अंक : 16-31 Jan, 2018 (Year 21, Issue 02)

प्रचार के दम पर


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    पहले के जमाने में लोग रात में सोते समय सपने देखते थे लेकिन आजकल तो हर समय ही सपने देखने जैसा हो गया है। वैसे भी जब व्यवस्था के पास कुछ देने को नहीं है तो केवल सपने ही दे सकती है। पढ़े-लिखे नौजवान जब अच्छी नौकरी की आशा लगाये नौकरी खोज रहे है तो उनको सपने दिखाये जा रहे कि देखो नौकरी में क्या रखा है तुम खुद नौकरी देने वाले बनो। 10-10 साल से टर्नर, फिटर, वैल्डर, आदि काम करते हुये भी लोग अभी तक हेल्पर गे्रड में ही काम कर रहे हैं, उनकी तनख्वाह अभी तक 10 हजार भी नहीं पहुंची। अब उन्हें स्किल इण्डिया स्कीम के तहत स्किल करने के सपने दिखाये जा रहे हैं। ऐसा ही हाल किसानों का है। किसान कर्ज के जाल में फंसकर आत्महत्या कर रहे हैं। सरकार टोल फ्री न. जारी कर रही है जिस पर कृषि वैज्ञानिक किसानों को खेती के गुर सिखायेंगे।

    काम धन्धे मन्दे पड़े हैं और बाजारों में रौनक नहीं है व फैक्टरियों में मजदूरों की छंटनी हो रही है और सरकार आंकड़ों में विकास प्रदर्शित कर रही है। आज बीजेपी विकास के सपने बेच रही और कल हो सकता है कि यही काम कांगे्रस करे। चुनाव में इसी बात का फैसला होता है कि कौन जनता को अच्छे सपने दिखा सकता है सपने दिखाये जा रहे हैं कि देश आने वाले सालों में महाशक्ति और विश्व गुरु बनने जा रहा है लेकिन भारत में मूर्खों की भी बड़ी तादात है जिन्हें सपने में भी रोटी दिखायी पड़ती है। गुजरात में चुनाव सपन्न हो चुके हैं और ई.वी.एम. मशीनों की सच्चाई पर विश्वास करें तो भाजपा अपने प्रचार के बल पर, ढेरों रैलियां करके चुनाव जीत गयी। आरक्षण, पटेल, जाति, विकास इसमें मुद्दा थे, लेकिन रोटी-रोजगार कहीं मुद्दा नहीं था।                                 -खालिद, फरीदाबाद

Labels: मजदूरों के पत्र


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