अंक : 16-31 Jan, 2018 (Year 21, Issue 02)

मोदी सरकार का एक और राजनीतिक स्टंट


तीन तलाक विघेयक


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    तीन तलाक को अवैध व अपराधिक घोषित करने वाले ‘‘मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार सुरक्षा) अध्यादेश 2017 अथवा ‘तीन तलाक विधेयक’ को लोकसभा ने 28 दिसम्बर 2017 को पारित कर दिया। यह अध्यादेश अब राज्य सभा में विचाराधीन है तथा राज्य सभा से पारित होने पर कानून की शक्ल ले लेगा। 

    तीन तलाक विधेयक एक बार में मौखिक रूप से तीन बार तलाक कहने या इलेक्ट्रोनिक माध्यमों, व्हाट्स एप्प या किसी अन्य माध्यम से पहली बार में तलाक की घोषणा करने को प्रतिबंधित करने की बात करता है। 

    इस अध्यादेश के अनुसार तीन बार तलाक कहने या घोषित करने को संज्ञेय अपराध माना जाएगा जिसके तहत तीन वर्ष कैद की सजा का प्रावधान होगा। 

    जाहिर है कि उपरोक्त विधेयक में तीन तलाक को चोरी व बलात्कार जैसे अपराधों की श्रेणी में डाल दिया गया। गत वर्ष अगस्त में सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ ने तलाक-ए-बिद्दत (तीन तलाक) को 3ः2 के बहुमत से असंवैधानिक घोषित कर दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार को इस सम्बन्ध में एक कानून बनाने का सुझाव दिया था। सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा केन्द्र सरकार को इस सम्बन्ध में कानून बनाने के सुझाव से भाजपा को इस मुद्दे को अपनी साम्प्रदायिक राजनीति को आगे बढ़ाने का मुद्दा मिल गया। और उसका जनक आर.एस.एस., भाजपा तीन तलाक को हमेशा मुसलमानों को मिले विशेषाधिकार के बतौर देखता रहा है। संघ परिवार के ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ का प्रमुख नारा ‘एक विधान, एक निशान, एक प्रधान’ रहा है। इस तरह भाजपा की एक मनमांगी मुराद पूरी हो गयी। आनन-फानन में रविशंकर प्रसाद के अधीन कानून मंत्रालय ने ‘तीन तलाक विधेयक’ तैयार कर दिया और वाकचातुर्य व जुमलेबाजी में माहिर प्रधानमंत्री मोदी ने गुजरात हिमाचल चुनाव हेतु इसकी मार्केटिंग शुरू कर दी। मजेदार बात यह है कि मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की बात और तीन तलाक का विरोध वह सरकार कर रही है जो ‘महिला आरक्षण विधेयक’ को लोकसभा में पास कराने की चर्चा भूले से नहीं करती है और जिसका मुखिया बिना तलाक के ही अपनी पत्नी को छोड़ चुका है। गौरतलब है कि महिलाओं के लिए संसद में 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का बिल राज्यसभा द्वारा 2010 में ही पास कर दिया गया लेकिन यह अभी तक लोकसभा से पास नहीं हो पाया है। भाजपा के पास लोकसभा में स्पष्ट बहुमत होने के चलते वह इसे निर्विघ्न पास कर सकती है लेकिन यह इसे चर्चा तक में लाना पसंद नहीं करती है। 

    तीन तलाक पर मुस्लिम महिलाओं की पीड़ा बहुत गहरी है। मर्दवाद का यह विशिष्ट रूप उनकी जिंदगी को बहुत दुःखदायी बना देता है। निश्चित रूप से मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक के दंश से मुक्ति मिलनी चाहिए। लेकिन क्या यह मुक्ति एक ऐसा कानून बनाकर हो सकती है जिसकी बुनियाद मुस्लिम पुरुषों को मुस्लिम महिलाओं के शत्रु के रूप में प्रस्तुति पर टिकी है। मौजूदा कानून बुनियादी तौर पर यही करता है और यही भाजपा व संघ परिवार की भी चाहत रही है। मौजूदा ‘तीन तलाक विधेयक’ तीन तलाक को पति-पत्नी के बीच का अंतर्विरोध या विवाद नहीं मानता जो आपसी सुलह-समझौते से हल किया जा सके। वह इसे गम्भीर क्रिमिनल व संज्ञेय अपराध मानता है जिसका निपटारा करने में पति को तीन साल की कैद हो सकती है। तीन तलाक को संज्ञेय व गैर जमानती अपराध घोषित करने के साथ यह एक ऐसा अपराध बन जाता है जिसमें पीड़ित पक्ष की शिकायत के बिना भी घटना का स्वतः संज्ञान लेकर पुलिस कार्यवाही कर सकती है। इस तरह यह मुस्लिम अल्पसंख्यकों को और अधिक कानूनी निगरानी में रखकर उन्हें भयाक्रांत करने का हथकंडा बन सकता है। ‘तीन तलाक विधेयक’ को भाजपा ने गुजरात चुनाव में प्रचार के दौरान बखूबी इस्तेमाल किया जिसमें एक विज्ञापन में नरेन्द्र मोदी को मुस्लिम महिलाओं के मुक्तिदाता के रूप में प्रदर्शित किया गया। 

    प्रस्तुत विधेयक की एक बड़ी खामी यह है कि इसमें पीड़ित पक्ष को मुआवजा या गुजारा भत्ता देने की बात की गयी है लेकिन अगर पति को जेल हो जाये तो मुआवजा या गुजारा भत्ता देने की संभावना कहां रहती है। सजा के बाद पति-पत्नी के बीच सम्बन्ध की गुंजाइश भी स्वतः खत्म हो जाती है। क्योंकि सजा पाने के पश्चात पति-पत्नी के बीच शत्रुता के ही रिश्ते रह सकते हैं। इस तरह मुस्लिम महिलाओं के ‘उद्धार’ व उनके वैवाहिक रिश्ते को बचाने के नाम पर बने इस विधेयक में ऐसा कुछ नहीं है जो पति-पत्नी के बिगड़े रिश्ते को सुधारने में सहायक हो या महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में मदद करता हो, उसे पारिवारिक हिंसा से मुक्त करता हो व बच्चों के भरण-पोषण में मदद करता हो। 

    गौरतलब है कि मुस्लिमों में महिलाओं की बुरी स्थिति पर ढेरों आंसू बहाने वाली भाजपा सरकार को परित्यक्त हिंदू महिलाओं का जरा सा भी भान नहीं आया। हिन्दू विवाह कानूनों के अंतर्गत बहुविवाह (पति द्वारा) कोई संज्ञेय अपराध नहीं है। बहु विवाह (ठपहंउल या च्वसलहंउल) को तभी अपराध माना जाता है जब पीड़ित महिला या उसके नातेदार इसकी शिकायत दर्ज करें। इसी तरह वैवाहिक बलात्कार भी (डंतपजंस तंचम) अपराध की श्रेणी में नहीं आता है। हिन्दुओं में परित्यक्त महिलाओं की एक बड़ी तादाद है। मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की बात करने वाले लोग वही हिन्दूवादी हैं जिन्होंने परित्यक्त हिंदू महिलाओं के जीवन की त्रासदी पर बनने वाली दीपा मेहता की फिल्म ‘वाटर’ की भारत में शूटिंग नहीं होने दी थी। 

    दरअसल मुस्लिम महिलाओं सहित सभी महिलाओं के शोषण-उत्पीड़न को खत्म करना भाजपा सहित तमाम पूंजीवादी पार्टियों का मुद्दा कभी नहीं रहा है। भाजपा जिस हिंदुत्ववादी विचारधारा को मानती है उसका आधार मनुस्मृति है जो महिलाओं को पुरुषों की दासी के रूप में स्वीकारता है तथा उसे नर्क का द्वार बताता है। ‘लव जिहाद’ के नाम पर महिलाओं के प्रेम करने के अधिकार पर लठैती करने वाले लोग ‘तीन तलाक’ विधेयक के नाम पर मुस्लिम महिलाओं के त्राता बन रहे हैं तो इसका कारण मुस्लिमों से उनकी ईष्र्या ही है जो ‘तीन तलाक’ की प्रथा को मुसलमानों को मिले एक विशेषाधिकार के रूप में देखती है। अगर ऐसी ही व्यवस्था हिंदुओं में होती तो संघ परिवार या भाजपा को कभी इस पर आपत्ति नहीं होती। ‘तीन तलाक विधेयक’ के मूल में भाजपा द्वारा मुसलमानों के इस कथित ‘विशेषाधिकार’ के चलते हिंदू पुरुषों में व्याप्त कुंठा या विद्वेष को उभारना तथा इसके आधार पर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण पैदा करना है। यह मुसलमानों के प्रति हिंदुओं में व्याप्त पूर्वाग्रहों को भड़काने का भी काम करता है। पहले से आतंकित मुस्लिम समाज को यह विधेयक कट्टरपंथियों या कठमुल्लाओं के और अधिक प्रभाव में ले जायेगा। 

    मुस्लिम महिलाओं की स्थिति में कोई बुनियादी बदलाव इस विधेयक से नहीं आयेगा। वैसे भी मुसलमानों में ‘तीन तलाक’ से प्रभावित महिलाओं की संख्या .02 प्रतिशत है। 

    वास्तव में महिलाओं की स्थिति में बुनियादी बदलाव तभी आ सकता है जब मौजूदा पुरुषवादी वर्चस्व पर आधारित व्यवस्था में तब्दीली हो और महिलाओं को आर्थिक, राजनीतिक व सामाजिक तौर पर बराबरी हासिल हो। इस पूंजीवादी समाज में यह नामुमकिन है। 

    मौजूदा सामाजिक व्यवस्था के अंदर मुस्लिम महिलाओं की स्थिति में थोड़ा बहुत सुधार तब तक नहीं हो सकता जब तक सरकार अथवा राज्य तलाकशुदा अथवा ‘तीन तलाक प्रथा’ से पीड़ित महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कोई सार्थक कदम नहीं उठाता है। 

    कुल मिलाकर ‘तीन तलाक विधेयक’ मोदी सरकार द्वारा किया जाने वाला एक राजनीतिक स्टंट है जिसके मूल में क्षुद्र राजनीतिक लाभ हासिल करना है। 

Labels: नारी जगत


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