्वारा अपने संगठन ठेका मजदूर कल्याण समिति की तरफ से यूनियनों को चुनौती दी जानी चाहिए थी जो नहीं दी जा सकी। फिर भी ठेका मजदूरों ने अपने आन्दोलन के दम पर शासन-प्रशासन को सटल पर बैठने, 12 प्रतिशत मजदूरी में बढ़ोत्तरी के आदेश को लागू करने को बाध्य किया।

असल में राजनीतिक चुनावबाज पूंजीवादी पार्टियों की पिछलग्गू ट्रेड यूनियन सेन्टरों की वजह से मजदूर आन्दोलन कमजोर पड़ा हुआ है। पूरे देश में ठेका प्रथा चरम पर है। सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थानों में ठेका प्रथा के तहत मजदूरों का निर्मम शोषण किया जा रहा है। आज यूनियनें संघर्ष के बजाय पार्टियों, मंत्रियों, नेताओं की दया पर मांगें हासिल करना चाहती हैं। 

पन्तनगर वि.वि. के मजदूरों का जुझारू संघर्ष का इतिहास रहा है। अप्रैल 1978 में मजदूरों ने अपने नारकीय शोषण के खिलाफ संघर्ष में अपने 14 साथियों के बलिदान के बाद स्थाई नियुक्ति एवं श्रम नियमों का पालन, सुविधाओं आदि का अधिकार प्राप्त किया था। परन्तु दुर्भाग्य रहा कि वि.वि. में कई यूनियनों की उपस्थिति के बावजूद वर्ष 2003 में ठेका प्रथा लागू करके शासन-प्रशासन ने हजारों मजदूरां को श्रम कानूनों से वंचित कर नारकीय जीवन जीने को मजबूर कर दिया। ये वही एटक, इंटक व बीएमएस की यूनियनें हैं जिन्होंने वर्ष 2003 में ठेका प्रथा का विरोध नहीं किया, आज तक ये ठेका मजदूरों के शोषण, उत्पीड़न पर चुप रहे। आज सेवा निवृत्त होकर घर जाते नियमित कर्मियों की वजह से कमजोर होती यूनियनों को स्थायीकर्मियों की सुविधाओं, अधिकारों की रक्षा करना, अपना अस्तित्व बचाना, बिना ठेका मजदूरों को आन्दोलन में शामिल किये सम्भव नहीं है। इसीलिए ठेका मजदूरों की मांग उठाना उनकी मजबूरी बन गई है। 

ठेका प्रथा लागू होने के बाद भी पन्तनगर के ठेका मजदूरों ने हमेशा अपने शोषण, उत्पीड़न, शासन-प्रशासन की अनदेखी के खिलाफ संघर्ष किया है। मांगें हासिल की हैं। ठेका मजदूर कल्याण समिति के नेतृत्व में अपने संघर्षों में तमाम सभा, धरना-प्रदर्शन, रैलियों के बदौलत शासन-प्रशासन को वर्ष 2013 में न्यूनतम वेतन पुनरिक्षित वेतन का आदेश जारी करना पड़ा, हर छः माह में महंगाई भत्ता, ई.एस.आई. विभाग से सरकार द्वारा पन्तनगर में दो बार सर्वे कराकर सरकार को 30 मई, 2016, को 01 जून, 2016 से जिला ऊधम सिंह नगर सहित पन्तनगर में ई.एस.आई. लागू करने का शासनादेश जारी करना पड़ा। अभी विगत तीन माह चले आन्दोलन के दम पर कुछ हद तक उक्त सुविधाओं का आदेश करने को बाध्य किया गया व आंशिक जीत हासिल की। और प्रशासन द्वारा अचानक करीब 200 काम से निकाले गये ठेका मजदूरों को संघर्ष के दबाव में काम पर वापस लेना पड़ा परन्तु अभी भी वि.वि. प्रशासन द्वारा ठेका मजदूरों को निकालना व बैठाना जारी है। काम की कोई सुरक्षा नहीं है। 

अभी नौकरी की सुरक्षा और पन्तनगर में भारत सरकार द्वारा जारी शासनादेश लागू कराकर ई.एस.आई. सुविधा हासिल किया जाना, आवास, अवकाश सुविधा, शोषणकारी ठेका प्रथा का खात्मा, करने जैसी मांगें बाकी हैं। यह तभी हासिल हो सकती हैं जब ठेका मजदूर समझौता परस्त यूनियनों के पिछलग्गू बनने के बजाय अपने संगठन ठेका मजदूर कल्याण समिति के दम पर संघर्ष करें। 

    पन्तनगर संवाददाता

Labels: रिपोर्ट


घोषणा

‘नागरिक’ में आप कैसे सहयोग कर सकते हैं?
-समाचार, लेख, फीचर, व्यंग्य, कविता आदि भेज कर क्लिक करें।

अन्य महत्वपूर्ण लिंक्स


हमें जॉइन करे अन्य कम्यूनिटि साइट्स में

घोषणा

‘नागरिक’ में आप कैसे सहयोग कर सकते हैं?
-समाचार, लेख, फीचर, व्यंग्य, कविता आदि भेज कर
-फैक्टरी में घटने वाली घटनाओं की रिपोर्ट भेज कर
-मजदूरों व अन्य नागरिकों के कार्य व जीवन परिस्थितियों पर फीचर भेजकर
-अपने अनुभवों से सम्बंधित पत्र भेज कर
-विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, बेबसाइट आदि से महत्वपूर्ण सामग्री भेज कर
-नागरिक में छपे लेखों पर प्रतिक्रिया व बेबाक आलोचना कर
-वार्षिक ग्राहक बनकर

पत्र व सभी सामग्री भेजने के लिए
सम्पादक
'नागरिक'
पोस्ट बाक्स न.-6
ई-मेल- nagriknews@gmail.com
बेबसाइट- www.enagrik.com
वितरण संबंधी जानकारी के लिए
मोबाइल न.-7500714375