अंक : 01-15 Feb, 2018 (Year 21, Issue 03)

..जहां दुनिया भर के दैत्य-राक्षस इकट्ठा हुए


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    विश्व आर्थिक मंच की वर्ष 2019 की सालाना बैठक हर वर्ष की तरह स्विट्जरलैंड के दावोस शहर में हुई। यह बैठक आर्थिक मुद्दों के बजाय राजनैतिक गतिविधियों की वजह से ज्यादा चर्चा में रही। मामला चाहे अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड टंªप के आने के पहले ही जर्मनी की चांसलर एंजेला मार्केल व फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों के जाने का रहा हो या फिर ट्रंप का फिलस्तीन को धमकाने का रहा हो। 

    विश्व आर्थिक मंच ऐसी जगह है जहां दुनियाभर की सबसे बड़ी कंपनियों के मालिक, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, राजनेता, अर्थशास्त्री, बुद्धिजीवी, अधिकारी आदि बुलावे पर ही शामिल हो सकते हैं। 2500 व्यक्ति ही चुनिंदा ढंग से आमंत्रित किये जाते हैं। वे ही कंपनियां इस बैठक में हिस्सा ले सकती हैं जिनका सालाना कारोबार पांच खरब डालर से अधिक होता है। इस मंच की सालाना सदस्यता हजारों, लाखों डालर में है। व्यक्तिगत सदस्यता शुल्क 52 हजार डालर (करीब 31 लाख रुपये) है। ऐसी ही उद्योग व अन्यों के लिए सदस्यता है। 

    विश्व आर्थिक मंच की 2018 की बैठक की चर्चा भारत में ऐसे की गयी मानो वहां पर हर ओर मोदी छाये हों। यह ठीक है कि मोदी ने वहां उद्घाटन भाषण दिया पर दुनियाभर में इसकी कोई खास चर्चा नहीं थी। पर इस भाषण की खास बात यह थी कि भारत के प्रधानमंत्री भारत को व्यापार व निवेश की शानदार जगह की तरह पेश कर रहे थे। वे कह रहे थे कि दुनियाभर की कंपनियां आओ भारत में व्यापार और निवेश करो (मतलब भारत को लूटो हम तुम्हारा स्वागत करेंगे)।

    चीजें अपने विपरीत में कैसे बदल जाती हैं। दावोस की यह बैठक इसका उदाहरण है। भारत संरक्षणवाद की आलोचना कर रहा था और साम्राज्यवादी देश अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस अपने-अपने देशों के बाजार के लिए संरक्षण आवश्यक बता रहे थे। 2007 के समय से शुरू हुए विश्व आर्थिक संकट ने साम्राज्यवादी देशों व तीसरी दुनिया के शासकों के सुर व नीतियों को आपस में बदल दिया है। डोनाल्ड ट्रंप ‘अमेरिका प्रथम’ (अमेरिका फर्स्ट) की नीति पर चलता है और मोदी जैसे वैश्वीकरण की नीतियों का समर्थन करते हैं।

    जर्मनी की चांसलर मार्केल ने अमेरिकी साम्राज्यवादियों से भिन्न आर्थिक व सैन्य नीतियों की वकालत की। मार्केल की इच्छा जर्मनी को फिर से एक ऐसे सशक्त सैन्य राष्ट्र बनाने की है जो अमेरिका की छत्रछाया से बाहर हो। जो फ्रांस के साथ यूरोप की ऐसी ताकत हो जो दुनिया में अपना असर डाले। 

    डोनाल्ड ट्रंप का भारी विरोध स्विट्जरलैंड में हुआ है। ये ट्रंप की नीतियों के साथ नारे लगा रहे थे कि ‘ट्रंप वापस जाओ’, ‘ट्रंप का स्वागत नहीं है’, ‘तुम एक शिटहोल पर्सन हो’। 

    डोनाल्ड ट्रंप ने साम्राज्यवादी नीतियों के अनुरूप घृणित बयान दिये और फिलस्तीन के स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आने के बारे में नकारात्मक बातें कहीं। 

    इस तरह से देखा जाये तो दावोस की यह सालाना बैठक हर वर्ष की भांति आर्थिक-राजनैतिक सौदेबाजी, षड्यंत्र, धमकियों व हिसाब-किताब चुकता करने का मंच बन गयी। कहने को तो यह विश्व आर्थिक मंच है पर असल में यह दुनिया के प्रभुत्वशाली ताकतों के अपनी हैसियत, ताकत, सौदेबाजी की क्षमता के प्रदर्शन का मंच बन गया है। यहां पूरी दुनिया के मजदूर-मेहनतकशों के खिलाफ षड्यंत्र रचे जाते हैं। 

    कहने को इस वर्ष की सालाना बैठक की विषय वस्तु ‘‘विभाजित दुनिया में साझे भविष्य का सृजन’’ थी पर यहां जो कुछ हुआ उससे साबित हुआ कि ऐसी दुनिया में जहां साम्राज्यवादी और तीसरी दुनिया के देश हों, जहां साम्राज्यवादी दैत्य कंपनियां और शोषित मजदूर-मेहनतकश हों वहां कुछ भी साझा नहीं हो सकता है। युद्धों को थोपने वालों और युद्ध की मार झेलने वालों के बीच क्या साझा हो सकता है। 

Labels: अन्तराष्ट्रीय


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