अंक : 01-15 Jan, 2018 (Year 21, Issue 01)

हार की जीत


उ.प्र. निकाय चुनाव


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    2 दिसम्बर 2017 को देश के सभी अखबारों-टी.वी. चैनलों ने खबर प्रसारित की कि भाजपा को उ.प्र. के निकाय चुनावों में भारी विजय मिली है। कि उ.प्र. के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपनी पहली परीक्षा में प्रथम श्रेणी में पास हो गये हैं। कि इस चुनाव में जीत से उ.प्र. की जनता ने नोटबंदी के बाद जी एस टी पर भी मुहर लगा दी है कि इस जीत से भाजपा को गुजरात चुनाव जीतने में भी मदद मिलेगी।

    भाजपा की जीत के इस प्रचार की कुछ और चर्चित पंक्तियां थीं कि 16 मेयर पदों में 14 में भाजपा की जीत, अमेठी में कांग्रेस का सफाया। ये दोनों बातें ठीक हैं पर मीडिया ने इससे आगे बढ़कर भाजपा की जीत की असलियत की तह में जाने का प्रयास नहीं किया। क्योंकि तह में जाने पर पता चलता कि वास्तव में यह जीत नहीं हार है। भाजपा विधानसभा चुनावों की तुलना में काफी पीछे चली गयी है। दरअसल अखबारों-चैनलों को इस सच्चाई का पता था पर मोदी मय मीडिया इस सच्चाई को सामने नहीं लाना चाहता था वह गुजरात चुनावों में मोदी को हर कीमत पर जीत दिलाना चाहता था। इसीलिये उसने अर्द्धसत्य का प्रसारण कर भाजपा की जीत का ढिंढोरा पीट डाला। भाजपा यही चाहती थी वह हार में भी जीत स्थापित कर कांग्रेस को घेरना चाहती थी।

    भाजपा को इन चुनावों में महज 18.7 प्रतिशत सीटें हासिल हुई। शहरों में भाजपा का पुराना आधार रहा है। ऐसे में मेयर की सीटें जीतना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी। नगर निगम पार्षदों की 596 सीटें भाजपा ने जीती जबकि 703 सीटें विपक्षियों ने जीती जिनमें 202 सपा व 147 बसपा ने जीतीं।

    नगरपालिका परिषद के चेयरमैन पद पर भाजपा 70 सीटें जीतने में सफल रही जबकि 128 सीटों पर उसे हार झेलनी पड़ी। सपा 45 व बसपा 29 चेयरमैन सीटें जीतने में सफल रही। नगरपालिका पार्षदों में भाजपा 922 सीटें जीतने में सफल रही वहीं निर्दलियों ने 3380 सीटें जीती। सपा 477 सीटें व बसपा 262 सीटें जीतने में सफल रही।

    नगर पंचायत प्रमुख पद पर 182 निर्दलीय, 100 भाजपा के प्रत्याशी, 83 सपा के व 45 बसपा के प्रत्याशी जीते। नगर पंचायत सदस्यों में निर्दलीय 3875 सीटें, भाजपा 664 सीटें व सपा 453 सीटें जीतने में सफल रहे। 

    इन चुनावों में भाजपा ने 12644 सीटों में से 8038 पर अपने उम्मीदवार खड़े किये थे इनमें से 2366 सीटों पर उसे जीत मिली व उसके 3656 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गयी।

    दरअसल इन चुनावों में निर्दलीय 61 प्रतिशत सीटें जीतने में सफल रहे। अभी तक अमूमन ज्यादातर नगर निकायों में पार्टी सिम्बल पर चुनाव नहीं लड़ा जाता था। इस बार अिधकतर दलों ने अपने सिम्बल पर चुनाव लड़ा और निर्दलीय प्रत्याशी सबसे ज्यादा जीते। 

    यह सम्भव है कि हर बार की तरह जीते हुये निर्दलीय चेयरमैन व नगर पंचायत प्रमुख सत्ताधारी पार्टी के पाले में चले आयें। पर यह भी सच है कि ढेरों जगहों पर चुनाव में भाजपा को पटखनी खानी पड़ी। वह सपा, बसपा से काफी आगे रही पर आगे रहने का अन्तर लोकसभा, विधानसभा चुनावों से काफी कम था। इस तरह से ये चुनाव भाजपा की अभूतपूर्व जीत को कहीं से नहीं दिखाते हैं जैसा की पूंजीवादी मीडिया प्रचारित कर रहा था।

    दरअसल यह प्रचार गुजरात चुनाव में भाजपा को फायदा पहुंचाने के मकसद से किया गया। यह योगी की भक्ति में भी किया गया। पूंजीवादी मीडिया कितना ‘सच का प्रहरी’ है’ कितना ‘निष्पक्ष’ है यह उदाहरण इसी को दिखाता है।                               -एक पाठक

Labels: मजदूरों के पत्र


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