अंक : 01-15 Jan, 2018 (Year 21, Issue 01)

वर्ष 2017 : मजदूर-किसानों के संघर्षों का एक वर्ष


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    वैसे तो जब से देश आजाद हुआ है तब से एक भी वर्ष ऐसा नहीं गुजरा है जब देश के मजदूरों-किसानों व बाकी मेहनतकशों को अपने हक की आवाज उठाने के लिये सड़कों पर न उतरना पड़ा हो। पर बीते वर्ष में इन संघर्षों की बढ़ती को स्पष्ट तौर पर महसूस किया गया।

    मजदूरों के संघर्ष

0. भारत के सभी प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में बीते वर्ष एक के बाद एक मजदूरों के संघर्ष फूटते रहे। ये संघर्ष वेतन बढ़ोत्तरी, यूनियन बनाने, निकाले साथियों की बहाली आदि मुद्दों पर केन्द्रित रहे। संघर्ष का केन्द्र तमिलनाडु, गुड़गांव- मानेसर-धारूहेड़ा औद्योगिक क्षेत्र रहे।

0. इस वर्ष की शुरूआत में नोटबंदी के खिलाफ भी जगह-जगह मजदूरों का आक्रोश फूटा नोटबंदी की तुगलकी योजना से लाखों मजदूरों को काम से हाथ धोना पड़ा।

0. बीते वर्ष सरकार द्वारा चलायी जा रही विभिन्न स्कीमों आंगनबाड़ी, आशा, भोजन माता विभिन्न सहायकों आदि में कार्यरत महिलाओं-पुरुषों ने वर्ष भर वेतन बढ़ोत्तरी, स्थायीकरण की मांग के साथ अपना संघर्ष जारी रखा। पूरे देश में इनकी तादाद लगभग 1 करोड़ है। गत वर्ष महाराष्ट्र, असम, केरल, आन्ध्र प्रदेश, उत्तराखण्ड, कर्नाटक, हरियाणा, पंजाब, झारखण्ड, बिहार, उड़ीसा, हिमाचल, गुजरात आदि राज्यों में जब तब इनके संघर्ष फूटते रहे। नये वर्ष में भी 17 जनवरी 2018 को इनकी विभिन्न केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फेडरेशनों ने राष्ट्रीय हड़ताल का आह्वान किया है।

0. मोदी सरकार की निजीकरण की नीति के खिलाफ भी सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों का आक्रोश गत वर्ष जगह-जगह फूटा। बीते वर्ष सरकार ने विनिवेशीकरण से लगभग 1.25 लाख करोड़ रु. की आय हासिल की। इससे हजारों मजदूरों के रोजगार को संकट में डाला गया। निजीकरण के कदमों के खिलाफ गत वर्ष सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के मजदूरों का संघर्ष जारी रहा। रक्षा उपकरण उत्पादन के मजदूरों ने जुलाई में 45 दिन की हड़ताल की। कामराजार बंदरगाह (तामिलनाडु) के कर्मचारियों ने अदानी को बंदरगाह बेचे जाने के खिलाफ संघर्ष किया। भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड के कोलार, मैसूर (कर्नाटक) व पालाक्कड (केरल) के मजदूर विनिवेशीकरण के खिलाफ मार्च में हड़ताल पर गये। कोचीन शिपयार्ड के मजदूर 25 प्रतिशत विनिवेशीकरण के खिलाफ हड़ताल पर गये। अप्रैल में दुर्गापुर, सलेम व भद्रावती के स्टील प्लांटों के मजदूर हड़ताल पर गये। हरियाणा में रोडवेज के निजीकरण के खिलाफ हड़ताल हुई। पं. बंगाल की कोयला खदानों में 10 खदानों की बंदी के खिलाफ हड़ताल हुई। उड़ीसा के नाल्को मजदूरों ने निजीकरण के खिलाफ संघर्ष किया। बैंक कर्मचारियों ने 28 फरवरी को एक दिन की राष्ट्रव्यापी हड़ताल की।

0. सरकारी व राज्य कर्मचारियों ने इस वर्ष में सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करने व पेंशन योजना में बदलाव को लेकर संघर्ष किया। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु में नगरपालिका मजदूरों ने कामों को आउटसोर्स करने, ठेका प्रथा लागू करने के खिलाफ हड़ताल की। ग्राम पंचायत मजदूरों ने भी ठेकाकरण के खिलाफ संघर्ष किया।

0. पं.बंगाल के 300 चाय बागानों ने बीते वर्ष बेहतर वेतन के लिये 2 दिन की हड़ताल की। तमिलनाडु में मछुआरों ने समुद्र में आने-जाने की सीमा तय करने के खिलाफ संघर्ष किया। बीड़ी मजदूरों ने कम मजदूरी के खिलाफ कई जगह संघर्ष किया।

0. बीते वर्ष आई.टी. सेक्टर के मजदूरों-कर्मचारियों की दुर्दशा-छंटनी भी चर्चा का विषय बनी। आई.टी. क्षेत्र के मजदूरों ने खुद को संगठनबद्ध कर संघर्ष की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास किया।

0. देश की प्रमुख केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फेडरेशनों के आह्वान पर रस्मी कार्यक्रम के बतौर 3 दिन का संसद महापड़ाव आयोजित हुआ। इसमें भी मजदूरों, की बढ़-चढ़ कर भागीदारी हुई। 

    किसानों के संघर्ष 

    बीते वर्ष मजदूरों के साथ किसानों के संघर्ष भी वक्त-वक्त पर फूटते रहे। तबाह होती खेती के चलते किसानों की आत्महत्याओं का क्रम बीते वर्ष भी जारी रहा। दिल्ली में जंतर-मंतर पर तमिलनाडु के किसानों का महीने भर से अधिक चला संघर्ष, उसके विभिन्न रूपों ने सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।

0. म.प्र., महाराष्ट्र, उ.प्र., राजस्थान, तमिलनाडु, आदि राज्यों में किसानों के तबाह होती कृषि को लेकर एक के बाद एक संघर्ष हुये। पुलिस प्रशासन ने इनका बर्बर दमन किया। ढेरों जगहों पर सरकारें इनके दबाव में कर्ज माफी की घोषणायें करने को मजबूर हुईं।

0. विभिन्न किसान संगठनों के संयुक्त मोर्चे द्वारा विभिन्न मांगों को लेकर निकाली दस हजार किमी पदयात्रा व दिल्ली में किसान मुक्ति संसद में बड़ी तादाद में किसानों ने भागीदारी की।

0. 16 जून को मंदसौर में प्रदर्शनरत किसानों पर गोलीबारी में 5 किसानों की मौत ने किसानों की बुरी स्थिति को सामने ला दिया। मंदसौर गोलीकांड के खिलाफ देश भर में प्रदर्शन हुए।

0. मजदूरों-किसानों के इन संघर्षों की सबसे बड़ी खामी इनका एकजुट न होना व इनके नेतृत्व पर पूंजीवादी-संशोधनवादी तत्वों का हावी होना रहा। वक्त के साथ ऐसे तत्वों से मजदूरों-किसानों का मोह भंग बढ़ता जायेगा और वे अपना क्रांतिकारी नेतृत्व कायम कर कहीं अधिक जुझारू व निर्णायक संघर्षों की ओर बढ़ेंगे। 2018 में इन संघर्षों को इसी दिशा में बढ़ाने की जरूरत है। 

Labels: मजदूर हालात


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