अंक : 01-15 Feb, 2018 (Year 21, Issue 03)

अमेरिका में शट डाउन


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    पिछले दिनों अमेरिकी संसद की दो प्रमुख पार्टियों के बीच टकराव इस कदर बढ़ गया कि उन्होंने 20 जनवरी को सरकार के कामकाज के लिये फंड को पास न करके अमेरिका में एक बार फिर शट डाउन की स्थिति उत्पन्न कर दी। परिणाम यह निकला कि शट डाउन के दौरान लाखों कर्मचारियों को छुट्टी पर भेजने की स्थिति उत्पन्न हो गयी। हालांकि दो दिन बाद ही दोनों पार्टियां समझौते पर पहुंच गयीं व फंड बिल पास हो जाने से शट डाउन की स्थिति समाप्त हो गयी।

    अमेरिकी संसद या राष्ट्रपति अगर सरकारी कर्मचारियों के वेतन से जुड़े बिल को पारित करने में असमर्थ होते हैं तो शट डाउन की स्थिति उत्पन्न होती है। पूर्व में भी अमेरिका में कई बार शट डाउन हो चुके हैं। मौजूदा शट डाउन के दौरान कोई यह स्थिति नहीं थी कि सरकारी खजाने में पैसे खत्म हो गये हों बल्कि दोनों पार्टियों का राजनैतिक टकराव उन्हें यहां तक ले गया। प्रावधान के अनुसार 100 सदस्यीय सीनेट में फंड बिल पास करने के लिये 60 वोट होने चाहिये थे पर प्रस्ताव को महज 50 वोट मिल सके और वह गिर गया।

    दरअसल पिछले दो तीन माह से दोनों प्रमुख पार्टियों रिपब्लिकन और डेमोक्रेट के बीच विवाद इतना गहराया हुआ है कि सरकार वार्षिक बिल पास कराने के बजाय एक-एक महीने का बिल पास करा ही काम करवा पा रही है। विवाद अभी निपटा नहीं है बल्कि कुछ दिनों के लिये टला है।

    विवाद की जड़ में अमेरिकी आव्रजन (इमाइग्रेशन) नीति से जुुड़ा डिफर्ड एक्शन फार चाइल्डहुड एराइवल्स (डी ए सी ए) है। ओबामा के कार्यकाल में जून 2012 में शुरू हुए इस कार्यक्रम के तहत अगर कोई व्यक्ति 16 वर्ष से कम उम्र में देश में अवैध तरीके से रह रहा हो तो उसे जबरन वापस नहीं भेजा जायेगा बल्कि वह 2 वर्ष के वर्क-परमिट को हासिल कर सकता है। यह वर्क-परमिट आगे फिर दो वर्ष के लिए बढ़ाया जा सकता है। इस नीति के तहत अमेरिका में आठ लाख लोगों ने खुद को पंजीकृत कराकर अमेरिका में रहने का अधिकार वर्तमान समय में हासिल किया हुआ है। 2014 में ओबामा सरकार ने डी ए सी ए के दायरे को बढ़ाकर और अवैध लोगों को इसके दायरे में लाने का प्रयास किया पर तब राज्यों के विरोध के चलते वे इसमें सफल नहीं हुए। बाहरी लोगों को कुछ समय देश में पढ़ने व काम करने का तब तक अमेरिकी अर्थव्यवस्था को लाभ ही होता था क्योंकि ये बेहद कम तनख्वाह पर काम करने वाले लोग होते थे।

    पर ट्रम्प ने सत्ता पर बैठते ही ‘अमेरिका प्रथम’ की नीति घोषित करते हुए समस्त अवैध रूप से अमेरिका में रह रहे लोगों को देश से बाहर निकालने का फरमान सुनाना शुरू कर दिया। खासकर मैक्सिको से अमेरिका आने वाली बड़ी तादाद के खिलाफ वे विशेष रूप से हमलावर हुए और उन्होंने अमेरिका-मैक्सिको सीमा पर दीवार बनाने की घोषणा कर डाली। दक्षिणपंथी ट्रम्प ने समाज में यह प्रचारित करना शुरू किया कि अमेरिकी युवाओं की बेकारी-तकलीफों की वजह बाहर से आने वाले लोग हैं। इस तरह की बंटवारे की राजनीति को हवा देकर उन्होंने समाज में अपना आधार फैलाया। ट्रम्प ने कई देशों के लोगों के अमेरिका आने पर रोक लगा दी और वीजा नियमों को कठोर बना दिया। ऐसे में तय था कि उपरोक्त डी ए सी ए नीति पर भी उनकी आंखे टेढ़ी होंगी। मौजूदा विवाद की तह में यह था कि जहां डेमोक्रेटिक पार्टी इस नियम को आगे जारी रखना चाहती है वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति इसे समाप्त या बेहद कमजोर करना चाहते हैं।

    तात्कालिक तौर पर ट्रम्प ने शट डाउन के लिये डेमोक्रेटिक पार्टी को जिम्मेदार ठहरा समाज में व सेना के लोगों में यह माहौल बनाया कि डेमोक्रेटिक नेता कर्मचारियों-सैनिकों के वेतन से जुड़ा फंड बिल पास नहीं होने दे रहे हैं। ट्रम्प द्वारा बनाये इस माहौल का असर यह हुआ कि डेमोक्रेटिक नेताओं को आत्मसमर्पण करते हुए दो दिन के भीतर डी ए सी ए पर बगैर किसी आश्वासन के फंड बिल को पास करना पड़ा। इस तरह तात्कालिक तौर पर मौजूदा शट डाउन में ट्रम्प अपने मन की करने में कामयाब हुए।

    दरअसल डेमोक्रेट नेताओं को भी बाहर से आ रहे लोगों-मेहनतकशों से कोई लगाव नहीं है। वे भी महज उनके हितैषी होने का दिखावा करना चाहते थे जो उन्होंने कर लिया। अमेरिका में घरेलू बेकारी बढ़ने की हालातों में दक्षिणपंथी प्रचार के आगे वे लगातार आत्मसमर्पण करते गये हैं।

    अमेरिका के मौजूदा हालातों में जनता की बदहाली के पीछे विश्व संकट की छाया में सरकार द्वारा जनकल्याणकारी कार्यक्रमों में खर्च कटौती कर पूंजीपतियों को पैसा लुटाया जाना है। दक्षिणपंथी राजनीति लोगों को अमेरिकी व बाहरी में बांट सरकार के खिलाफ लोगों के संघर्ष को कमजोर करना चाहती है और किसी हद तक इसमें सफल भी है।

Labels: अन्तराष्ट्रीय


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