अंक : 16-31 Jan, 2018 (Year 21, Issue 02)

ईरान में जन उभार केे आंतरिक कारण


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    ईरान के विभिन्न शहरों में 28 दिसंबर, 2017 को भारी प्रदर्शनों की बाढ़ सी आ गयी। ये प्रदर्शन महंगाई और भारी पैमाने पर बढ़ती बेरोजगारी के विरोध में हुए। अण्डों और मुर्गों के दामों में हाल में बढ़ोत्तरी इसका तात्कालिक कारण थे। हालांकि इन प्रदर्शनों की शुरूआत आर्थिक मांगों से हुई लेकिन जल्द ही इन्होंने राजनीतिक स्वरूप ग्रहण करना शुरू कर दिया। लोग मुल्लाओं और हुकूमत के विरुद्ध नारे लगाने लगे। उनके नारों में एक था- ‘‘लोग भीख मांग रहे हैं और मुल्ला देवताओं की तरह शासन कर रहे हैं।’’

    हो सकता है कि ये विरोध प्रदर्शन देर तक न चलें और इनका चाहे जो भी नतीजा निकले, लेकिन इन विरोध प्रदर्शनों ने एक बार फिर से सिद्ध कर दिया है कि मौजूदा ईरानी हुकूमत जन समुदाय की सबसे बुनियादी सामाजिक और आर्थिक जरूरतों को पूरा करने में मूल तौर पर असमर्थ है। और इसीलिए पिछले 40 वर्षों से आबादी पर नियंत्रण रखने के लिए यह पाशविक ताकत पर निर्भर रही है। लेकिन पाशविक ताकत के सहारे ही हमेशा शासन नहीं बनाये रखा जा सकता। 

    ईरानी समाज में गहराई से जड़ें जमाई हुई गरीबी ने जन समुदाय को और ज्यादा हाशिये में धकेल दिया है। यह उभार अचानक आसमान से प्रकट नहीं हो गया। हालांकि पिछले साल के कई अपेक्षाकृत छोटे और ज्यादा स्थानीय विरोध प्रदर्शनों का यह चरम था। पिछले वर्ष तरह-तरह के सामाजिक मुद्दों को लेकर लोग सड़कों पर उतर पड़े थे। 

    लेकिन इस बार ईरान की अवाम एक बार फिर समूचे देश के पैमाने पर भारी संख्या में सड़कों पर उतर पड़ी। आखिर इस बार के मुद्दे क्या थे? पहले ईरानी सरकार कई बुनियादी जरूरत की वस्तुओं जैसे पेट्रोलियम उत्पादों, पानी, बिजली और रोटी पर सब्सिडी देती थी। इस सब्सिडी में हाल के वर्षों में कटौती की गयी थी। इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि 2007-08 में सब्सिडी जहां सकल घरेलू उत्पाद का 27 प्रतिशत थी वहीं 2016 में यह घटकर 3 प्रतिशत कर दी गयी। 

    दूसरे शब्दों में ईरान पूंजीवाद की अत्यन्त नव उदारवादी किस्म के रास्ते पर चल रहा है। 

    ईरान की गरीबी के बारे में कभी-कभी जो रिपोर्टें आती हैं उनसे वहां के जनसमुदाय की भयावह स्तर की गरीबी के बारे में पता चलता है। एक रिपोर्ट के अनुसार शहरी गरीबों का प्रतिशत 44 से लेकर 55 के बीच है। 

    हालत इतनी भयावह है कि कभी-कभी हुकूमत के बड़े अधिकारी भी समस्या को स्वीकार करने को मजबूर हो जाते हैं। सितंबर, 2017 में इमाम खामेनी रिलीफ फाउंडेशन के मुखिया परवीज फतह ने कहा कि एक करोड़ से 1.2 करोड़ ईरानी नितांत गरीबी में रहते हैं। यह नितांत गरीब लोगों की संख्या है। गरीबी स्तर के आस-पास या उससे नीचे रहने वाले लोग कुल ईरानी परिवारों का 40 प्रतिशत तक हैं। 

    ईरानी सरकार के खुद के अनुमान के अनुसार, तीन या चार लोगों के परिवार के लिए न्यूनतम आवश्यक आमदनी एक हजार डालर मासिक की होनी चाहिए। लेकिन सरकार मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी इस रकम की एक तिहाई तय किये हुए है। 

    ईरानी सरकार द्वारा किफायती कदमों में बढ़ोत्तरी के साथ-साथ बेरोजगारी का उच्च स्तर व 15 प्रतिशत की औसतन मुद्रा स्फीति ने हालात और भी खराब कर दिये हैं। बेरोजगारी 30 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गयी है। इतने बड़े पैमाने पर बेरोजगारी और सुरसा की तरह बढ़ती महंगाई ने माशहाद नामक कस्बे में शुरुआती विरोध प्रदर्शन को जन्म दिया। कुछ ही दिनों पहले अण्डे और मुर्गों की कीमतों में 40 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी की गयी थी। यहां यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि पिछले दस वर्षों से सरकार बुनियादी जरूरत के सामानों की सब्सिडी में बड़े पैमाने पर कटौती करती रही है। यह बढ़ती महंगाई और गरीबी है जिसने इन विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया है। 

    यहां यह भी ध्यान में रखने की बात है कि राज्य के मालिकाने से इतर की अधिकांश अर्थव्यवस्था बाजार पर निर्भर है। यानी कि व्यापारी वर्ग पर निर्भर है। धार्मिक नेताओं के शासन की शुरूआत से ही गैर सरकारी और गैर तेल क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में व्यापारी वर्ग का प्रभुत्व रहा है। यहां औद्योगिक उत्पादक वर्ग का प्रभुत्व नहीं रहा है। व्यापारी वर्ग का प्रभुत्वशाली स्थिति में होने का अर्थ यह है कि अधिकांश पूंजी संचय का कार्य खरीदने और बेचने के जरिये होता है। यह मालों के उत्पादन के जरिये नहीं होता। इसके परिणामस्वरूप अधिक से अधिक उत्पादों का आयात (राज्य एकाधिकार के अंतर्गत) किया जाता है। यह सस्ती से सस्ती दर पर किया जाता है और मुनाफे पर बेचा जाता है। यदि इन मालों को पूंजीपति देश के भीतर पैदा करते तो उन्हें मजदूरों की टकराहटों और वर्ग संघर्ष से निपटना पड़ता। इसलिए इसमें (व्यापार में) मुनाफा तेजी से आ जाता है। 

    ईरान की आबादी 1979 में लगभग 3.5 करोड़ थी। इस समय वह लगभग 8 करोड़ है। 1979 में ईरान की दो-तिहाई आबादी गांवों में रहती थी। इस समय तीन-चैथाई आबादी शहरों-कस्बों में रहती है। शहरों में इस बार बड़े पैमाने पर होने वाला जन आंदोलन इसलिए भी है क्योंकि शहरों में गरीबी का स्तर बहुत ज्यादा है। इसके अन्य कारण हैं प्रभुत्वशाली पूंजीपति वर्ग के व्यापारी चरित्र का होना, जो पर्याप्त रोजगार के सृजन में असमर्थ है, राज्य का ऐसी नीतियों को प्राथमिकता देना जिससे सुरक्षा बलों के और विदेशों में सैनिक खर्चों में व्यापक बढ़ोत्तरी होती है और भ्रष्टाचार है। 

    ईरान में जहां राज्य का गठन अत्यन्त दमनकारी है और वर्ग संघर्ष बहुत तीखा है, वहां पूंजी संचय के मुख्य स्रोत के बतौर औद्योगिक उत्पादन पर निर्भरता के खतरे ज्यादा हैं। इसलिए संयुक्त राज्य अमेरिका और पश्चिमी शक्तियों द्वारा आणविक समझौते के बाद प्रतिबंध हटा लेने के बावजूद ईरान में अंतर्राष्ट्रीय पूंजी औद्योगिक उत्पादन में निवेश करने से कतरा रही है। रोहानी सरकार द्वारा पश्चिमी देशों के साथ किये गये आणविक करार के बावजूद ईरान में कोई प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नहीं हो रहा है। 

    ईरान जैसे किरायाजीवी राज्य की बुनियादी चारित्रिक विशेषता राज्य के चरित्र पर निर्भर करते हुए यह होती है कि आर्थिक तौर पर शक्तिशाली विभिन्न स्तर के लोग राज्य के साथ अपने को जोड़ लेते हैं। पहलवी के शासन काल में राज्य ने औद्योगिक पूंजीपतियों को आकर्षित किया था, जबकि व्यापारी वर्ग धार्मिक मौलवियों के साथ ज्यादा जुड़ा हुआ था। पहलवी वंश के संस्थापक रजा शाह को इतिहास में धार्मिक संस्थानों पर विशेष तौर पर कड़ाई बरतने वाले के तौर पर जाना जाता है। 

    इसलिए यहां-वहां जब रजा शाह के समर्थन में नारे सुनाई पड़ते हैं तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। लोग वैसा ही करते हैं जैसा वे अपने इतिहास को जानते हैं। जब लोग देखते हैं कि मुल्ला शासक अत्यधिक भ्रष्ट हैं, अत्यधिक ठगी हैं, अत्यधिक पाशविक हैं, जब सबसे जरूरतंमद लोगों की मदद करने की बात होती है तो उसमें अत्यन्त कंजूस हैं, और जब यौन मामलों की बात होती है तो उसमें अत्यन्त शाहीपूर्ण खर्च वाले हैं। जबकि वे इसके लिए पवित्रता का उपदेश देते हैं। संक्षेप में जब सबसे दमनकारी और भयंकर रूप से भ्रष्ट लोगों के समूह द्वारा जन समुदाय पर शासन किया जाता है और जब इतिहास में एक निरंकुश शासक द्वारा इस धर्मगुरू वर्ग को किनारे लगा दिये जाने की बात सामने आती है, तो रजा शाह के पक्ष में और मुल्लाओं के विरोध में उठने वाली बात को आसानी से समझा जा सकता है। 

    ऐसे ऐतिहासिक और आर्थिक हालात ऐसे राज्य के गठन के जरिये बनाये गये हैं जो किसी तरह के विरोध की इजाजत नहीं देता, जहां कोई स्वतंत्र मजदूर यूनियनें नहीं हो सकती, जहां सत्ता में बैठे किसी व्यक्ति की लोगों द्वारा किसी भी तरह की आलोचना नहीं की जा सकती, ऐसे राज्य का गठन जो पुरुषों की तुलना में महिलाओं को आधी कीमत का मानता है, ऐसे राज्य का गठन जो बारहवीं सदी के इमाम मेहदी, एक विशिष्ट शिया समुदाय के बारहवें इमाम की तरफ से शासन का दावा करता है और इस आधार पर हुकूमत यह दावा करती है कि वह खुदा की तरफ से शासन कर रही है। धार्मिक नेताओं की कोई भी आलोचना खुदा का विरोध करार दिया जाता है और यह ईरान की अपराध संहिता में वास्तविक अपराध माना जाता है। इस तरह सरकार के विरुद्ध किसी भी विरोध को खुदा के खिलाफ लड़ाई (मोहारेबेह बा खुदा) करार दिया जा सकता है। 

    इस तरह यदि व्यवस्था इतनी दमनकारी है कि लोगों को अपनी तकलीफों को राज्य तक पहुंचाने के किसी कानूनी तरीके की इजाजत नहीं दी जाती तो फिर क्या रास्ता रह जाता है? आत्महत्या करने पर राज्य को कोई असुविधा पैदा नहीं होती। इसलिए ईरान की अवाम के समक्ष बड़े पैमाने पर सड़कों पर उतरने के सिवाय कोई रास्ता नहीं बचता। 

    अकेले पिछले वर्ष ऊपर बताये गये तमाम किस्म के सामाजिक दबावों ने लगातार सामाजिक बेचैनी और विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया था। 2017 में राजनैतिक कैदियों की व्यापक हड़ताल हुई, बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण के विरुद्ध विरोध प्रदर्शन हुए, मजदूरों के विरोध घनीभूत हुए और सामान ढोने वाले कुर्दों के विरोध हुए जो अपनी पीठ पर सामान सीमा के आर-पार ले जाते हैं। 

    जो लोग इन व्यापक विरोध प्रदर्शनों को सिर्फ अमेरिकी व पश्चिमी साम्राज्यवादियों की चाल समझते हैं और इसके अंदरूनी कारणों को नहीं देखते, वे किसी न किसी रूप में ईरान के मुल्लाओं के निरंकुश शासन के पक्षधर जाने-अनजाने बन जाते हैं। 

    जिस तरह सीरिया में उठे जनउभार के अंदरूनी कारणों को कुछ लोगों ने समझने से इंकार किया था, उसी तरह कुछ लोग ईरान के वर्तमान विरोध प्रदर्शनों के बारे में भी यही कर रहे हैं। 

    इन विरोध प्रदर्शनों के दौरान लोगों ने एक नारा लगाया था जिसे साम्राज्यवादियों द्वारा भड़काई योजना के तौर पर पेश किया गया है। लोगों ने नारा लगाया ‘‘गाजा नहीं, लेबनान नहीं, मैं ईरान के लिए अपना जीवन देता हूं।’’ ऐसे लोग यह आरोप लगा रहे हैं कि इस नारे में साम्राज्यवाद विरोध नहीं है। इसलिए ईरान की जनता में अंतर्राष्ट्रवाद की कमी है। ऐसे लोग इस नारे के अंदर और गहरी बात को नहीं समझ पाते। यह नारा हुकूमत के उस पाखंड को उजागर करने के लिए है जो फिलस्तीनी और लेबनानी जनता के संघर्षों के समर्थन में लगातार लफ्फाजी करती रहती है। जबकि ईरानी हुकूमत ने हमेशा फिलस्तीन और लेबनान के भयावह सामाजिक हालात का इस्तेमाल पश्चिम एशिया में अपने विस्तारवादी मंसूबों को पूरा करने के लिए किया है। 

    उक्त नारे में जनता हुकूमत से कह रही है ‘‘हम तुम्हारी धोखाधड़ी को देख रहे हैं और हमें मूर्ख नहीं बनाया जा सकता। तुम हमें अपने विदेशी युद्ध में लड़ने के लिए भेजना चाहते हो, लेकिन हम तुमसे यहीं अपने यहां लड़ाई करेंगे।’’ यह उसी तरह है जब वियतनाम में अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने हमला किया था तो अमेरिका के भीतर युद्ध विरोधी कार्यकर्ताओं ने जैसा किया था। इसलिए, वस्तुतः यह नारा फिलस्तीनी और लेबनानी समुदाय के साथ एकजुटता जाहिर करने का नारा है। 

    ईरानी जनता फिलस्तीनी और लेबनानी जनता को यह संदेश दे रही है कि वे; ईरानी जनता, फिलस्तीनी ओर लेबनानी अवाम की; पीठ पर लदी उत्पीड़न की एक परत हटाने के लिए काम कर रहे हैं जिसको ईरानी हुकूमत के अवसरवादी व विस्तारवादी मंसूबों द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा है। यह ऐसी हुकूमत है जिसने अपनी संकीर्ण शिया मिलिशिया शक्तियों का इस्तेमाल करके एक समय में हजारों हजार की संख्या में सामूहिक तौर पर अपने सुन्नी भाईयों और बहनों का नरसंहार करने के सिवाय अरब जन समुदाय के लिए कुछ नहीं किया है। यही ईरानी हुकूमत इराक और सीरिया के लोगों पर कहर बरपा रही है। 

    ईरानी जनता के मौजूदा जनउभार के कारण बिल्कुल स्पष्ट हैं। लोग बुनियादी अधिकार चाहते हैं और वे चाहते हैं कि ईरानी हुकूमत राष्ट्रीय सम्पदा को सीरिया और इराक तथा अन्य जगहों पर नरसंहार करने के लिए न नष्ट करे। इसके बजाय ईरानी लोग चाहते हैं कि उनके राष्ट्रीय संसाधनों को उन ईरानी लोगों को सुविधाएं मुहैय्या कराने के लिए खर्च किया जाये जो नितांत गरीबी में रहते हैं। 

    ईरान के लोग मामलों को अपने हाथ में ले रहे हैं। लेकिन जब ईरान के लोग सड़कों पर उतरते हैं जो वे अपने विरोध की कार्यवाही के परिणामों के बारे में यह जानते हैं कि उनकी गिरफ्तारी, यातना और मौत हो सकती है। 

    ईरानी नौजवान जो उठ खड़े हुए हैं और कहते हैं कि ‘बहुत हो चुका’, वे ऐसे नौजवान हैं जो उस क्रांति की संतानें हैं जिसे अत्यन्त हिंसक फिर भी सुसंगठित प्रतिक्रांति द्वारा बुरी तरह कुचल दिया गया था। नई पीढ़ी सुंदर भविष्य के लिए अपने जीवन और उसकी संभावना को देख रही है। वह देख रही है कि इस संभावना को छीन लिया गया है और समाज के सबसे अधिक परजीवी तबके द्वारा इस ऐतिहासिक चोरी के विरुद्ध वे खड़े हो रहे हैं। यह सबसे अधिक परजीवी तबका मुल्लाओं का है। धार्मिक नेता ईरानी समाज के सबसे अधिक अनुत्पादक जीव हैं तब भी उनके बेटे, तेहरान और अन्य शहरों के उच्च वर्गों के पड़ोस में रहते हैं। उनके पास प्रति व्यक्ति बुग्गाटी और लैम्बोगिनी (कारों के नाम) मोनाको की सड़कों की तुलना में ज्यादा हैं। यह सम्पदा कहां से आती है? यह सम्पदा हमारी राष्ट्रीय आमदनी से चुरायी गयी है और ईरान के नौजवान इस चोरी कोे रोकने के लिए उठ खड़े हुए हैं। 

(रजा फ्लाईओजात्र के लेख Iran and the Left : A Dissenting View के अधिकांश हिस्सों का भावानुवाद, 5 जनवरी, 2018 के Counterpunch से साभार)

Labels: अन्तराष्ट्रीय


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