अंक : 16-31 Jan, 2018 (Year 21, Issue 02)

तमिलनाडु में बस परिवहन के कर्मचारियों की हड़ताल


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    तमिलनाडु में बस परिवहन के कर्मचारियों की एक सप्ताह से चल रही हड़ताल ने बसों के परिचलन को अवरुद्ध कर दिया है। सरकार से जुड़े ट्रेड यूनियन सेन्टर को छोड़कर बाकी सभी ट्रेड यूनियन इस हड़ताल का किसी न किसी रूप में समर्थन कर रहे हैं या समर्थन करने को मजबूर हैं।

    पूरे राज्य में संचालित 22,500 बसों में से 15,000 बसें बंद हैं। 5 जनवरी को मद्रास हाई कोर्ट ने इस हड़ताल को अवैध करार दे दिया है और कर्मचारियों को काम पर वापस जाने को कहा। लेकिन कर्मचारी इसके बावजूद हड़ताल पर हैं। 8 जनवरी को कर्मचारियों ने कोर्ट से इस आदेश को बदलवाने के लिए फाइल लगाई लेकिन कोर्ट ने इस आदेश को उठाने से मना कर दिया है हालांकि उसने सरकार को यह आदेश जरूर दिया कि किसी कर्मचारी को बगैर उसकी अनुमति के निलम्बित या बर्खास्त न किया जाये। 

    कर्मचारियों की मुख्य मांग अपने वेतन को बढ़ाने को लेकर है जिसे वे प्रति माह न्यूनतम मजदूरी 19,500रु. व 2.57 की वेतन वृद्धि करवाना चाहते हैं। सरकार इससे 1800 रुपये कम कर न्यूनतम मजदूरी 17,700रु. व 2.44 प्रतिशत की वेतन वृद्धि करना चाहती है। कर्मचारियों का कहना है कि वे पहले ही काफी कमी कर चुके हैं इससे कम वे नहीं चाहते। उनका कहना है कि अभी हाल में विधायकों ने अपनी तनख्वाह 55 हजार से 1 लाख 5 हजार करवा ली लेकिन वे कर्मचारियों की तनख्वाह नहीं बढ़ाना चाहते हैं। इसके अलावा कर्मचारियों की यह मांग भी है कि रिटायर्ड हो चुके कर्मचारियों को उनके देय पूरे किये जायें। साथ ही वे 2013 के बाद काम पर लगने वाले कर्मचारियों के लिए भी वही पेंशन व्यवस्था लागू करवाना चाहते हैं जो 2013 से पहले लागू थी। 

    इस हड़ताल में जहां कर्मचारी अपनी मांगों के लिए संघर्षरत हैं वहीं ट्रेड यूनियन सेन्टर केवल अपने हितों के मद्देनजर इसमें उसी सीमा तक शामिल हो रहे हैं। सीटू के एक नेता के मुताबिक हालांकि वे हड़ताल के समर्थन में तो नहीं हैं लेकिन चूंकि कर्मचारी हड़ताल पर हैं इसलिए उन्हें उनका समर्थन करना पड़ रहा है। अगर सरकार बातचीत के लिए बुला लेती है तो वे हड़ताल पर नहीं जायेंगे। इससे पहले कर्मचारी नेताओं के साथ सरकार 11 बार की वार्ता कर चुकी है। अपनी मांगों को लेकर कर्मचारी 13 व 14 दिसम्बर को प्रदर्शन कर चुके हैं। इसके बावजूद वे सरकार से यह उम्मीद करते हैं कि सरकार इसको बातचीत के जरिये हल करना चाहती है। वे सरकार के वर्गीय चरित्र को भुला देते हैं।

    यही हाल डीएमके का है। डीएमके ने अपने शासनकाल के दौरान कोई ऐसे काम नहीं किये हैं जो कर्मचारियों के हितों में हों और आज चूंकि वह विपक्ष में है इसलिए वह सरकार का विरोध कर रही है और मजदूरों के मुद्दों पर सरकार को घेर रही है। वह भी कर्मचारियों का शोषण-उत्पीड़न करती रही है। कांग्रेस पार्टी से जुड़ी इंटक भी अपनी पार्टी की नीतियों के विरोध में एक सीमा से अधिक नहीं जा सकती है। वामपंथी पार्टियां राज्य में कभी डीएमके तो कभी एआईडीएमके का समर्थन करती रही हैं तो केन्द्र में वे कांग्रेस की पिछलग्गू बनी रही हैं। ऐसे में उससे लाल तेवरों के साथ कर्मचारियों का साथ देने की उम्मीद नहीं की जा सकती है।

    ऐसे में मजदूरों को साफ समझ लेना चाहिए कि उनकी लड़ाई व एकता ही वह मुख्य चीज है जिससे उन्हें अपने संघर्षों में सफलता मिल सकती है। अगर वे एकजुट होंगे और लडे़ंगे तो बाकी ट्रेड यूनियनों को उनका समर्थन करना पड़ेगा।

Labels: रिपोर्ट


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