अंक : 01-15 Jan, 2018 (Year 21, Issue 01)

नागरिक सेमिनार का सफल आयोजन


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    काकोरी कांड के क्रांतिकारियों की शहादत दिवस के अवसर पर 17 दिसम्बर को गुड़गांव में नागरिक अखबार की तरफ से एक सेमिनार का आयोजन किया गया। इस सेमिनार का विषय ‘मजदूर संघर्ष और मीडिया’ था। सेमिनार का संचालन करते हुए रोहित ने बताया कि नागरिक पिछले 20 वर्षों से मजदूर-मेहनतकश जनता के संघर्षों को प्रेरणा देते हुए उनके संघर्षों में भागीदारी करता रहा है।

    सेमिनार की शुरूआत बर्तोल्ट ब्रेख्त के गीत ‘वो सब कुछ करने को तैयार’ से हुयी। सेमिनार पत्र पर बातचीत रखते हुए साथी श्यामवीर ने कहा कि गुड़गांव में मजदूरों के पिछले सालों में कई बड़े आंदोलन हुए हैं जिनमें रिको से लेकर होण्डा, टपूकेडा के आंदोलन हैं। मारुति मजदूरों के संघर्षों को तो मीडिया ने काफी ज्यादा नकारात्मक तरीके से प्रचारित किया। मजदूरों को हत्यारा तक बताया। अभी चल रहे एसपीएम ऑटो काम्प के मजदूरों के संघर्षों के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि इस फैक्टरी में आये दिन मजदूरों के हाथ-पांव कटते रहते हैं। कई मजदूरों की मौतें इस फैक्टरी में हो चुकी हैं लेकिन मीडिया इन सबको नहीं दिखाता है। मीडिया सीमा पर सिपाहियों को तो शहीद का दर्जा देता है लेकिन फैक्टरियों में उत्पादन कर रहे मजदूरों को नहीं। जबकि समाज में सब कुछ मजदूर पैदा करते हैं। 2008 के बाद यूरोप के कई देशों में मजदूरों के बड़े आंदोलन हुए हैं लेकिन मीडिया ने उन पर चुप्पी साधे रखी।

    होण्डा, टपूकेडा से आये यूनियन प्रतिनिधि राजपाल ने बात रखते हुए कहा कि जब 16 फरवरी 2017 को उनकी फैक्टरी का आंदोलन चला तो अगले दिन यानी 17 फरवरी को अखबारों में यह खबर लगायी गयी- ‘खुराफाती मजदूरों पर लाठीचार्ज’। लेकिन उसने यह नहीं बताया कि 3500 मजदूरों में से मात्र 467 मजदूर स्थायी हैं जिनमें से 102 मजदूर अभी बाहर हैं। मजदूरों की मौत का इलजाम मजदूरों पर ही डालकर मीडिया मजदूर संघर्षों को बदनाम करता है। 

    हिन्दू अखबार से आये पत्रकार सम्पत ने बात रखते हुए बताया कि मीडिया मजदूर-मेहनतकशों का समर्थन नहीं करता इसका कारण मीडिया में अच्छे या बुरे लोगों की बात नहीं है बल्कि मीडिया को मिलने वाले विज्ञापन हैं। अखबारों को टाटा, बजाज आदि कम्पनियों से ही विज्ञापन मिलते हैं। यदि मीडिया इनके खिलाफ लिखेगा तो उसे विज्ञापन मिलना बंद हो जायेगा तथा वह घाटे में चला जायेगा। इसी तरह उन्होंने आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों के फासीवादी चरित्र पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ये मंदिर मुद्दा, गौ रक्षा जैसे मुद्दे तो उठाते हैं लेकिन कभी मजदूर रक्षा जैसे मुद्दे नहीं उठाते हैं। जबकि इनके साथ मजदूर भी जुड़े होते हैं। 

    बैलसोनिका वर्कर यूनियन के अजीत ने अपनी बात की शुरूआत मार्क्स के कथन ‘हर युग में शासक वर्ग के विचार हावी होते हैं’ से की और कहा कि दास समाज, सामंती समाज में भी शासक अपने विचारों से शासन करता रहा है। जब पूंजीवादी समाज में मजदूर संघर्ष कर रहे होते हैं तो मीडिया इस रूप में उसे प्रचारित करता है मानो मजदूरों ने हड़ताल करके मालिकों का बहुत बड़ा नुकसान कर दिया है। लेकिन मजदूरों के रहने, काम करने आदि की जगहों के बारे में मीडिया कभी नहीं लिखता। कोई अखबार अपने वर्गीय हितों के हिसाब से ही चलता है। इसलिए हमें आज अपना मीडिया बनाना पड़ेगा। अपने मीडिया के माध्यम से हमें मजदूरों को वो सब कुछ बताना होगा जो मुख्य धारा का मीडिया हमें नहीं बताता। मजदूरों ने अपने राज स्थापित किये हैं यह हमें अपने मीडिया के माध्यम से बताना चाहिए।

    जन मीडिया से आये अनिल चमड़िया ने कहा कि देश में लाखों पत्र-पत्रिकायें मौजूद हैं। कई चैनल हैं लेकिन उनमें से कुछ ही दिखायी देते हैं। उन्होंने अपने अनुभव बताते हुए कहा कि 80 के दशक के दौरान दिल्ली के एक इलाके में मजदूरों पर गोलियां चलीं जिसके बारे में हमने एक रिपोर्ट भेजी तो मालिक ने कहा कि आपके लेखन में मजदूरों की ही बात क्यों होती है। 9, 10, 11 के संसद महापड़ाव पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि इण्डियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इण्डिया, दैनिक जागरण जैसे कई अखबारों ने इसे छापा ही नहीं। जनसत्ता और हिन्दू जैसे अखबारों ने इसकी खबर लगायी लेकिन शहर वाले पृष्ठ पर जबकि यह राष्ट्रीय घटना थी। 

    एसपीएम आटो काम्प से आये अखिलेश ने कहा कि उनकी फैक्टरी में एक बार बेल्ट में मजदूर फंस गया तो मालिक ने बेल्ट काटने से मना कर दिया। और डेढ़ घंटे तक वह मजदूर बेल्ट में फंसा रहा। बाद में जब वह निकला तो उसकी मृत्यु हो चुकी थी। जब मजदूर नेता व प्रतिनिधि इस घटना के बारे में जानकारी लेने के लिए फैक्टरी गये तो कई सारे लोगों पर झूठा मुकदमा लगा दिया और 40 मजदूरों को निकाल दिया। आज जब एसपीएम फैक्टरी का आंदोलन चल रहा है तो उनको यह धमकी दी जा रही है कि तुम्हारा हाल मारुति जैसा कर दिया जायेगा। मजदूरों को स्थानीय गुण्डों का सहारा लेकर आईएमटी मानेसर छोड़कर जाने को कहा जा रहा है। पहले फैक्टरी में घायल होने वाले मजदूर को पिछले गेट से निकाल दिया जाता था। हाथ कट जाने पर मालिक मजदूरों से कहता है कि उसने खुद अपने हाथ काटे हैं। लेकिन यह बातें कहीं मीडिया में नहीं आती हैं। 

    मजदूर पत्रिका के संतोष ने सोशल मीडिया पर बात रखते हुए कहा कि इन पर भी आज पूंजीपतियों का एकाधिकार है। ये भी पूंजी के पक्ष में ही काम कर रहे हैं। गूगल के सीईओ ने एक स्टेटमेंट दिया कि फेक या प्रोपेगेण्डा फैलाने वाली वेबसाइट को हम पिछले पेज पर दिखायेंगे। और इसके बाद उन्होंने अमेरिका की कई सारी वामपंथी वेबसाइट को पीछे कर दिया। तथा उनकी साइट को फेक या प्रोपेगेण्डा वाली करार देते हुए अपने सर्च इंजन में आने से ही मना कर दिया। 

    मजदूर सहयोग केन्द्र और मारुति के प्रतिनिधि सतीश ने कहा कि मारूति सुजुकी मामले में मीडिया ने हमारी खबर देनी बंद कर दी। हमारे मैनेजर ने पहले ही बोल दिया था कि यह वर्ग संघर्ष है। तब हमें समझ में नहीं आया था। बाद में समझ में आया कि मीडिया उनकी है और वह मजदूरों की मांगों को कभी नहीं उठाती है। मजदूर साथी भी मीडिया के प्रचार में आकर हिन्दू-मुस्लिम में बंट जाते हैं। हमको वर्गों के हिसाब से चीजों को समझना चाहिए। 

बीबीसी से संदीप ने सेमिनार में बात रखी। उन्होंने कहा कि खबरें आज माल बन गयी हैं और माल मांग के आधार पर बनाया जाता है। भले ही आज मीडिया ताकतवर हो लेकिन उसमें भी जनपक्षधर लोग काम करते हैं। हमें पूंजीपति वर्ग के इन संचार माध्यमों में भी अंतरविरोधों का फायदा उठाना चाहिए। इसमें हमें कुशल होना चाहिए।

जाति उन्मूलन पत्रिका से बोलते हुए साथी जे.पी.नरेला ने कहा कि पूंजीपति वर्ग अपनी तरफ से एकजुट है। मजदूरों को भी अपने आर्थिक संघर्षों के साथ राजनीतिक संघर्ष की तरफ बढ़ना चाहिए। जाति के सवाल को भी उन्होंने वर्गीय दृष्टिकोण से उठाने की बात की तथा कहा कि वर्ग व जाति दोनों का उन्मूलन हमें करना होगा। मजदूरों व किसानों के संघर्षों की एकता पर उन्होंने बल दिया। नागरिक अखबार को मजदूरों को अपना अखबार मानकर उसका प्रयोग करना चाहिए साथ ही उन्होंने कहा कि नागरिक में सैद्धान्तिक बातें थोड़ी संक्षेप में होनी चाहिए ताकि मजदूर समझ सकें। आज की मीडिया से ऐसी अपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि वह मजदूर संघर्षों के बारे में लिखेगी। 

नागरिक के सम्पादक नगेन्द्र ने बोलते हुए कहा कि हर युग में शासक वर्ग के विचार ही प्रभुत्वकारी स्थिति में होते हैं। जब औद्योगिक क्रांति के दौरान छापेखाने की शुरूआत हुयी तो पहली छपने वाली किताब बाइबिल थी। इस तरह मीडिया ने अपने जन्म के साथ ही मानसिक गुलाम बनाने का काम किया। उस दौर में दुनिया में उथल-पुथल थी। दूसरे देशों को गुलाम बनाने वाले देशों के एक हाथ में तलवार थी तो दूसरे हाथ में बाइबिल थी। प्रताप के सम्पादक गणेश शंकर विद्यार्थी का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि किस तरह वे अपने अखबार में क्रांतिकारियों को लिखने का मौका देते थे और जरूरत पड़ने पर उनको आर्थिक सहायता भी देते थे। उन्होंने कहा कि ये आजादी के दौर का मीडिया था लेकिन आज के दौर में सीएनएन के मालिक रूपर्ट मर्डोक का राज है जिनके अनुसार अखबार में तीन चीजें होनी चाहिए। सेक्स, स्पोर्ट्स और बिजनेस। अखबार के तीसरे पन्ने (पेज थ्री) के बारे में मर्डोक का कहना है कि इस पन्ने पर किसी नग्न स्त्री की तस्वीर होनी चाहिए। उनके अनुसार हर पाठक एक उपभोक्ता है। और नारी के जिस्म को एक माल के रूप में पेश करना चाहिए। आज के दौर में मीडिया व वित्तीय पूंजी का संलयन है। आजादी के दौर में क्रांतिकारी ब्रिटिश औपनिवेशिक शासकों के मीडिया पर निर्भर नहीं थे बल्कि उन्होंने खुद का मीडिया विकसित किया। जनयुग, कीर्ति, प्राव्दा(रूसी क्रांतिकारियों का अखबार) जैसे अखबार हमारे आदर्श व प्रेरणा स्रोत हैं।

    सेमिनार का अंत क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन के अध्यक्ष पी.पी.आर्या के वक्तव्य से हुआ। सेमिनार में इसके अलावा रेड स्टार पत्रिका के विमल त्रिवेदी, मेहनतकश पत्रिका के अमित, इमके के संजय, हीरो कम्पनी के भीमलाल आदि लोगों ने भी बात रखी। सेमिनार में अल्पसंख्यकों-दलितों, धर्मनिरपेक्ष व जनपक्षधर बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों-पत्रकारों पर बढ़ते हमलों के विरोध में व ट्रेड यूनियन अधिकारों को कुचले जाने व श्रम कानूनों में बदलाव के खिलाफ प्रस्ताव पारित किये गये।                               - विशेष संवाददाता

Labels: रिपोर्ट


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