अंक : 16-31 Jan, 2018 (Year 21, Issue 02)

यह अर्थव्यवस्था सुधारों की नहीं आमूलचूल परिवर्तन की मांग कर रही है


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    देश में बैंकों की खराब होती हालत को बचाने के लिए सरकार इन बैंकांे को 2.11 लाख करोड़ की पूंजी दे चुकी है और उम्मीद की जाती है कि इस धनराशि में और इजाफा होगा। फिर भी इस देश के दस बैंकों की हालत बहुत खराब है। इन बैंकों की हालत अगर इसी तरह खराब रही तो ये देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक गंभीर चेतावनी होगी। इसीलिए सरकार डूबते इन बैंकों को सरकारी खजाने से धन देकर बचा रही है। लेकिन क्या जो धन इन बैंकों को बचाने के लिए लुटाया जा रहा है उससे इनकी हालत में सुधार आयेगा? क्या देश की अर्थव्यवस्था इस बात की इजाजत देती है कि वह इस कर्ज की भरपाई करने लायक है? क्या हाल पैदा हो जायेंगे अगर यह पैसा बैंकों को देने के बाद भी बैंकों की हालत ठीक न हो और जनता की गाढ़ी कमाई डूब जाये?

    पिछले वर्षों में देश और दुनिया की अर्थव्यवस्था की हालत देखकर तो यह नहीं कहा जा सकता है कि आने वाले दिनों में भारतीय बैंकों और भारतीय अर्थव्यवस्था में कोई सुधार होगा। स्टैण्डर्ड चार्टर्ड बैंक और मूडीज भी बैंकों की खराब हालत का हवाला दे चुके हैं और अर्थव्यवस्था में कोई विशेष चमत्कारिक रुझान नहीं देख रहे हैं जिससे इन बैंकों की इस खराब दशा में कोई सुधार हो सके।     

     पिछले सितम्बर तक सरकारी बैंकों की डूबने वाली राशि में 17 फीसदी का इजाफा हुआ है। इसी प्रकार निजी बैंकों की डूबत राशि में भी 41 फीसदी का इजाफा हो चुका है। इसका कारण खनन, खाद्य प्रसंस्करण, इंजीनियरिंग, निर्माण और बुनियादी ढांचे में कारोबार में आया ठहराव है। जिससे समूचे देश की अर्थव्यवस्था को संकट की तरफ धकेला है और जो कि पिछले सालों से लगातार जारी है। देश के बुनियादी उद्योगों में लगातार संकट जारी है जिसके कारण उपभोग और उत्पादन में तीव्र गिरावट आने लगी है और बेरोजगारी बढ़ती जा रही है। अर्थव्यवस्था में रोजगारों का लगातार गिरना उपभोग को प्रभावित करता है जो कि अंततः उत्पादन में गिरावट लाता है और उत्पादन में गिरावट का मतलब बाजार में मंदी। दुकानों में सामानों की भरमार होती हैै लेकिन खरीदने वाले नदारद। 

    जून 2017 में सरकारी बैंकों का कर्ज 8,29,338 करोड़ रुपये था जो ऐसा कर्ज है जिसका वसूल होना असंभव है। इसी प्रकार निजी बैंकों का 100,481 करोड़ रुपये इस डूबत राशि में शामिल है। कुल मिला कर यह राशि 9 लाख करोड़ से ऊपर बैठती है। विभिन्न बैंकों में जमा यह धनराशि जो कि इस देश के आम आदमी द्वारा छोटी-छोटी बचतों के माध्यम से जमा की जाती है। देश की अर्थव्यवस्था की दशा देखकर यह नहीं कहा जा सकता है कि लाखों करोड़ों रुपयों का यह कर्ज वापस आ पायेगा। अगर वास्तव में यह वापस नहीं आया और बैंक डूब जायें तो उन लोगों का क्या होगा जो इन बैंकों का भरोसा किये बैठे हैं। ऊपर से कोढ़ में खाज यह है कि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष भारतीय शासक वर्गों को नौ सरकारी बैंकों का निजीकरण करने के लिए बाध्य कर रहा है। और भारतीय शासक वर्ग इस बात को मानने के लिए मजबूर है जिस कारण वे देर सबेर इसे लागू भी करेंगे।

    कायदे से तो सरकार को इन कर्जों को किसी भी तरह वसूल करना चाहिए था। लेकिन सरकार ऐसा नहीं कर सकती क्योंकि कर्जा उन लोगों ने लिया है जो कि सरकारों को बनाया और बिगाड़ा करते हैं। माल्या जैसे लोग इसके उदाहरण हैं जो कि बैंकों से करोड़ों का कर्ज लेकर विदेशों में मौज कर रहा है और सरकार उसका कुछ भी नहीं कर पा रही है। ऐसे में वह इन कर्जदारों को बचाने के लिए जनता के पैसे जो कि विभिन्न बैंकों में जमा होते हैं इन पर लुटा रही है जिससे देश के आम आदमी की हालत दिन ब दिन खराब होती जा रही है। जो धनराशि देश के विकास कार्यों के लिए लगायी जानी चाहिए थी वह धनराशि इस देश के पूंजीपतियों के कर्जों को चुकाने में लगायी जा रही है। 

    यह स्थिति गौर करने लायक है कि अगर इस देश के बड़े बैंकों का निजीकरण हो गया और इनको निजी हाथों में दे दिया जाता है तो विदेशी पूंजीपति बड़ी मात्रा में इन बैंकों में पूंजी निवेश करेंगे और इस तरह वे इन बैंकों का संचालन पूरी तरह अपने हाथों में ले लेंगे फिर सरकार का इन पर कोई नियंत्रण नहीं रह जायेगा तब ये निजी विदेशी बैंक मिलकर इस देश का क्या हाल करेंगे? तब ये बेलगाम देशी-विदेशी बैंक इस देश की जनता और इस देश की अर्थव्यवस्था के विकास में योगदान करेंगे या अपने मुनाफे को ध्यान में रखेंगे। निश्चय ही ये बैंक इस देश की जनता के विकास के लिए कुछ भी नहीं करने वाले हैं और न ही इस देश की अर्थव्यवस्था के लिए।

                                                                                                                                 -राजेश तिवारी वाया ईमेल

Labels: मजदूरों के पत्र


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