अंक : 01-15 Jan, 2018 (Year 21, Issue 01)

जिम्बाब्वे में तख्तापलट और साम्राज्यवादी ताकतें


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    नवम्बर, 2017 में जिम्बाब्वे के राष्ट्रपति राबर्ट मुगाबे की सरकार को गिराकर सेना ने म्नांगाग्वा को सत्ताशीन करने में निर्णायक भूमिका निभायी। ऊपरी तौर पर देखने से यह लगता है कि यह जिम्बाब्वे की सत्ताधारी पार्टी के अंदरूनी संघर्ष का परिणाम था। यह सही है कि जिम्बाब्वे की सत्ताधारी पार्टी जिम्बाब्वे अफ्रीकन नेशनल यूनियन पैट्रिआटिक फ्रण्ट (ZANU-PF) के भीतर गुटीय विवाद पिछले तीन वर्ष से चल रहा था। दिसम्बर, 2014 में पूर्व उपराष्ट्रपति जोइस मुजुरू और उनके समर्थकों को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था। इस निष्कासन के बाद जानू-पी.एफ. के अंदर आपसी टकराहटें बढ़ गयीं थीं। इस गुटीय संघर्ष में एक तरफ तो मौजूदा राष्ट्रपति म्नांगाग्वा के समर्थक थे और दूसरी तरफ राष्ट्रपति मुगाबे की पत्नी ग्रेस मुगाबे के समर्थक थे। लेकिन इस गुटीय संघर्ष को संयुक्त राज्य अमरीका और ब्रिटेन जैसी साम्राज्यवादी ताकतों से बढ़ावा मिल रहा था। इन साम्राज्यवादी ताकतों के दबाव ने राष्ट्रपति मुगाबे से इस्तीफा लेने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। यह अकारण नहीं है कि 21 नवम्बर को वॉइस ऑफ अमेरिका ने यह बताया कि संयुक्त राज्य अमेरिका के विदेश विभाग ने नई सरकार के सामने जिम्बाब्वे पर लगे प्रतिबंधों को हटाने के लिए शर्तें पेश कर दी हैं। 

    यह मालूम हो कि जब राबर्ट मुगाबे की सरकार ने 2000 में ब्रिटिश बाशिंदों की जमीनें जब्त कर ली थीं, उस समय कई साम्राज्यवादी देशों ने जिम्बाब्वे के ऊपर प्रतिबंध लगा दिये थे। अब जब राबर्ट मुगाबे की सरकार सत्ताच्युत कर दी गयी है तब प्रतिबंधों को समाप्त कराने के लिए नयी सरकार के अधिकारियों द्वारा बातें की जा रही हैं। इन प्रतिबंधों को समाप्त करने के लिए जब्त की गयी जमीनों की क्षतिपूर्ति देने की बातें की जाने लगी हैं। साम्राज्यवादी प्रतिबंधों के कारण जिम्बाब्वे की आर्थिक परेशानियों में होने वाले इजाफे ने भी सत्ताधारी पार्टी के भीतर गुटीय संघर्ष को तेज कर दिया था। 

    जानू-पी.एफ. के भीतर गुटीय संघर्ष में एक तरफ ग्रेसी मुगाबे के नेतृत्व में जनरेशन 40 नाम का गुट था और दूसरी तरफ इमर्सन म्नांगाग्वा के नेतृत्व में मुक्ति संघर्ष के पुराने योद्धाओं का गुट था। राष्ट्रपति मुगाबे 93 वर्ष के हो चुके थे। म्नांगाग्वा उप राष्ट्रपति थे। राष्ट्रपति ने उपराष्ट्रपति म्नांगाग्वा को निकाल दिया। इसके जवाब में म्नांगाग्वा ने रक्षा कमाण्डर म्नांगाग्वा को निकाल दिया। इसके जवाब में म्नांगाग्वा ने रक्षा कमाण्डर चिवेंगा के साथ मिलकर राष्ट्रपति को नजरबंद कर लिया। जनरेशन 40 के लोगों पर पाबंदी लगा दी। सरकार के विभिन्न हिस्सों पर कब्जा कर लिया। पड़ोसी देशों खासकर दक्षिण अफ्रीका के शासकों ने समझौता कराके राबर्ट मुगाबे को इस्तीफा देने के लिए बाध्य कर दिया। म्नांगाग्वा को कार्यवाहक राष्ट्रपति बना दिया गया। 

    राष्ट्रपति राबर्ट मुगाबे जिम्बाब्वे की स्वाधीनता के समय 1980 में वहां के प्रधानमंत्री बने थे। वे जिम्बाब्वे के मुक्ति आंदोलन के नेता रहे हैं। वे अल्पसंख्यक गोरी सरकार के समय दस वर्ष तक जेल में थे। उस समय जिम्बाब्वे को रोडेशिया कहा जाता था। वे पांच वर्ष तक प्रधानमंत्री रहे। 1985 में वे राष्ट्रपति बने। जानू और जापू (ZANU & ZAPU) का विलय होने के बाद जिम्बाब्वे की शुरुवाती अस्थिरता का दौर खत्म हो गया। जापू के साथ जानू के समझौते को उस समय एक मॉडल के तौर पर पेश किया गया था। 

    राबर्ट मुगाबे साम्राज्यवादियों की आंख की किरकिरी उस समय बन गये जब 2000 में उन्होंने जमीन पुनर्दावा कार्यक्रम शुरू किया। 2000 से पहले गोरे लोग अधिकांश जमीनों के मालिक थे। साम्राज्यवादियों ने जिम्बाब्वे पर प्रतिबंध लगा दिये। इससे आर्थिक वृद्धि और विकास प्रभावित हुआ। इसी के आस-पास एक नयी राजनीतिक पार्टी ‘‘जनतांत्रिक परिवर्तनों के लिए आंदोलन’’ (Movement for Democratic Change) का गठन हुआ था। इस पार्टी को और कुछ अन्य समूहों को साम्राज्यवादी देशों से मदद मिल रही थी। लेकिन साम्राज्यवादी इन चालों से सफल नहीं हुए। 

    साम्राज्यवादी देश विशेष तौर पर अमरीकी और ब्रिटिश साम्राज्यवादी राबर्ट मुगाबे को तानाशाह के बतौर पेश करते थे। दुनिया भर का साम्राज्यवादी मीडिया उनको दानव के बतौर चित्रित करता रहा है। जबकि हकीकत यह है कि राबर्ट मुगाबे साम्राज्यवाद विरोधी नेता के बतौर रहे हैं। 

    लेकिन जब से राबर्ट मुगाबे की सरकार ने गोरे अल्पसंख्यकों की जमीनों पर कब्जा करके उसे व्यापक आबादी के बीच वितरित किया था, तब से साम्राज्यवादी सरकारों ने जिम्बाब्वे पर प्रतिबंध लगा दिये थे। संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ द्वारा लगाये गये प्रतिबंधों से जिम्बाब्वे का विकास बाधित हुआ। 2008 के बाद वैश्विक राजनीतिक समझौता और मिली जुली सरकार के बारे में सहमति के बावजूद साम्राज्यवादी प्रतिबंध जारी रहे। 2008-2013 तक जिम्बाब्वे में मिली जुली सरकार थी।

    इससे यह स्पष्ट जाहिर होता है कि जिम्बाब्वे के विरुद्ध साम्राज्यवादी प्रतिबंधों का लक्ष्य या तो वहां की सरकार को गिरा देना रहा है या उस सरकार की घरेलू व विदेश नीति में साम्राज्यवाद-परस्त परिवर्तन कराना रहा है। इसी दौरान समूचे अफ्रीका के दक्षिणी हिस्से में सबसे बुरा सूखा पड़ा था। इसने जिम्बाब्वे की स्थिति को और भी ज्यादा भयावह कर दिया। इसके साथ ही इसी दौरान अमरीकी साम्राज्यवादियों की नीतियों की वजह से मालों की कीमतों में भारी गिरावट दर्ज की गयी। 

    जिम्बाब्वे के पास हीरों और प्लेटिनम का भण्डार है। साम्राज्यवाद की निगाह इन भण्डारों पर है। साम्राज्यवादी इस विपुल प्राकृतिक सम्पदा पर तब तक नियंत्रण स्थापित नहीं कर सकते जब तक उनके हितों को साधने वाली सरकार न हो। 

    राबर्ट मुगाबे व अन्य साम्राज्यवाद-विरोधी सत्ताओं की प्रगतिशीलता तभी तक बनी रह सकती थी जब तक उन्हें साम्राज्यवाद के विरुद्ध प्रत्यक्ष संघर्ष करना था। एक बार सत्ता में आने के बाद वे खुद पूंजीवादी शासक वर्ग बन गये। राबर्ट मुगाबे की सत्ता हो या अन्य किसी भी अफ्रीकी देश की साम्राज्यवाद विरोधी कोई सत्ता हो, वे सभी पूंजीवादी सत्तायें हैं। इस अर्थ में वे विश्व पूंजीवादी व्यवस्था के अभिन्न अंग के बतौर हैं। ऐसी सत्ताओं के अंतर्गत कुप्रबंधन, धोखाधड़ी, लूट और भ्रष्टाचार का पनपना स्वाभाविक है। साम्राज्यवादी देश इनका इस्तेमाल अपने पक्ष में न काम करने वाली किसी भी सरकार को बदनाम करने के लिए करते हैं और आर्थिक प्रतिबंधों के चलते और ज्यादा तबाही ले आकर या तो सरकार को बदल डालते हैं या उसे घुटने टेकने के लिए मजबूर कर देते हैं। 

    कुछ हलकों में यह कहा जा सकता है या इसका संकेत दिया जा रहा है कि राबर्ट मुगाबे का इस्तीफा दिलाने में या सैनिकों द्वारा की गयी कार्रवाई में चीन के शासकों की भूमिका रही है। यह बात दूर की कौड़ी लगती है। चीन का अफ्रीका के कई देशों में बड़ा निवेश है। जिम्बाब्वे में उसकी पूंजी लगी हुयी है। उसकी पूंजी द्वारा की जा रही लूट का विरोध न तो राबर्ट मुगाबे करते थे और न ही मौजूदा शासक ही करते हैं। चीनी शासक यहां के किसी भी देश में अस्थिरता पैदा कर या बढ़ाकर अपना नुकसान करने के सिवाय और कुछ नहीं कर सकते हैं। अफ्रीकी महाद्वीप में जिम्बाब्वे के साथ-साथ दक्षिण अफ्रीका और मोजाम्बिक में चीन की भारी पूंजी लगी हुयी है और इन देशों में किसी में भी यदि वह गड़बड़ी करता है तो बाकी जगहों पर उसका व्यापार प्रभावित होगा। 

    जिम्बाब्वे के मौजूदा तख्तापलट में जानू-पी.एफ. के भीतर अंदरूनी कलह की भूमिका रही है और इस अंदरूनी कलह की आग में घी देने का काम साम्राज्यवादियों ने विशेष तौर पर अमेरिकी और ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने किया है। क्योंकि सभी साम्राज्यवादी देशों जिन्होंने जिम्बाब्वे की मौजूदा आर्थिक तबाही लाने में योगदान किया था। वे अब आर्थिक पुनरुद्धार में मदद करने का वायदा कर रहे हैं और वहां अपने संदेशवाहक भेज रहे हैं। बदले में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक के पास जिम्बाब्वे का नया नेतृत्व सम्पर्क साध रहा है। ये वही संस्थायें हैं जो पिछड़े हुए गरीब देशों में आर्थिक ढांचागत समायोजन कार्यक्रम थोपती रही हैं। ये कार्यक्रम बहुराष्ट्रीय निगमों के स्वार्थों को पूरा करने के लिए उन देशों को मजबूर करते हैं। वे सार्वजनिक वस्तुओं एवं सेवाओं के निजीकरण, विनियमन, मजदूरी में कटौती और ऐसी तमाम बातों के लिए मजबूर करते हैं जो इन देशों के मजदूर-मेहनतकश विरोधी हैं। 

    साम्राज्यवाद कोई सांता क्लॉज नहीं है जो परोपकार करता रहे। साम्राज्यवाद तब तक कोई वायदा नहीं करता जब तक वह इस बात से मुतमइन नहीं हो जाता कि उसके आर्थिक हित सुरक्षित हैं। 

    जिम्बाब्वे की मजदूर-मेहनतकश आबादी की वास्तविक मुक्ति की लड़ाई को खुद उन्हें लड़ना है। जानू-पी.एफ. की अल्पसंख्यक गोरी सरकार को उलटने में भूमिका थी। वह सकारात्मक थी। लेकिन जानू-पी.एफ. एक पूंजीवादी पार्टी है। राबर्ट मुगाबे न तो जिम्बाब्वे के अंदर भ्रष्टाचार रोक सकते थे और न ही मौजूदा शासक। अब जानू-पी.एफ. की समाज को आगे बढ़ाने में कोई सकारात्मक भूमिका नहीं है। अब यह साम्राज्यवाद के साथ किसी न किसी तरह के समझौते करके ही अपनी सत्ता चला सकती है। 

    जिम्बाब्वे की मजदूर-मेहनतकश आबादी जितनी जल्दी यह बात समझ जायेगी उतनी ही जल्दी वह एक स्वतंत्र शक्ति के बतौर खड़ा होने में अपनी भूमिका निभा सकेगी।  

Labels: अन्तराष्ट्रीय


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