अंक : 16-31 Jan, 2018 (Year 21, Issue 02)

नगर निगम चुनाव बरेली


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    चुनावी व्यवस्था पूंजीवादी व्यवस्था के प्रादुर्भाव के काफी समय बाद शुरू हुयी। उससे पहले राजा, नवाबी व्यवस्था थी। पूंजीवादी व्यवस्था में भी आम जन तभी भागीदारी करने को सामने आये जब उनकी एकता का आगाज हुआ। परन्तु स्पष्ट है कि चुनाव भी छल, कपट, धोखाधड़ी का साधन पूंजीपतियों के लिए हो गया। इसमें प्रत्यक्ष-परोक्ष शासनके तरीके पर्दे के पीछे से संचालित होते रहे हैं। ऐसे समय तक तो पर्ची व्यवस्था रही। अब मशीन संचालित मतदान व्यवस्था शुरू है। मशीन मानव बनाता है- वोटिंग मशीन किस व्यवस्था के अधीन चल रही है। यह प्रधान विषय है न कि मशीन प्रधान हैं। उस मशीन का नाम ई.वी.एम. रखा गया है। जब मानव खुद ही मशीन की तरह संचालित हो रहा है तो मानव निर्मित मशीन का क्या जवाब है। चूंकि आज की व्यवस्था सारी मुनाफाखोरों के अधीन संचालित है, चाहे शिक्षा हो, चाहे संस्कृति हो, आर्थिक व्यवस्था, राजनीतिक व्यवस्था सब उनके हाथ में है। तो बाकी रही सही चीजें अपने आप उनके अधीन होना लाजिमी है। 

    बरेली में हाल मे नगर निगम प्रत्याशी भाजपा उम्मीदवार उमेश गौतम का विजयी होना इसी परिघटना का उदाहरण है। जो कि बरेली में अच्छी खासी हैसियत अरबपति से ज्यादा की रखता है। वह शख्स एक साधारण पुलिस अफसर का बेटा है। इतनी अकूत सम्पत्ति चंद दिनों में इकट्ठा कर मेयर के पद से जीत हासिल कर मोदी के साथ में फोटो खिंचवा कुछ और इशारा कर रहा है। 

    चुनाव के तुरंत बाद ही बरेली को हिन्दू संस्कृति में ढालने का अभियान चल रहा है। इसे पुस्तक मेले से शुरू किया जा रहा है। पुस्तक मेले में सारी पुस्तकें हिन्दू धर्म सम्बन्धी हैं। कुछ थोड़े सी अन्य पुस्तकें, प्रगतिशील व्यक्तियों के विचारों की भी है तो उनमें इतना बदलाव करके लिखा हुआ है कि मनुष्य जो केवल स्कूली शिक्षा तक पढ़ा है वह पढ़ेगा तो प्रगतिशीलता के विचारों से उदास होकर, भय खाकर यथास्थिति में अटक जायेगा। मैंने उस मेले में से माक्र्स की जीवनी की एक पुस्तिका खरीद कर पढ़ी- उसमें माक्र्स का जीवन वृतान्त इस तरह दर्शाया गया है कि उसने अपने जीवन में जो कुछ किया उसे उसके फलस्वरूप पूरा जीवन पीड़ादायी तरीके से गुजारना पड़ा, उसके बच्चे गरीबी के कारण इलाज के अभाव में मर गये। पूरा वृतान्त दुखान्त व नकारात्मक है। पुस्तक मेले के जरिए हिन्दुत्व की संस्कृति का प्रसार, प्रचार कर थोपने की कोशिश हो रही है।                                                                                   -देवसिंह, बरेली

Labels: मजदूरों के पत्र


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