अंक : 01-15 Feb, 2018 (Year 21, Issue 03)

नेशनल मेडिकल कमीशन बिल: मेडिकल शिक्षा के तेज व्यवसायीकरण की ओर कदम


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    2 जनवरी को इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने पूरे देश में आईएमए से जुड़े डाॅक्टरों की हड़ताल का आह्वान किया था। यह हड़ताल केन्द्र सरकार द्वारा लोकसभा में प्रस्तुत नेशनल मेडिकल कमीशन बिल, 2017 के विरोध में थी। इस हड़ताल के दबाव में सरकार ने इस बिल को संसद की स्थायी समिति के हवाले कर दिया है। संसद की स्थायी समिति बिल पर उठायी जा रही आपत्ति पर विचार कर अपने सुझाव देगी। सरकार ने मांग रखी है कि बजट सत्र से पहले स्थायी समिति अपनी रिपोर्ट दे दे। इसके बाद से पूंजीवादी मीडिया में ऐसी रिपोर्टों की झड़ी लग गयी है जिसमें मांग की गयी है कि सरकार पीछे न हटे और नेशनल मेडिकल कमीशन बिल की मुख्य बातों को जस का तस रखे। जाहिर सी बात है कि नेशनल मेडिकल कमीशन बिल का मुद्दा अभी समाप्त नहीं हुआ है। 

    नेशनल मेडिकल कमीशन बिल मेडिकल शिक्षा से सम्बन्धित है। लेकिन, चूंकि मेडिकल शिक्षा का स्वरूप जनता के स्वास्थ्य के सभी पहलुओें को प्रभावित करता है, इसलिए यह देश के जन स्वास्थ्य के प्रति रवैये से भी सम्बन्धित है। नेशनल मेडिकल कमीशन बिल को इंडियन मेडिकल काउंसिल, एक्ट, 1956 का स्थान लेना है। इंडियन मेडिकल काउंसिल एक्ट, 1956 और इसके तहत बनी संस्था एम सी आई को कतई ठीक न किये जा सकने की हद तक रोगग्रस्त घोषित किया जा चुका है। सरकार और संसद द्वारा गठित तमाम समितियों ने इसकी तीखी आलोचना की है और कहा है कि ये मेडिकल शिक्षा के विकास की जरूरतों के अनुरूप नहीं रह गयी है। साथ ही, इन्हीं समितियों ने नए कानून और नई संस्था की वकालत की है ताकि नए मेडिकल काॅलेज खोलने और मेडिकल काॅलेजों की सीटों में वृद्धि करने में आने वाली अड़चनों को दूर किया जा सके। इन्होंने मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में मुनाफा कमाने पर रोक को हटाने की बात की है। लेकिन कहीं भी यह चिंता नहीं जाहिर की है कि सरकारी मेडिकल काॅलेज में इलाज और संसाधनों का स्तर गिरता जा रहा है। जाहिर सी बात है कि नया नेशनल मेडिकल कमीशन बिल मेडिकल शिक्षा के व्यवसायीकरण के मकसद से लाया जा रहा है। 

    मेडिकल शिक्षा के नियमन का काम ब्रिटिश शासन के दौरान ही शुरू हो गया था। ब्रिटिश शासन अपनी जरूरतों के अनुरूप मेडिकल शिक्षा का नियमन करता था। इंडियन मेडिकल डिग्रीज एक्ट, 1912 और इंडियन मेडिकल काउंसिल एक्ट, 1933 के जरिए मेडिकल शिक्षा का नियमन किया जाता था। जब देश आजाद हुआ तो देश की जनता की आजादी को लेकर काफी सपने थे। अन्य चीजों के साथ-साथ शिक्षा और स्वास्थ्य का ऊंचा स्तर पाने की चाहत आजाद भारत की जनता में कुलबुला रही थी। इस सम्बन्ध में समाजवादी रूस और समाजवादी चीन द्वारा किये जा रहे प्रयास और हासिल की जा रही सफलताएं देश के भीतर चर्चा का विषय बनती थीं। इस सब के दबाव में आजाद भारत में सरकारी स्कूल, सरकारी अस्पताल और सरकारी मेडिकल काॅलेज खोले गये। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में मुनाफे को किसी हद तक वर्जित माना गया। शिक्षा और स्वास्थ्य के सरकारी संस्थान गुणवत्ता के ऊंचे मापदंड स्थापित कर रहे थे। मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में भी सरकारी संस्थानों की तूती बोलती थी। गैर सरकारी क्षेत्र में कुछेक धार्मिक मिशनरी संस्थाओं द्वारा संचालित मेडिकल काॅलेज ही थे। आजादी के बाद लंबे समय तक मेडिकल शिक्षा के नियमन का काम इंडियन मेडिकल काउंसिल एक्ट, 1956 के तहत मेडिकल काउंसिल आॅफ इण्डिया (एमसीआई) करती रही। एम सी आई एक स्वायत्त संस्था थी। एमसीआई का काम मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता को सुनिश्चित करना, नए मेडिकल काॅलेज को मान्यता देना, पुराने मेडिकल काॅलेज में सीटों की वृद्धि या नए कोर्सों की शुरूआत की इजाजत देना, डाॅक्टरों के नैतिक आचरण की निगरानी करना तथा उनको सूचीबद्ध करना, इत्यादि था। आज के नेशनल मेडिकल काउंसिल बिल के समर्थक भी आजादी के बाद के 30-40 साल के दौरान एमसीआई द्वारा किए गए कामों की प्रशंसा करते हैं। 

    यहां विषयान्तर करते हुए कुछ बातों पर स्पष्ट हो लेना जरूरी है। आजादी के बाद सरकार द्वारा शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में किए गए कामों में सब कुछ त्रुटिरहित या हानिरहित नहीं था। बल्कि आज जो समस्याएं विकराल स्तर पर पहुुंच गयी हैं, उनका कारण आजाद भारत की सरकारों की शुरूआती नीतियों में ही है। जब देश आजाद हुआ तो 200 सालों की गुलामी से यह जर्जर हो चुका था। एक संसाधनों से भरपूर देश में गरीबी और अशिक्षा का साम्राज्य था। अकाल और महामारी देश के लिए आम बात थी। इन समस्याओं के समाधान के लिए जरूरी था कि उत्पादन में तेज वृद्धि हो और जनता का शैक्षिक-सांस्कृतिक स्तर उन्नत किया जाए। यह तभी संभव था जबकि सामंतवाद को जड़ से उखाड़ा जाता और देश का पूर्ण विऔपनिवेशीकरण किया जाता। पूरे देश के सभी बच्चों को शिक्षा के दायरे में लाया जाता। पूरे देश में एक समान, वैज्ञानिक और श्रम से जुड़ी शिक्षा दी जाती। अंधविश्वासों के खिलाफ जंग छेड़ी जाती और शिक्षा में से धार्मिक, जातीय, लैंगिक मूल्य-मान्यताओं को बाहर किया जाता। स्वास्थ्य के स्तर को ऊंचा उठाने में पूरी जनता की भागीदारी करायी जाती। गरीब से गरीब आदमी तक पहुंच बनाने वाला स्वास्थ्य का ढांचा खड़ा किया जाता। प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक सभी स्तर पर इलाज इतना सुलभ होता कि मरीज की आर्थिक हालत उसके इलाज के स्तर को निर्धारित नहीं करती। पौष्टिक भोजन, साफ पीने का पानी और साफ-सफाई जनता का अधिकार बन जाता। लेकिन ऐसा नहीं हो सका, न ही आजादी के बाद सत्ता हासिल करने वाले पूंजीवादी शासकों के बस में यह था। आजादी के बाद बनने वाली नीतियां देशी पूंजी के हितों को ध्यान में रखकर तय की गयीं। इसके लिए सामंतवाद-साम्राज्यवाद से सुलह-समझौते किए गये। सभी मालों के लिए देश में एकीकृत बाजार तैयार करने की तरफ बढ़ा गया। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र को भी खरीद बेच के दायरे में रखा गया। 

    यद्यपि इन क्षेत्रों में तत्कालीन परिस्थितियों के दबाव की वजह से और इन क्षेत्रों से तत्काल मुनाफा न हो सकने की संभावना की वजह से कई सरकारी संस्थान खोले गये लेकिन ये संस्थान अपने आप में विषमता पैदा करने वाले थे। प्राथमिक शिक्षा और प्राथमिक स्वास्थ्य पर जोर जरूरत से कम था तो आई.आई.टी., एम्स, पीजीआई इत्यादि पर जोर जरूरत से ज्यादा। शिक्षा का मकसद एक बेहतर समाज का निर्माण नहीं, बल्कि शिक्षा पूंजीवादी प्रतियोगिता में अमीर बनने की एक सीढ़ी बन गयी। बीमारियां डाक्टरों में चिंता या संवदेना पैदा करने की बजाय खुशी और लालच पैदा करने लगीं। हद तो ये है कि अज्ञान और कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष कर पैदा होने वाली आधुनिक चिकित्सा पद्धति के वाहक डाक्टर अपने ही निजी जीवन और मरीजों को सलाह देते वक्त ‘दादी मां के नुस्खों’ का इस्तेमाल करते रहे। आज मेडिकल शिक्षा के सड़ जाने की काफी चर्चा हो रही है। हालिया समय के डा. केतन देसाई के रिश्वतखोरी का मामला और लखनऊ के प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट का मामला, दो ऐेसे मामले हैं जिसमें यह सड़ांध साफ-साफ दिखाई देती है। प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट के मामले के तार तो सुप्रीम कोर्ट और उसके मुख्य न्यायाधीश से जुड़ते हैं। सुप्रीम कोर्ट के शीर्ष जजों द्वारा किए गये हालिया प्रेस कांफ्रेंस में उठाए गये सवालों की शुरूआत भी प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट वाले मामले से सम्बन्धित है। लेकिन, सरकार द्वारा जो नया नेशनल मेडिकल कमीशन बिल लाया जा रहा है उसका मूल कारण मेडिकल शिक्षा की सड़ांध हटाना नहीं बल्कि कुछ और है। 

    1991 से देश में निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण की नीतियां लागू हुईं। इसका असर शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी पड़ना शुरू हुआ। इन दोनों क्षेत्रों का व्यवसायीकरण तेज हो गया। प्राइमरी और सेकेंडरी शिक्षा में तो सरकारी संस्थान बिल्कुल ही चौपट हो गये। उच्च शिक्षा में भी निजी क्षेत्रों को बढ़ावा मिलने लगा। इंजीनियरिंग, बी.एड़, मैनेजमेण्ट के निजी संस्थान कुकुरमुत्तों की तरह पनपने लगे। जिला अस्पताल और मेडिकल काॅलेज तक के सरकारी संस्थान चरमराने लगे। सभी जगहों पर स्थायी नियुक्तियों के बजाय ठेके पर कर्मचारी बढ़ते गये। सरकारी अस्पतालों में मरीजों की लम्बी लाइनें लगने लगीं। इलाज और जांच की फीस बढ़ने लगी। इसके बावजूद सरकारी अस्पतालों में दवाईयां और जांच की मशीनें नदारद थीं। सरकारी मेडिकल काॅलेज का भी यही हाल हो गया। इसने मेडिकल काॅलेज में इलाज और प्रशिक्षण दोनों के स्तर को काफी नीचे गिरा दिया। लेकिन अभी भी निजी मेडिकल काॅलेज सरकारी मेडिकल काॅलेज का स्थानापन्न नहीं बन सके। आईएमसी एक्ट, 1956 निजी मेडिकल काॅलेज की संख्या में तेज वृद्धि के लिए अड़चन बन रहा था। इस एक्ट के तहत मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में मुनाफा रहित ट्रस्ट या व्यक्ति ही आ सकते थे। यह इसके बावजूद था कि मेडिकल काॅलेज और उससे सम्बन्धित अस्पताल खोलने के लिए जिस अवरचना और कुशलकर्मियों की जरूरत होती है वह भारी पूंजी निवेश की मांग करता है। भारी फीस, डोनेशन और कैपिटेशन फीस के जरिए भी एमसीआई के मापदंडों पर खरा उतरने वाला निजी मेडिकल काॅलेज खोलना कठिन था। नतीजा यह हुआ कि जो भी प्राइवेट मेडिकल काॅलेज खुल रहे थे, वे एम सी आई को रिश्वत देकर ही मापदंडों के पालन से बच रहे थे। एम सी आई ने कुछ मामलों में अपने मापदंडों को नरम भी किया लेकिन उससे भी समस्या का समाधान नहीं हो रहा था। आज जब एम सी आई खुद को भंग किये जाने का विरोध कर रही है, तब वह अपनी तरफ से मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में मुनाफा कमाने की छूट देने का प्रस्ताव सरकार को दे चुकी है। इसलिए साफ है कि नेशनल मेडिकल कमीशन बिल (एनएमसी बिल) संसद में पास नहीं हो तब भी मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में खुली मुनाफाखोरी को रोकना संघर्ष की मांग करता है। 

    1991 के बाद से ही मेडिकल शिक्षा में प्राइवेट सेक्टर को बढ़ावा देने के सरकारी प्रयास शुरू हो गये। 1993 में आईएमसी एक्ट, 1956 में संशोधन किया गया जिसके जरिए नए मेडिकल काॅलेज खोलने की अनुमति देने या न देने के राज्य सरकारों के सारे अधिकार समाप्त हो गये और सभी अधिकार केन्द्र सरकार के पास पहुंच गए। मेडिकल शिक्षा के संविधान के समवर्ती सूची में होने की वजह से राज्यों को अपनी जरूरत और स्थिति के अनुरूप मेडिकल शिक्षा संस्थान चलाने की जो सहूलियत मिल जाती थी, उसे समाप्त कर दिया गया। मेडिकल शिक्षा व्यवस्था का पहले से कमजोर संघीय ढांचा और कमजोर हो गया जो कि क्रमशः कमजोर ही होता गया। संप्रग शासन के दौरान ही एक नए कानून का प्रस्ताव आया जिसके द्वारा एमसीआई समेत तमाम चिकित्सा पद्धतियों की नियामक संस्थाएं एक केन्द्रीकृत संस्था के अधीन हो जाती थीं। लेकिन उस समय इस कानून का विरोध होने पर सरकार ने इसे वापस ले लिया। 

    2010 में डा.केतन देसाई की रिश्वतखोरी का मामला खूब चर्चा का विषय बना। डा. केतन देसाई एम सी आई के अध्यक्ष थे। पंजाब के एक मेडिकल काॅलेज की सीटों में वृद्धि को लेकर सी.बी.आई. ने डा. केतन देसाई समेत कुछ अन्य लोगों को गिरफ्तार किया। डा.केतन देसाई पर 2 करोड़ रुपये की रिश्वत लेने का आरोप है। डा. केतन देसाई पर यह मामला अदालतों में आठ साल से अटका हुआ है। इस दौरान डा. केतन देसाई डाॅक्टरों की वैश्विक संस्था वर्ल्ड मेडिकल एसोएिशन के अध्यक्ष भी बन गये। लेकिन, केन्द्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट डा. केतन देसाई के मामले में जितनी निष्क्रिय रही, एम सी आई को भंग करने के प्रयासों में उतनी ही सक्रिय रही। इस मामले के बाद तीन साल तक एमसीआई की शीर्ष काउंसिल भंग रही। एमसीआई का संचालन केन्द्र सरकार द्वारा नियुक्त बोर्ड आॅफ गवर्नर करता रहा और सुप्रीम कोर्ट की ओवरसाइट कमिटी उसकी निगरानी करती रही। इस दौरान एमसीआई एक्ट में संशोधन के प्रयास होते रहे। अभी फिलहाल पुनर्गठित एमसीआई मेडिकल शिक्षा का नियमन कर रही है और केन्द्र सरकार द्वारा नियुक्त ओवर साइट कमिटी उसकी निगरानी कर रही है। 

    इस दौरान तीन समितियों की रिपोर्टें आई हैं जो अपने विश्लेषण और निष्कर्षों में मिलती जुलती हैं। पहली रिपोर्ट स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय से सम्बन्धित विभागीय संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट है। दूसरी केन्द्र सरकार द्वारा नियुक्त डा. रजीय राय चैधरी के नेतृत्व में गठित कमिटी की रिपोर्ट है। और तीसरी रिपोर्ट इन दोनों रिपोर्टों पर आधारित नीति आयोग की कमिटी की रिपोर्ट है। नीति आयोग की कमिटी की रिपोर्ट ने नेशनल मेडिकल कमीशन बिल का मसौदा भी प्रस्तुत किया है। सरकार द्वारा लोक सभा में प्रस्तुत बिल नीति आयोग के बिल पर ही आधारित है। इन सभी रिपोर्टों ने आईएमसी एक्ट की असफलताओं की सूची दी है। इनका कहना है कि एमसीआई भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप मेडिकल शिक्षा का पाठ्यक्रम विकसित करने में, मेडिकल शिक्षा का समान स्तर सुनिश्चित करने में, गुणवत्ता सुनिश्चित करने खास तौर पर प्राइवेट काॅलेजों में, मेडिकल ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट के मूल्यांकन में और मेडिकल काॅलेजों के निरीक्षण और मान्यता देने या रद्द करने के लिए एक पारदर्शी व्यवस्था विकसित करने में असफल रही है। इनका कहना है कि निरीक्षणों के दौरान एम सी आई का ज्यादा ध्यान अवरचना और कर्मियों की तकनीकी बातों पर होता है और शिक्षण, प्रशिक्षण तथा कौशल सिखाने और बरकरार रखने का कोई उल्लेखनीय मूल्यांकन नहीं किया जाता है। इन्होंने कहा कि एम सी आई का ढांचा इतना अपारदर्शी और काष्ठीकृत(Ossified) है कि व्यवस्था को अंदरूनी तौर पर बदले बगैर रूपांतरण सम्भव नहीं है। 

    नीति आयोग की रिपोर्ट (अगस्त, 2016) में एनएमसी बिल की विशेषताओं और इसकी तार्किक जमीन के बारे में बताया गया है। नियमन सम्बन्धी दृष्टिकोण के बारे में बात करते हुए रिपोर्ट कहती है कि निरीक्षणों पर आधारित एम सी आई का तरीका मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में प्रवेश के लिए भारी बाधा पैदा करता है, जिसका कोई यथोचित लाभ भी नहीं मिलता। इससे रिश्वतखोरी की जमीन तैयार होती है। इसके बजाय एनएमसी बिल विचलनों को ठीक करने के लिए मेडिकल संस्थानों के रेटिंग्स के नियमित प्रकाशन पर निर्भर करता है। इससे छात्रों को जानकारी के साथ चयन की सुविधा मिलेगी तथा खराब रेटिंग वाले संस्थानों को अपना स्तर सुधारना होगा ताकि वे अच्छे छात्रों को आकर्षित कर सकें। पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए संस्थानों को बाध्य किया जाएगा कि वे सम्बन्धित जानकारियां वेबसाइट के माध्यम से पब्लिक डोमेन में लाएं। विचलनों को निरीक्षणों के बजाए शिकायत निवारण प्रणाली के माध्यम से ठीक किया जायेगा। साथ ही यह रिपोर्ट यह भी कहती है कि मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में प्रवेश के लिए ‘मुनाफा रहित’ होने की शर्त का कोई लाभ नहीं होता, क्योंकि ये संस्थान गैर कानूनी तरीके से मुनाफा कमाते ही हैं। साथ ही डाॅक्टरों की कमी को देखते हुए जितने मेडिकल संस्थान खुलने चाहिए उसमें बाधा पैदा करते हैं। रिपोर्ट एनएमसी बिल के बारे में कहती है कि यह बिल अपने नियमों के द्वारा इस बाधा को दूर करेगा। 

    नेशनल मेडिकल कमीशन बिल पर आगे बात करने से पहले प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट वाले मामले पर बात करते चलते हैं। लखनऊ के प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट पर केन्द्र सरकार ने दो साल के लिए मेडिकल शिक्षा में छात्रों को प्रवेश देने से रोक लगा दी थी। ट्रस्ट की अपील पर सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने एक साल की रोक बरकरार रखी लेकिन दूसरे साल के लिए एम सी आई को फिर से निरीक्षण करने के लिए कहा। 19 सितम्बर 2017 को सीबीआई ने उड़ीसा उच्च न्यायालय के भूतपूर्व जज को गिरफ्तार कर प्राथमिकी दर्ज की। इस भूतपूर्व जज कुद्दुसी पर आरोप था कि प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट के पक्ष में फैसला हासिल करने के लिए इसने सुप्रीम कोर्ट से अनुकूल बेंच दिलवाने के एवज में पैसा लिया था। नवम्बर माह में इस मामले की सुप्रीम कोर्ट के किसी पूर्व मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में गठित स्पेशल इंवेस्टीगेशन टीम से जांच कराने के लिए याचिका दाखिल की गयी। इस सम्बन्ध में दो याचिका दाखिल की गयीं। दोनों याचिकाकर्ताओं ने मांग की कि उनकी याचिका पर सुनवाई से मुख्य न्यायाधीश को तथा प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट के मामले में सुनवाई करने वाले जजों को अलग रखा जाए। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस चेमलेश्वर वाली दो सदस्यीय बेंच ने याचिका की सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट के शीर्ष पांच जजों की बेंच गठित करने का फैसला दिया। लेकिन इस फैसले को मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा समेत पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने पलट दिया और याचिकाकर्ताओं पर बेंच हंटिंग और अदालत की अवमानना का आरोप लगाया। लेकिन याचिकाकर्ता द्वारा उन पर मुकदमा चलाने की चुनौती देने के बावजूद एक जज ने कहा ‘आत्म नियंत्रण ही हमारी ताकत है’। जनवरी माह में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश के नीचे के शीर्ष जजों ने प्रेस कांफ्रेस कर मुख्य न्यायाधीश पर गम्भीर आरोप लगाया कि वे महत्वपूर्ण मामले में परम्पराओं की अवहेलना कर केसों का आवंटन निश्चित फैसला हासिल करने के मकसद से कर रहे हैं। फिलहाल, यह सारा मामला ठंडा दिख रहा है लेकिन एक बात साफ है कि मेडिकल शिक्षा के व्यवसायीकरण से बहुत ऊपर बैठे लोगों के हित जुड़े हुए हैं। 

    सरकार द्वारा लोक सभा में प्रस्तुत एनएमसी बिल की मुख्य बातें इस प्रकार हैंः

    इस बिल के तहत सबसे ताकतवर संस्था 25 सदस्यीय नेशनल मेडिकल कमीशन होगा। इसमें एक अध्यक्ष, बारह पदेन सदस्य, ग्यारह अंशकालिक सदस्य और एक पदेन सदस्य सचिव होगा। इस कमीशन के अध्यक्ष और अधिकांश सदस्य केन्द्र सरकार द्वारा चयनित एवं नियुक्त होंगे। गौरतलब है कि एमसीआई के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष समेत अघिकांश सदस्य निर्वाचित होते हैं। यह संस्था मेडिकल शिक्षा, मेडिकल पेशा और मेडिकल संस्थानों से सम्बन्धित सभी पहलुओं के नियमन का काम करेगी। 

    इस बिल के तहत एक मेडिकल एडवाइजरी काउंसिल का प्रावधान किया गया है। नेशनल मेडिकल काउंसिल का अध्यक्ष इस काउंसिल का भी पदेन अध्यक्ष होगा। नेशनल मेडिकल काउंसिल के सभी सदस्य इसके पदेन सदस्य होंगे। इनके अतिरिक्त इस काउंसिल में राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधि होंगे। इस काउंसिल का काम राज्यों और नेशनल मेडिकल काउंसिल के बीच विचारों के आदान-प्रदान का होगा। इसके निर्णय नेशनल मेडिकल काउंसिल पर बाध्यकारी नहीं होंगे। फिलहाल इसका कोरम पंद्रह का रखा गया है। स्पष्ट है कि 25 सदस्यीय नेशनल मेडिकल काउंसिल अपने अध्यक्ष के साथ इस काउंसिल में प्रभावी स्थिति में होंगे। 

    इस बिल के तहत चार स्वायत्त बोर्डों का प्रावधान किया गया हैै। ये चार बोर्ड अंडर ग्रेजुएट मेडिकल शिक्षा, पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल शिक्षा, मेडिकल संस्थानों के मूल्यांकन और रेटिंग तथा नैतिकता और मेडिकल पंजीकरण से सम्बन्धित होंगे। ये बोर्ड अपने-अपने क्षेत्रों में नेशनल मेडिकल कमीशन के द्वारा तय नीतियों के तहत कार्य करेंगे। 

    इस बिल के तहत देश के भीतर और बाहर के मेडिकल संस्थानों के द्वारा दी जाने वाली पात्रताओं की मान्यता का प्रावधान है। 

    इस बिल के तहत अंडर ग्रेजुएट मेडिकल शिक्षा में प्रवेश के लिए नीट का तथा पोस्टग्रेजुएट मेडिकल शिक्षा में प्रवेश के लिए नेशनल लाइसेंसिएट एक्जामिनेशन (एक्जिट टेस्ट) का प्रावधान किया गया है। नेशनल मेडिकल रजिस्टर में पंजीकरण के लिए एक्जिट टेस्ट में पास होना अनिवार्य होगा। 

    इस बिल में नेशनल मेडिकल कमीशन की अन्य चिकित्सा पद्धतियों की नियामक संस्थाओं के साथ संयुक्त बैठक का प्रावधान किया गया है। इस बैठक में विभिन्न पद्धतियों के उपयोगी हिस्सों का अन्य पद्धतियों द्वारा इस्तेमाल पर विचार किया जाएगा। होम्योपैथी और आयुष के लिए ब्रिज कोर्स डिजायन किया जाएगा। ताकि नेशनल मेडिकल कमीशन का एक अलग से रजिस्टर बनाकर उसमें इनका पंजीकरण किया जा सके और किसी हद तक एलोपैथिक पद्धति के इस्तेमाल की उन्हें इजाजत मिल सके। इस बिल के तहत आईएमसी एक्ट 1956 की समाप्ति का प्रावधान किया गया है।  

    इस बिल की इंडियन मेडिकल एसोसिएशन और पूंजीवादी दायरे के ही कई विश्लेषकों द्वारा आलोचना की जा रही है। इनकी आलोचना के मुख्य तर्क हैं कि यह बिल केन्द्र सरकार के हाथ में सारी ताकत केन्द्रित कर देती है, यह बिल संघात्मक ढांचे के खिलाफ है, यह बिल नियमन प्रक्रिया में डाॅक्टरों की भागीदारी और प्रतिनिधित्व को अत्यन्त सीमित कर देता है, यह बिल डाॅक्टरों पर कम और नौकरशाहों पर ज्यादा भरोसा करता है। अंडरग्रेजुएट डाॅक्टरों को प्रैक्टिस करने के लिए एक्जिट टेस्ट में पास होने की शर्त गैर जरूरी है, ब्रिज कोर्स अन्य चिकित्सा पद्धतियों को समाप्त कर देगा और एलोपेथिक डाक्टरों और मरीजों के साथ अन्यायकारी है, आदि। 

    इस बिल में ऊपर बतायी गयी ये सारी खामियां कम या ज्यादा हैं। लेकिन इस बिल की सबसे बड़ी कमी जिसकी सबसे कम चर्चा हो रही है वह ये कि यह मेडिकल शिक्षा के तेज व्यवसायीकरण का रास्ता खोलता है। इस बिल को राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2016 के साथ जोड़कर देखने की जरूरत है। केन्द्र सरकार मेडिकल सेवा और मेडिकल शिक्षा दोनों के तेज निजीकरण की तरफ बढ़ रही है। अगर सरकार की ये नीतियां पूरी तरह लागू हो गयीं तो पूरी स्वास्थ्य सेवा ठेके पर निजी संस्थाओं को सौंप दी जाएगी। सरकार जनता के स्वास्थ्य की अपनी जिम्मेदारी को बीमा कम्पनियों का प्रीमियम भरने तक सीमित कर लेगी। ये निजी मेडिकल संस्थाएं कम से कम कीमत पर स्वास्थ्य कर्मी रखेंगी। देश में भारी बेरोजगारी की वजह से डाक्टरों के अलावा अन्य स्वास्थ्यकर्मी अभी भी बहुत सस्ते में काम करने को मजबूर हैं। डाक्टरों को जो अपेक्षाकृत ऊंचे वेतन देने की मजबूरी अभी है, वह होम्योपैथ या आयुष डाक्टरों के एलोपैथ इलाज की अनुमति मिलने के बाद समाप्त हो जाएगी। मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में एक बार प्राइवेट मेडिकल काॅलेजों की साख स्थापित हो जाने के बाद सरकारी मेडिकल काॅलेजों के भी निजीकरण के दरवाजे खुल जायेंगे। पहले देशी पूंजी को जनता के स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर मुनाफा पीटने की छूट मिलेगी, फिर अंतर्राष्ट्रीय कौशल एवं तकनीक के विकास के नाम पर विदेशी पूंजी को भी मलाई बटोरने के लिए आमंत्रित किया जाएगा। इस तरह स्वास्थ्य का क्षेत्र भी देशी-विदेशी पूंजी के लिए लूट का अड्डा बन जाएगा। 

    स्वास्थ्य जनता की बुनियादी जरूरतों में से एक है। आज जन स्वास्थ्य के क्षेत्र में पूरी दुनिया में जितना काम अब तक हुआ है उससे यह साबित होता है कि एक सही स्वास्थ्य ढांचे का निर्माण न तो किसी व्यक्ति या समूह के निजी प्रयासों से संभव है न ही किसी दानदाता-धार्मिक संस्था के प्रयासों से। यह काम सही तरीके से राज्य ही कर सकता है और राज्य के द्वारा स्वास्थ्य की जिम्मेदारी से बचने के प्रयास के खिलाफ संघर्ष जारी है। साथ ही, चूंकि पूंजीवादी राज्य आदर्श स्थितियों में भी स्वास्थ्य की जिम्मेदारियों के साथ न्याय नहीं करते, इसलिए पूंजीवाद के खात्मे और समाजवाद की स्थापना के लिए संघर्ष भी जरूरी बन जाता है। 

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