अंक : 16-31 Jan, 2018 (Year 21, Issue 02)

छात्रों की बढ़ती आत्महत्यायें और परीक्षायें


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    बढ़ती ठंड के बीच 10 जनवरी को सीबीएसई ने 10वीं व 12वीं की परीक्षाओं की तिथियां जारी कर दी हैं। परीक्षायें छात्र-छात्राओं के बीच बेचैनी, तनाव आदि को बढ़ा देती हैं। परीक्षा परिणाम ढेरों छात्रों को आत्महत्या तक के लिए मजबूर कर देते हैं। एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार 2014 से 2016 के दौरान 26,416 छात्रों ने आत्महत्या की। इनमें से 7,462 (28.24 प्रतिशत) छात्रों ने परीक्षाओं में अपेक्षित परिणाम न आने के कारण आत्महत्या की। देश में आत्महत्या की होने वाली कुल घटनाओं में छात्रों का प्रतिशत 6-7 है, जिसमें 40-45 प्रतिशत छात्रायें हैं। 

    ताजा आंकड़ों के अनुसार छात्रों की आत्महत्या की घटनायें साल दर साल बढ़ रही हैं। साल 2014 में जहां 8,068 छात्रों ने तो वहीं 2015 में 8,934 और 2016 में 9,324 छात्रों ने आत्महत्या की। छात्रों की इन आत्महत्याओं में परीक्षाओं के कारण क्रमशः 2014 में 2403, 2015 में 2646 तो 2016 में 2413 छात्रों ने आत्महत्या की। 

    महाराष्ट्र में 2016 में सर्वाधिक 1350 छात्रों ने आत्महत्या की। वहीं पं.बंगाल में 1147 तो तमिलनाडु में 901, छत्तीसगढ़ में 633, गुजरात में 556 और कर्नाटक में 540 छात्रों ने आत्महत्या की। 

    छात्रों में आत्महत्याओं के बढ़ते इन मामलों को गृह मंत्रालय ने ‘बड़ी’ गम्भीरता से लेते हुए जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम चलाये जाने की बात कही। इस कार्यक्रम के तहत आत्महत्या बचाव सेवायें, कार्यस्थल पर तनाव प्रबंधन (मैनेजमेण्ट) जीवन कौशल ट्रेनिंग और काउंसलिंग (स्कूल, कालेजों में) आदि की योजना बनाई है। विशेषज्ञ कहते हैं कि छात्रों में बढ़ रहे तनाव को कई छात्र झेल नहीं पाते हैं, जिसके लिए संस्थान के स्तर पर कोई मदद नहीं दी जाती। 

    संस्थान छात्रों को प्रतियोगिता में अव्वल आने की तैयारी करवाते हैं और सिर्फ अव्वल आने के ही सपने दिखाते हैं। साल 2016 में कोचिंग हब कोटा, राजस्थान में तैयारी करने आये छात्रों की आत्महत्या की घटनाओं ने इस तरफ ध्यान खींचा था। अच्छे संस्थान से शिक्षा पाने के लिए कोचिंग करने वाले छात्रों पर भयंकर दबाव होता था। यह दबाव परिवार, शिक्षकों और छात्रों के बीच परस्पर प्रतियोगिता से लगातार बढ़ता जाता है। 

    परिवार का दबाव बेहतर रोजगार, जीवन स्तर आदि के साथ नाक का भी प्रश्न होता है। 

    शिक्षकों या संस्थानों का भविष्य छात्रों की सफलता-असफलता पर टिका होता है। उनका दबाव छात्रों से ज्यादा अपने बेहतर भविष्य के लिए होता है। 

    अब ऐसे में संस्थानों में छात्रों को प्रतियोगिता के दबाव से कैसे मुक्ति मिलेगी? काउंसलिंग और इलाज इसका कोई हल नहीं है और डाक्टरी इलाज से प्रतियोगिता खत्म नहीं हो सकती। 

    गृह मंत्रालय ने चिंता जतायी और इलाज-काउंसलिंग के बारे में सोचा परन्तु दबाव जो कि बढ़ती प्रतियोगिता का ही परिणाम है, के बारे में या प्रतियोगिता को खत्म करने के बारे में कुछ नहीं कहा। इसका मतलब है गृह मंत्रालय ने इस बारे में न सोचा और न ही उसे इसकी कोई चिंता है। क्योंकि सोचने का मतलब है प्रतियोगिता के अंत के बारे में सोचना। इसका नतीजा होगा सबको शिक्षा और रोजगार के बराबर अवसर देना। इसका मतलब हुआ निःशुल्क, एक समान शिक्षा और सबको योग्यतानुसार/क्षमतानुसार रोजगार देना। जब लोग अपनी शिक्षा, रोजगार और बेहतर जीवन के लिए निश्चिंत होंगे तो प्रतियोगिता के दबाव की कोई जरूरत ही नहीं रहेगी। 

    यदि गृह मंत्रालय ऐसा सोच ले तो इसका मतलब होगा शिक्षा पर खर्च को बढ़ाना हालांकि दूसरा काम भी करना होगा जो कि गृह मंत्रालय, सरकार व मौजूदा व्यवस्था के लिए असंभव है- रोजगार देना। रोजगार देने का मतलब है सरकार द्वारा सारी उत्पादक इकाईयों (फैक्टरी आदि) को नियंत्रित करना या उनको जब्त कर खुद ही चलाना। क्योंकि सरकार खुद यदि सबको रोजगार देना भी चाहे और पूंजीपति (फैक्टरी मालिक) न माने तब भी वह क्या करेगी, इसलिए जब्ती जरूरी मजबूरी है। जब सारे ही औद्योगिक-गैर औद्योगिक संस्थान गृह मंत्रालय या सरकार के हाथ में होंगे तो वह सबको रोजगार दे सकती है, उसकी नीति बना सकती है। सारी व्यवस्था, उद्योग, सेवा, कृषि को नियोजित तरीके से चला सकती है। 

    चूंकि गृह मंत्रालय छात्रों की आत्महत्या के बारे में ऐसे नहीं सोचता तो हम कह सकते हैं वह कुछ नहीं सोचता। असल में वह ऐसा सोचना भी नहीं चाहता। 

    दरअसल गृह मंत्रालय से ऐसी उम्मीद पालना भी बेईमानी है। आत्महत्या की समस्या को इस ढंग से सोचने और हल बताने का काम उन छात्रों का है जो बच गये हैं, उन माता-पिता का है जो अपने बच्चों को ऐसी प्रतियोगिता में छोड़ने को मजबूर हैं यानी हर मजदूर-मेहनतकश, नागरिक को समाज में बढ़ रही आत्महत्याओं का हल समाजवादी नियोजित अर्थव्यवस्था में बताने की जरूरत है जिसको पूंजीवाद विरोधी समाजवादी क्रांति से ही हासिल किया जा सकता है। 

Labels: राष्ट्रीय


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