अंक : 01-15 Feb, 2018 (Year 21, Issue 03)

आर्थिक संकट और एच-1बी वीजा


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    जब से पूरी दुनिया आर्थिक संकट का शिकार है। तब से ही दुनिया के तमाम देश अलग-अलग तरीके से इस संकट को हल करने का प्रयास कर रहे हैं। परन्तु यह संकट है कि लगातार गहराता ही जा रहा है। अमेरिका में सब प्राइम संकट से शुरू हुई यह आर्थिक मंदी 2007 से 2017 तक एक दशक में दुनिया के अधिकतर देशों को अपने आगोश में ले चुकी है। इस मंदी ने जहां साम्राज्यवादियों/पूंजीपतियों को अपने-अपने मुनाफे को बचाए रखने के लिए अलग-अलग हथकंडों को आजमाने को मजबूर किया वहीं दुनिया भर के मजदूरों-मेहनतकशों के सामने बेरोजगारी, भुखमरी, कंगाली, कुपोषण का संकट खड़ा किया। हालांकि मेहनतकश आवाम ने संकट के लिए जिम्मेदार पूंजीवादी-साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ आवाज भी बुलंद की है। 

    साम्राज्यवादी अपनी समस्याओं को दूसरे-तीसरे देशों पर धकेलकर अपने-अपने देशों के पूंजीपतियों के मुनाफे व लूट को बरकरार रखना चाहते हैं तथा संकट के लिए जिम्मेदार कारणों (पूंजीवाद के अंतर्निहित अंतर्विरोधों) पर परदा डालने का काम कर रहे हैं। इसी कड़ी में पूरी ही दुनिया में प्रवासियों का मुद्दा सामने आया है। पूंजीपति वर्ग इस मुद्दे के द्वारा अपने-अपने देशों में खड़े हो रहे बेरोजगारी के मुद्दे से छुटकारा पाना चाह रहा है। तथा देश में बेरोजगारी का कारण प्रवासियों को बताया जा रहा है। हालांकि ये वही प्रवासी हैं जिनके श्रम की लूट से साम्राज्यवादियों ने अपना साम्राज्य खड़ा किया है। दूसरे छोर पर यही प्रवासी मुद्दा देश में अंधराष्ट्रवाद को हवा देकर नव फासीवादी आंदोलन की जमीन भी पैदा कर रहा है। हम देख रहे हैं कि दुनिया के तमाम देशों में नव फासीवादी आंदोलन उभार पर है। 

    अमेरिका में पिछले दिनों मैक्सिको का मुद्दा व एच-1 बी वीजा का मुद्दा छाया रहा है। अमेरिकी सरकार इन मुद्दों से जहां देश के अंदर बेरोजगारी जैसे मुद्दों को साधने का काम कर रही है। वहीं बाहरी देशों को दबाव में लेकर रिसेटलमेंट करने पर जोर दे रही है। अमेरिका में जहां मैक्सिको के मजदूर विकट परिस्थितियों में बहुत ही कम वेतन में ऐसे काम करते रहे हैं जिन्हें अमेरिकी नागरिक करना पसन्द नहीं करते। आज अमेरिका मैक्सिको की सीमा पर दीवार बनाने की बात कर रहा है। 

    वहीं दूसरी तरफ अमेरिका प्रवासियों पर लगाम कसने के लिए वीजा नियमों को सख्त करने की बात कर रहा है। अमेरिका में नागरिकता और प्रवास की जिम्मेदारी संभालने वाला DHA उस प्रावधान को खत्म करना चाहता है जिसके तहत एच-1 बी वीजा धारकों की अवधि बढ़ जाती है। नए प्रावधान लागू होने से एच-1बी वीजा धारकों को विस्तार मिलना मुश्किल हो जायेगा। वीजा के लिए न्यूनतम वेतन की सीमा 1 लाख डाॅलर कर दी गयी है। इसके साथ ही कम्पनी को गारण्टी देनी होगी कि वीजा धारक की वजह से पांच छः साल में किसी वर्तमान कर्मचारी को हटाया नहीं जाएगा। बताया जा रहा है यह कानून 2018 की शुरूआत में प्रभावी हो जाएगा। 

    अभी की हालत में एच-1बी वीजा तीन साल के लिए मिलता है। वीजा विस्तार पर तीन साल और रुक सकते हैं। अगर ग्रीन कार्ड का आवेदन मंजूर हो जाए तो वीजा विस्तार के जरिए अमेरिका में नागरिकता मिलने का इंतजार किया जा सकता है। चूंकि हर साल बेहद कम संख्या में लोगों को ग्रीन कार्ड मिलता है, इसलिए अमेरिका में रहने के लिए वीजा विस्तार जरूरी है।

    अमेरिका के वीजा आवेदकों के मामले में भारत के बाद चीन आता है। पिछले 11 साल में 21 लाख से भी अधिक भारतीय प्रौद्योगिकी पेशेवरों ने एच-1बी वर्किंग वीजा के लिए आवेदन किया है। अमेरिकी सिटीजनशिप एंड इमिग्रेशन सर्विसेज की रिपोर्ट ने इस धारणा को भी खारिज किया है कि जिन लोगों ने वीजा के लिए आवेदन किया है वे योग्य नहीं हैं। पिछले ग्यारह सालों में औसतन उनकी तनख्वाह 92,317 डालर रही और उनमें से ज्यादातर के पास मास्टर या स्नातक की डिग्री है। 

    रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2007 से 2017 जून तक यू एस सी आई एस को 34 लाख एच-1बी वीजा आवेदन मिले जिनमें भारत से 21 लाख लोग थे। इसी दौरान चीन से 2,96,313, फिलीपीन्स से 85,918, दक्षिण कोरिया से 77,359, कनाडा से 68,228 वीजा आवेदन किये गये। एच-1बी वीजा के लाभार्थियों में ज्यादातर यानी करीब 23 लाख 25-34 साल आयु वर्ग के लोग थे। बीस लाख लोग कम्प्यूटर से सम्बन्धित पेशे से हैं। इसके अलावा वास्तुविधा, अभियांत्रिकी, सर्वेक्षण, शिक्षा, प्रशासनिक विशेषज्ञता, चिकित्सा और स्वास्थ्य श्रेणी के लोग हैं। 

    आज जब अमेरिका अपनी वीजा नीति में बदलाव की बात कर रहा है तो भले ही वह इस बात को प्रचारित कर रहा है कि अमेरिकियों को नौकरी इसलिए नहीं मिल रही कि विदेशियों ने नौकरियों पर कब्जा कर रखा है लेकिन इस सबसे वह कुछ समय के लिए ही जनता को मूर्ख बना सकता है लेकिन समस्या का हल नहीं निकाल सकता। यह समस्या तो पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली की देन है। अमेरिका की इस नीति से भारत सहित तमाम देशों के प्रवासियों की नौकरियों पर संकट खड़ा हो गया है। कई लोगों को वहां से अपने-अपने देशों के लिए धकेला जाएगा वहीं दूसरी तरफ वह पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली के अमानवीय चेहरे को भी उदघाटित करेगा।   

Labels: अन्तराष्ट्रीय


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