अंक : 01-15 Jan, 2018 (Year 21, Issue 01)

गुजरात माडल सही-सलामत है


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    गुजरात विधान सभा के चुनाव परिणाम आने के बाद मोदी के भांति-भांति के विरोधियों को खुश होने का एक दुर्लभ अवसर हासिल हो गया। हालांकि मोदी-शाह की जोड़ी यह चुनाव जीत गई पर सीटों के मामले में कांग्रेस पार्टी ने इसे कड़ी टक्कर दी। छठी बार चुनाव जीतने वाली भाजपा ने इस बार सबसे कम सीटें जीतीं जबकि कांगे्रस ने सब से ज्यादा। मोदी-शाह के अच्छे दिनों में और कांग्रेस-राहुल के बुरे दिनों में क्या यह कम था।

    खुश होने के अवसर जब बहुत कम हों तो खुश होने का कोई भी बहाना कारगर होता है। और कांग्रेस व मोदी विरोधियों के लिये तो यह वास्तव में कोई जश्न मनाने जैसी चीज दिख रही थी। क्या हुआ जो मोदी-शाह की जोड़ी वास्तव में जीत गई थी?

    सच तो यह है कि मोदी-शाह न केवल गुजरात चुनाव जीते बल्कि उनका गुजरात माडल एकदम सही-सलामत है। वह इस हद तक है कि राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी जुबानी तौर पर भी उसके खिलाफ नहीं जा पाये।

    गुजरात माॅडल के दो स्तम्भ हैं। एक है हिन्दू आधिपत्य और दूसरा बड़े पूंजीपति वर्ग की बेलगाम लूट। यह दोनों ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के बुनियादी लक्ष्य रहे हैं। इसलिये यदि गुजरात को हिन्दुत्व की प्रयोगशाला कहा गया है तो वह गलत नहीं है।

    मोदी-शाह की जोड़ी ने पिछले तीन-चार दशकों में इसे ही गुजरात में हासिल किया है। गुजरात में आज मुसलमान (आबादी का दस प्रतिशत) दोयम दर्जे के नागरिक बनाये जा चुके हैं। 2002 के नरसंहार ने इसे तय कर दिया। जहां तक बड़े पूंजीपति वर्ग की बात है, मोदी ने उनके ऊपर पूरा गुजरात न्यौछावर कर दिया। वह इस हद तक हुआ कि इस वर्ग ने 2010 के बाद घोषित कर दिया कि मोदी को ही प्रधानमंत्री बनना चाहिये। वही हुआ भी।

    इस चुनाव ने इस माॅडल के बारे में क्या दिखाया?

    इस चुनाव ने दिखाया कि राहुल गांधी मंदिर दर मंदिर माथा टेक रहे हैं और उनके समर्थक उन्हें जनेऊधारी, शिव भक्त बता रहे हैं। कांगे्रस की हिम्मत नहीं पड़ी कि वह मुसलमानों की आबादी के अनुपात में मुसलमान उम्मीदवार खड़ा करें। पूरे चुनाव के दौरान कांग्रेस पार्टी गुजरात में मुसलमानों की स्थिति पर चुप्पी साधे रही। भूले से भी 2002 के नरसंहार का जिक्र नहीं किया गया। यह तब जब मोदी-शाह के भक्त खुलेआम प्रचार कर रहे थे कि कांग्रेस के जीतने के बाद 2002 के पहले वाली स्थिति बहाल हो जायेगी।

    यह मोदी-शाह के गुजरात माॅडल की सबसे बड़ी जीत थी क्योंकि विपक्षी ने इसे अपना लिया। उसने इसके सामने आत्मसमर्पण कर दिया। मोदी-शाह की सरकार के ढाइवें सदस्य ने ठीक ही तंज कसा था कि जब असली हिन्दुत्व की पार्टी मौजूद है तो नकली की क्या जरूरत है?

    मोदी-शाह के गुजरात माॅडल के दूसरे स्तम्भ पर जरूर राहुल-कांग्रेस ने कुछ हमले किये पर इस मामले में उनका अपना रिकार्ड बहुत खराब है। 1991 से कांग्रेस जिस नीति पर चल रही है उसे ही तो मोदी ने चरम पर पहुंचाया है। भाजपा ने 1991 में कांग्रेस पर यूं ही यह आरोप नहीं लगाया था कि उसने उसकी आर्थिक नीतियां चुरा ली हैं। ऐसे में राहुल-कांग्रेस की बातें ‘चुनावी-जुमला’ से ज्यादा क्या मायने रखती थीं?

    पार्टियों के इस स्तर से अलग अन्य स्तर पर भी जो देखने को मिला वह इस बात की तस्दीक करता है कि मोदी का गुजरात माॅडल सही-सलामत है। भाजपा को इस बार 2012 के चुनावों से 1 प्रतिशत ज्यादा मत मिले। यह अपने-आप में बहुत कुछ कह जाता है। भाजपा ने शहरों में अपना आधार बनाये रखा। यह भी बहुत अर्थपूर्ण है।

    गुजरात के शहरों से लगातार रिपोर्ट आ रही थी कि वहां छोटे-मोेटे व्यवसायी नोटबंदी और जी.एस.टी. से बुरी तरह प्रभावित हैं। वे सड़कों पर उतरकर आंदोलनरत भी थे। पर जब चुनाव का समय आया तो वे पुनः भाजपा के साथ। उन्होंने अपनी आर्थिक तबाही के बावजूद भाजपा को ही अपनी पार्टी घोषित किया। उनके बल पर भाजपा सत्ता में आने में कामयाब रही।

    शहरों-कस्बों का छोटा-मोटा व्यवसायी हमेशा से ही संघ का सबसे प्रमुख समर्थक रहा है। सारी दुनिया में ही यह फासीवाद का प्रमुख आधार रहा है। गुजरात के इस चुनाव ने दिखाया कि आबादी के इस हिस्से की हिन्दू फासीवादी मानसिकता में वहां कोई कमी नहीं आयी है। और जब तक ऐसा है तब तक मोदी-शाह जैसी फासीवादी हस्तियां फल-फूल सकती हैं। यहां गुजरात माॅडल गहराई से बैठा हुआ है।

    गुजरात माॅडल यदि दरका तो आबादी के उन हिस्सों में जो या तो हिन्दू फासीवाद की गिरफ्त में नहीं थे या जहां गिरफ्त ढीली थी। ये आबादी के मजदूर-मेहनतकश हिस्से ही हो सकते हैं। राहुल के जिन तीन तिलंगों की चर्चा है वे आबादी के इन्हीं हिस्सों के असंतोष को अभिव्यक्त कर रहे हैं।

    और यहीं से वास्तव में गुजरात और पूरे देश में हिन्दू फासीवाद को चुनौती की संभावना पैदा होती है। केवल मजदूर वर्ग ही अपने पीछे तबाह हाल किसानों को गोलबंद कर हिन्दू फासीवाद को चुनौती दे सकता है। मोदी-शाह जैसे लोगों को ध्वस्त कर सकता है।

    इसे अस्वीकार कर जो लोग पूंजीवादी पार्टियों की किसी तीन-तिकड़म में हिन्दू फासीवाद का मुकाबला देखते हैं, वे ही वर्तमान चुनाव परिणाम से खुश हो सकते हैं। वे ही यह भ्रम पाल सकते हैं कि इस चुनाव में गुजरात माॅडल को चुनौती मिली। असल में वह सही-सलामत है और मोदी के अपने शब्दों में यह उन्नीस प्रदेशों तक फैल चुका है।

Labels: राष्ट्रीय


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